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यह एक्टर था भोजपुरी सिनेमा का जन्मदाता, बनाई ऐसी फिल्म बैलगाड़ियों में भर कर थिएटर जाते थे लोग, अंग्रेजों से ली टक्कर, मिली मौत

जब हुसैन मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में व्यस्त थे, तभी राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से हुई एक मुलाकात ने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी

यह एक्टर था भोजपुरी सिनेमा का जन्मदाता, बनाई ऐसी फिल्म बैलगाड़ियों में भर कर थिएटर जाते थे लोग, अंग्रेजों से ली टक्कर, मिली मौत
यह मुसलमान एक्टर था भोजपुरी सिनेमा का जन्मदाता
नई दिल्ली:

आज हम बॉलीवुड के उस एक्टर के बारे में बात करने जा रहे हैं वो कभी ब्रिटिश सेना का सिपाही था, फिर INA में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी, महान बिमल रॉय के असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया और जिसे भोजपुरी सिनेमा का जनक कहा जाता है. एक इंसान ने इतने सारे रोल निभाए कि उनकी पूरी कहानी जान आप दंग रह जाएंगे. एक सलाह ने उनके जीवन को नया मोड़ दिया और भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत हुई. ये सलाह किसी और की नहीं बल्कि भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की थी.

कौन हैं वह एक्टर

हम बात कर रहे हैं नजीर हुसैन की. नजीर ने कैरेक्टर एक्टर के तौर पर करियर 500 फिल्मों में काम किया. लेकिन उनकी शुरुआत फिल्मों से नहीं बल्कि फौज से हुई थी. शरुआती दिनों में उन्होंने ब्रिटिश सेना ज्वाइन की थी. युद्ध के दौरान जापानियों ने उन्हें पकड़ लिया और युद्धंबदी बना दिया. जब वह युद्धबंदी थे, तभी उनका मन नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सिद्धांतों से प्रभावित हुआ. नेताजी ने ही 'आज़ाद हिंद फ़ौज' (जिसे 'इंडियन नेशनल आर्मी' भी कहा जाता है) को फिर से खड़ा किया था. नेताजी ने ही उन्हें छुड़वाया और फिर वह आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए. हालांकि नेताजी के जाने के बाद नजीर की जिंदगी ने फिर से मोड़ लिया.

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बॉलीवुड में एंट्री

एक दोस्त की सलाह पर नजीर कोलकाता चले गए, जहां उन्हें थियेटर में छोटे-मोटे रोल मिले. यहीं विमल रॉय की उनपर नजर पड़ी. उन्होंने नजीर को ‘पहला आदमी' फिल्म में रोल दिया. 1950 में रिलीज हुई यह फिल्म जबरदस्त हिट रही और इसने नजीर हुसैन के फिल्मी करियर को एक नई उड़ान दी. बाद में रॉय को नजीर हुसैन का काम इतना पसंद आया कि उन्होंने उन्हें कई फिल्मों में रोल दिए, जिनमें 1953 की मशहूर फिल्म 'दो बीघा ज़मीन' और 1955 की 'देवदास' भी शामिल हैं.

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भोजपुरी फिल्मों के जनक

जब हुसैन मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में व्यस्त थे, तभी राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से हुई एक मुलाकात ने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी. एक अवॉर्ड समारोह में हुसैन की मुलाकात राजेंद्र प्रसाद से हुई. चूंकि राष्ट्रपति बिहार से थे, इसलिए हुसैन ने उनसे भोजपुरी में बात की. एक बॉलीवुड अभिनेता के मुंह से इतनी धाराप्रवाह भोजपुरी सुनकर राष्ट्रपति बहुत खुश हुए और उन्होंने हुसैन को सुझाव दिया कि उन्हें भोजपुरी फिल्मों को बढ़ावा देना चाहिए और उनमें अभिनय भी करना चाहिए.

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राष्ट्रपति की सलाह को दिल से अपनाते हुए, हुसैन ने 'गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो' नाम की एक फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी. इस फिल्म में अभिनय करने वाली अभिनेत्रियों में से एक लीला मिश्रा भी थीं, जिन्हें हम फिल्म 'शोले' में 'मौसी' (बसंती की मौसी) के तौर पर पहचानते हैं. यह फिल्म भोजपुरी की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक बनी, और उसके बाद हुसैन ने भोजपुरी बोली में कई फिल्में बनाईं. यही कारण है कि उन्हें 'भोजपुरी फिल्मों का जनक' कहा जाने लगा. दुख की बात है कि 1987 में, 65 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया.

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