देश तेल और गैस संकट से गुजर रहा है और इसी बीच प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया को चेतावनी दी थी और कहा था कि युद्ध और ऊर्जा संकट नहीं रुके तो करोड़ों लोग फिर हो जाएंगे गरीब. अगर ऐसी स्थिति आती है तो मोदी सरकार के पास विकल्प है कि भारत इस गरीबी से भी लड़ सकता है. भारत सरकार अभी देश में करीब 80 करोड़ लोगों को हर महीने मुफ्त अनाज देती है ताकि देश में कोई पेट भूखा न रहे, लेकिन अब वक्त आ गया है कि सबसे गरीब लोगों को सरकार और मदद कर सकती है. पांच राज्यों के नतीजों के बाद फिर एक बार एक देश-एक चुनाव के लिए बनी संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) ने गुजरात का दौरा किया और इसके अध्यक्ष पी. पी. चौधरी ने कहा है कि विधानसभाओं और लोकसभा का चुनाव एक साथ कराया जाए तो कम से कम 7 लाख करोड़ रुपये की बचत हो सकती है. उनका तर्क है कि बची हुई राशि से देश के विकास कार्यों को गति मिलेगी और साथ ही समय भी बचेगा.
2 करोड़ गरीब परिवारों को हर महीने मिल सकते हैं 6 हजार रुपये
भारत में गरीबी दर 5.25 फीसदी है, मतलब 7.52 करोड़ लोग करीब हैं. जेपीसी के अध्यक्ष का दावा है कि इससे 7 लाख करोड़ रुपये बचेंगे. अगर इस पैसे का सदुपयोग किया जाए तो करीब 1.94 करोड़ परिवारों को प्रति माह 6,000 रुपये के दर से पांच साल तक पैसे दिए जा सकते हैं, मतलब 8.5 करोड़ लोगों को देश से गरीबी रेखा से निकाला जा सकता है, जबकि देश में गरीब लोगों की संख्या 7.52 करोड़ है. देश में एक परिवार में औसतन 4.4 सदस्य होते हैं. राहुल गांधी का भी सपना था कि हर परिवार को प्रति माह 6,000 रुपये दिए जाएं, लेकिन दो लोकसभा चुनाव में वादे के बाद भी पार्टी नहीं जीत पाई. लेकिन अगर मोदी सरकार ऐसा करती है तो देश से गरीबी मिट सकती है. इंदिरा गांधी ने “गरीबी हटाओ” का नारा दिया था, लेकिन 55 साल के बाद भी देश में गरीबी नहीं हटी लेकिन मोदी सरकार में गरीबी कम हो रही है. अब एक मौका है जिससे गरीबी को खत्म किया जा सकता है. इससे अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी. हर गरीब के हाथ में पैसे जाने से खरीदारी बढ़ेगी क्योंकि इससे समाज के निचले वर्ग की खरीदारी की शक्ति और उपभोग बढ़ता है, जो सीधे बाजार में मांग पैदा कर सकता है. गौर करने की बात है कि हाल के दिनों में रेवड़ी राजनीति के तहत देश में हर परिवार को करीब 1,500-3,000 रुपये प्रतिमाह महिला योजना के तहत दिए जाते हैं. अगर दोनों राशियों को जोड़ दिया जाए तो करीब सालाना एक गरीब परिवार को 1 लाख रुपये मिल सकते हैं.
क्यों है एक देश-एक चुनाव जरूरी?
एक देश-एक चुनाव को लेकर केंद्र सरकार की ओर से पिछले काफी समय से प्रयास किए जा रहे हैं क्योंकि सरकार को लगता है कि इससे समय और पैसे की बर्बादी होती है. साथ ही विकास कार्य भी चुनाव के दौरान रुक जाते हैं. लोकसभा, विधानसभा, नगर निगम और पंचायत चुनाव में चार बार आचार संहिता लगती है, जिससे विकास कार्य अवरुद्ध हो जाता है. देश में अमूमन हर छह महीने पर चुनाव होते हैं और केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार, सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष चुनावी मैदान में डटे रहते हैं. पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी उच्चस्तरीय कमेटी अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंप चुकी है. लोकसभा और विधानसभा चुनावों के साथ-साथ नगरपालिकाओं और पंचायत चुनावों को एक साथ कराने की सिफारिश की गई है. गौर करने की बात है कि 47 राजनीतिक दलों ने अपने विचार दिए थे, जिसमें 32 दलों ने संसाधनों के बेहतर उपयोग और एक साथ चुनाव कराने का समर्थन किया है, जबकि 15 दलों ने विरोध किया है. रिपोर्ट के पक्ष में दलील है कि एक देश-एक चुनाव से समय और धन दोनों बचेंगे, क्योंकि चुनावी आचार संहिता लागू होने से सारा काम ठप पड़ जाता है. यही नहीं, समय-समय पर होने वाले चुनावों की वजह से पार्टियां पांच साल तक चुनाव प्रचार में ही लगी रहती हैं, जिसके कारण सरकारें आवश्यक नीतिगत निर्णय नहीं ले पातीं और उन्हें विभिन्न योजनाओं को लागू करने में समस्या आती है.
चुनाव में पैसे पानी की तरह बहता है
सार्वजनिक नीतियों के शोध आधारित विश्लेषक एन. भास्कर राव के अनुसार लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय के चुनाव में करीब 10 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है. सीएमएस की एक स्टडी के अनुसार 2019 के लोकसभा चुनाव में करीब 55 हजार करोड़ से लेकर 60 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. जाहिर है कि अगर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक ही साथ हुए तो इससे काले धन और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में मदद मिलेगी.
यह किसी से छिपा नहीं है कि चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों द्वारा काले धन का खुलकर इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि देश में प्रत्याशियों द्वारा चुनावों में किए जाने वाले खर्च की सीमा निर्धारित की गई है, किन्तु राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले खर्च की कोई सीमा तय नहीं की गई है. बीच बीच में पैसे लेकर टिकट बेचने की बात आती है और साथ ही साथ वोटर खरीदने के भी आरोप लगते रहते हैं.
केन्द्र में जिसकी सत्ता, उसकी जीत
एक देश-एक चुनाव कोई अनूठा प्रयोग नहीं है, क्योंकि 1952, 1957, 1962, 1967 में ऐसा हो चुका है, जब लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ करवाए गए थे. यह सिलसिला तब टूटा, जब 1968-69 में कुछ राज्यों की विधानसभाएं विभिन्न कारणों से समय से पहले ही भंग कर दी गईं. ये भी देखा गया है कि इस दौरान लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव कराने से राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को ही फायदा हुआ था. हालांकि उस दौरान एक ही पार्टी कांग्रेस ही मजबूत थी, जबकि दूसरी पार्टियां कमजोर थीं. यह बात भी किसी से छिपी हुई नहीं है कि चार लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की लगातार जीत हुई है. 1952 से लेकर 1967 तक लोकसभा और विधानसभा के कुल 80 चुनाव हुए हैं, जिनमें 70 बार कांग्रेस जीती है, जबकि अन्य पार्टियों को 10 बार ही जीत मिली है. इन चुनावों में कांग्रेस पार्टी का सफलता दर 87.5 फीसदी रहा है. क्या माना जाए कि केंद्र में जो सत्ताधारी पार्टी होती है, उसे फायदा होता है? लेकिन ओडिशा में 2014 और 2019 में विधानसभा और लोकसभा चुनाव साथ-साथ हुए थे. इन चुनावों के समय केंद्र में बीजेपी की सरकार थी, लेकिन राज्य में नवीन पटनायक की पार्टी बीजेडी की जीत हुई थी. अरुणाचल प्रदेश में 2019 में लोकसभा और विधानसभा का चुनाव साथ-साथ हुए थे, इन दोनों चुनावों में बीजेपी की ही जीत हुई है. महाराष्ट्र में लोकसभा 2024 में एनडीए की हार हुई तो विधासभा में जीत हुई है.
विपक्षी पार्टियों की आपत्ति
47 में से 15 पार्टियों ने एक देश-एक चुनाव का विरोध किया, उनकी दलील है कि क्षेत्रीय दलों के हाशिए पर चले जाने के बारे में चिंता व्यक्त की गई है. जबकि जो अभी विपक्ष में है, वही एक जमाने में सत्ता में थी. उस दौरान आजादी से लेकर 1967 तक देश में एक साथ विधानसभा और लोकसभा के चुनाव होते थे. अगर लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाए गए तो ज्यादा संभावना है कि राष्ट्रीय मुद्दों के सामने क्षेत्रीय मुद्दे गौण हो जाएंगे. दरअसल लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव के स्वरूप और मुद्दे बिल्कुल अलग-अलग होते हैं. लोकसभा के चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं, जबकि विधानसभा का चुनाव क्षेत्रीय मुद्दों पर आधारित होता है. लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव कराने से क्षेत्रीय मुद्दे दब जाएंगे और राष्ट्रीय मुद्दों पर चुनाव होने से केंद्र में बैठी सत्ताधारी पार्टी को फायदा हो सकता है.
क्या एक साथ चुनाव कराना खतरे की घंटी है
मसलन 2019 लोकसभा चुनाव के पहले मध्यप्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के चुनाव हुए थे और बीजेपी पांचों राज्यों में हार गई थी. इसी हार से सबक लेते हुए बीजेपी ने दनादन फैसले लिए, जैसे आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला, किसान सम्मान निधि का ऐलान, पिछड़ा आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का कार्य किया. साथ ही एससी और एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद से पलट दिया गया. एक देश-एक चुनाव होता है तो ऐसे में पार्टियों को जनता के मूड का पता नहीं चलेगा और एकाएक चुनाव में जाने से उन्हें सुधरने और संवरने का वक्त नहीं मिलेगा. यही 2024 के चुनाव में हुआ, बीजेपी मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ का चुनाव जीती थी. मोदी सरकार का हौसला इतना बढ़ गया था कि “मोदी की गारंटी” और “अबकी बार 400 के पार” के नारे चल रहे थे. और बीच में राम मंदिर का उद्घाटन हुआ और लगा कि इस बार बीजेपी बिना चुनाव के ही चुनाव जीत गई, लेकिन कभी-कभी अति आत्मविश्वास खतरनाक होता है और वही हुआ. बीजेपी बहुमत से दूर रह गई और लोकसभा में अपने बलबूते पर सिर्फ 240 सीटें ही जीत पाई. आखिरकार गठबंधन के बहुमत के दम पर सरकार बनी.
देश बदल गया है, वोटर के मूड भी बदल जाते हैं
बदल गया है देश. आजादी के बाद का भारत, इमरजेंसी के बाद का भारत, उदारवाद के दौर का भारत और अब आकांक्षी वर्ग तथा सोशल मीडिया के प्रभाव ने चुनावी रणनीतियों को पूरी तरह बदल दिया है. अब देश में 2-3 महीने के भीतर माहौल बदला जा सकता है. उस समय मीडिया लगभग नहीं के बराबर था, शिक्षा की कमी थी, गरीबी थी और उस तरह का सशक्त विपक्ष भी मौजूद नहीं था. अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं. एक देश-एक चुनाव से राजनीतिक पार्टियों को नुकसान भी हो सकता है, क्योंकि एक साथ चुनाव होने पर उन्हें यह पता नहीं चल पाएगा कि मतदाता उनसे नाराज हैं या खुश. सरकार की नीतियों और फैसलों से राजनीतिक माहौल बनता है. खासकर विपक्षी पार्टियां और सोशल मीडिया सरकार पर दबाव बनाते हैं, लेकिन इस दबाव की असली अग्निपरीक्षा चुनावों में होती है. इससे पता चलता है कि सरकार और विपक्षी पार्टियां कितने पानी में हैं. सरकार ने एक देश-एक चुनाव की दिशा में बढ़ने से पहले क्या यह सोचा है कि पल-पल बदलते जनमत का सामना कैसे किया जाएगा और उसका जवाब किस प्रकार दिया जाएगा? क्योंकि चुनाव ही वह माध्यम हैं, जिनसे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है.
रोजी-रोटी पर पड़ेगा असर
चुनाव सिर्फ हार और जीत का खेल नहीं है, बल्कि रोजी-रोटी का भी सवाल है. चुनाव के दौरान गाड़ियों, पोस्टर-बैनर, खाने-पीने, रहने-सहने समेत कई तरह की सेवाओं और संसाधनों का इस्तेमाल होता है. यही नहीं, अब चुनाव पूरी तरह हाईटेक हो चुके हैं और इनमें करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं.
साथ ही चुनावी रिसर्च, सर्वे और एक्जिट पोल का बड़ा कारोबार भी इससे जुड़ा हुआ है. यदि एक देश-एक चुनाव लागू होता है, तो इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को नुकसान हो सकता है. आज लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां एजेंसियों और रणनीतिकारों के सहारे चुनाव लड़ती हैं.
यह केवल चुनावी प्रक्रिया का बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को प्रभावित करने वाला बड़ा संरचनात्मक परिवर्तन होगा. खैर, सरकार ने इस दिशा में आगे बढ़ने का मन बना लिया है. यदि चुनावी खर्च में वास्तविक बचत होती है, तो सरकार उस धन का उपयोग बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबी उन्मूलन जैसी योजनाओं में कर सकती है जैसे इस पैसे से देश से गरीबी मिटाया जा सकता है.
(धर्मेंद्र कुमार सिंह, चुनाव और राजनैतिक विश्लेषक हैं)














