कभी नौकरी के लिए अपना शहर छोड़ना पड़ता है, कभी पढ़ाई के लिए घर से दूर जाना पड़ता है और कभी जिंदगी की मजबूरियां अपनों से बिछड़ने पर मजबूर कर देती हैं. दिनभर की भागदौड़ के बाद जब कमरे का दरवाजा बंद होता है, तो सबसे ज्यादा शोर उस खामोशी का सुनाई देता है, जिसमें अपने लोगों की कमी महसूस होती है. ऐसे वक्त में काम आता है म्यूजिक. ये सिर्फ कानों तक नहीं पहुंचता, बल्कि दिल के उस कोने को छू लेता है, जहां तन्हाई चुपचाप बैठी होती है. 55 साल पहले आया एक ऐसा ही सॉन्ग आज भी हर अकेले इंसान की कहानी जैसा लगता है. हिंदी सिनेमा के इस गाने में किशार कुमार और गुलजार की जुगलबंदी दिल को छलनी कर देती है.
तन्हाई को आवाज देता है ये सॉन्ग
1971 में रिलीज हुई फिल्म 'मेरे अपने' का सॉन्ग 'कोई होता जिसको अपना, हम अपना कह लेते यारों' आज भी सुनने वालों की आंखें नम कर देता है. गुलजार के शब्द खालीपन को बेहद सादगी से बयां करते हैं, जिसे अक्सर लोग किसी से कह नहीं पाते. वहीं किशोर कुमार की आवाज इस दर्द को और गहरा बना देती है. ऐसा महसूस होता है जैसे हर शब्द दिल के किसी पुराने जख्म को छू रहा हो. यही वजह है कि 55 साल बाद भी ये सॉन्ग सिर्फ एक फिल्मी गाना नहीं, बल्कि लाखों लोगों के इमोशन्स का साथी बना हुआ है. सलील चौधरी ने इसका म्यूजिक तैयार किया और गुलजार ने ऐसे बोल लिखे, जो अकेलेपन को शब्द दे देते हैं.
युवा किरदार, गहरी बात
फिल्म में विनोद खन्ना ने 'श्याम' नाम के एक एंग्री यंग मैन और कॉलेज स्टूडेंट लीडर का किरदार निभाया है. इस सॉन्ग के दौरान वो शहर की सुनसान सड़कों पर अकेले चलते नजर आते हैं. उनके चेहरे की उदासी दिखाई देती है. ऐसा लगता है जैसे भीड़ से भरे शहर में भी उनका अपना कहने वाला कोई नहीं है. फिल्म का डायरेक्शन भी गुलजार ने किया था. इसमें विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा, मीना कुमारी, असरानी, पेंटल, डैनी डेन्जोंगपा, दिनेश ठाकुर, सुमिता सान्याल और रमेश देव जैसे कलाकार नजर आए थे.
इस सॉन्ग की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसे सुनते वक्त ऐसा लगता है जैसे कोई आपके मन की बात बिना कहे समझ गया हो. हर लाइन उस इंसान के दिल तक पहुंचती है, जिसने कभी किसी अपने की कमी महसूस की हो.
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