कैसे होगा नई सरकार का फॉर्मेशन? स्पीकर से लेकर मंत्रियों तक, बिहार में सत्ता परिवर्तन का पूरा 'ब्लूप्रिंट'

Bihar New government : जेडीयू चाहती है कि अगर मुख्यमंत्री भाजपा का बनता है, तो स्पीकर का पद उसके पास आए. स्पीकर का पद केवल औपचारिक नहीं होता, बल्कि सदन की कार्यवाही, विधायकों की सदस्यता और कई महत्वपूर्ण फैसलों में उसकी बड़ी भूमिका होती है

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  • बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 9 तारीख को दिल्ली जाएंगे और लौटने के बाद पद से इस्तीफा दे सकते हैं.
  • भाजपा के पास ज्यादा सीटें हैं इसलिए वह मुख्यमंत्री पद पर अपना स्वाभाविक दावा मानती है.
  • जेडीयू मुख्यमंत्री पद भाजपा को देने के बावजूद सरकार में अपनी प्रभावशाली भूमिका बनाए रखना चाहती है.
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बिहार में नई सरकार के गठन को लेकर अब घटनाक्रम तेजी से आगे बढ़ रहा है. राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि 9 तारीख को नीतीश कुमार दिल्ली जाएंगे और वहां से लौटने के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं. इसके बाद BJP के नेतृत्व में नई सरकार बनने की प्रक्रिया शुरू होगी. लेकिन यह बदलाव केवल मुख्यमंत्री के चेहरे का नहीं होगा, बल्कि बिहार की राजनीति में सत्ता के संतुलन और गठबंधन की नई व्यवस्था तय करेगा. इसी वजह से जेडीयू और भाजपा के बीच लगातार बातचीत का दौर जारी है और हर फैसले को बहुत सोच-समझकर लिया जा रहा है.

नई सरकार का फॉर्मेशन कैसा होगा, इसे समझने के लिए विधानसभा के नंबर गेम को देखना जरूरी है. मौजूदा स्थिति में भाजपा के पास ज्यादा सीटें हैं, इसलिए पार्टी यह मानती है कि मुख्यमंत्री पद पर उसका स्वाभाविक दावा बनता है. दूसरी तरफ जेडीयू का कहना है कि उसने लंबे समय तक सरकार चलाई है और प्रशासनिक अनुभव उसके पास है, इसलिए मुख्यमंत्री पद भले भाजपा को मिले, लेकिन सरकार में उसकी भूमिका कमजोर नहीं होनी चाहिए. यही वजह है कि जेडीयू सम्मानजनक हिस्सेदारी और प्रभावशाली पदों की मांग कर रही है.

सबसे बड़ा मुद्दा विधानसभा स्पीकर के पद का 

जेडीयू चाहती है कि अगर मुख्यमंत्री भाजपा का बनता है, तो स्पीकर का पद उसके पास आए. स्पीकर का पद केवल औपचारिक नहीं होता, बल्कि सदन की कार्यवाही, विधायकों की सदस्यता और कई महत्वपूर्ण फैसलों में उसकी बड़ी भूमिका होती है. इसलिए यह पद जेडीयू के लिए एक तरह से राजनीतिक सुरक्षा कवच माना जा रहा है. भाजपा के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा, क्योंकि स्पीकर का पद सरकार के लिए रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण होता है.

विभागों का बंटवारा इस बार सबसे संवेदनशील और कठिन मुद्दा

दूसरा बड़ा मुद्दा महत्वपूर्ण मंत्रालयों का है. जेडीयू चाहती है कि वित्त, ग्रामीण विकास, ऊर्जा, शिक्षा और जल संसाधन जैसे विभाग उसके पास बने रहें. इन विभागों के जरिए सरकार की योजनाएं और बजट सीधे जनता तक पहुंचते हैं, इसलिए इन पर पकड़ बनाए रखना राजनीतिक रूप से जरूरी माना जाता है. वहीं, भाजपा की नजर गृह, पथ निर्माण, स्वास्थ्य और उद्योग जैसे विभागों पर है, क्योंकि ये विभाग कानून-व्यवस्था और विकास की छवि से जुड़े होते हैं. इसी कारण विभागों का बंटवारा इस बार सबसे संवेदनशील और कठिन मुद्दा बन गया है.

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इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू यह है कि भाजपा मुख्यमंत्री पद लेकर बिहार में अपना स्थायी नेतृत्व स्थापित करना चाहती है. लंबे समय से पार्टी गठबंधन में दूसरे नंबर की भूमिका में रही है, लेकिन अब वह राज्य में अपनी अलग पहचान और नेतृत्व दिखाना चाहती है. अगर भाजपा का मुख्यमंत्री बनता है, तो यह पार्टी के लिए एक बड़ा राजनीतिक संदेश होगा कि बिहार की राजनीति में उसकी भूमिका निर्णायक हो गई है.

दूसरी तरफ जेडीयू के सामने भी बड़ी चुनौती है. मुख्यमंत्री पद के बिना पार्टी को अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को यह भरोसा दिलाना होगा कि उसकी ताकत और प्रभाव कम नहीं हुआ है. इसलिए जेडीयू यह सुनिश्चित करना चाहती है कि सरकार के महत्वपूर्ण फैसलों में उसकी भूमिका बनी रहे और उसे केवल सहयोगी दल के रूप में न देखा जाए.

आने वाले कुछ दिन बिहार की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं. मुख्यमंत्री पद, स्पीकर का पद और मंत्रालयों का बंटवारा—इन तीनों फैसलों से यह तय होगा कि नई सरकार कितनी मजबूत और स्थिर बनती है. यही फैसले आगे की राजनीति और गठबंधन के रिश्तों की दिशा भी तय करेंगे.

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