बिहार विधान परिषद की 10 सीटों पर चुनाव, NDA में बंटवारे पर मंथन; निशांत-दीपक की एंट्री तय

सीट बंटवारे और उम्मीदवारों के जरिए सभी दल अपने सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने की कोशिश करेंगे. एनडीए जहां सहयोगियों को साथ रखकर मजबूत एकता दिखाना चाहता है, वहीं महागठबंधन इस चुनाव के जरिए अपनी मौजूदगी बनाए रखने की कोशिश करेगा.

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  • बिहार विधान परिषद की दस सीटों के चुनाव में एनडीए गठबंधन सभी सीटों पर जीत की कोशिश कर रहा है
  • जेडीयू को चुनाव में सबसे अधिक चार सीटें मिल सकती हैं, जबकि बीजेपी को दो से तीन सीटें मिलने की संभावना है
  • स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार और पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का विधान परिषद सदस्य बनना लगभग तय है
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पटना:

बिहार में विधान परिषद की 10 सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर एनडीए के भीतर हलचल तेज हो गई है. यह चुनाव सिर्फ सीट जीतने का मामला नहीं है, बल्कि आने वाले चुनाव से पहले राजनीतिक ताकत दिखाने और सहयोगी दलों को साधने की बड़ी कवायद भी मानी जा रही है. एनडीए में शामिल सभी दल इन सीटों में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं. इसी वजह से सीट बंटवारे को लेकर लगातार चर्चा और मंथन चल रहा है.

243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में विधान परिषद की एक सीट जीतने के लिए करीब 23 से 25 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है. मौजूदा समय में एनडीए के पास विधानसभा में मजबूत संख्या है. ऐसे में गठबंधन आराम से 8 से 9 सीटें जीत सकता है. एनडीए की कोशिश सभी 10 सीटों पर जीत हासिल करने की है, जबकि महागठबंधन कम से कम एक सीट बचाने की रणनीति बना रहा है.

सूत्रों के मुताबिक सीट बंटवारे में सबसे बड़ी हिस्सेदारी जेडीयू को मिल सकती है. इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि खाली हो रही सीटों में कई सीटें फिलहाल जेडीयू के पास हैं. माना जा रहा है कि जेडीयू को 4 सीटें मिल सकती हैं. BJP के खाते में 2 या 3 सीटें जा सकती हैं. बाकी सीटों को लेकर छोटे सहयोगी दल अपनी दावेदारी कर रहे हैं.

एनडीए में शामिल चिराग की पार्टी एलजेपी, जीतन राम मांझी की हम (HAM) और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएम भी सीट चाहती है. विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए नेतृत्व किसी भी सहयोगी दल को नाराज नहीं करना चाहता. यही वजह है कि सभी दलों को साधने की कोशिश हो रही है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सीट बंटवारे में केवल संख्या नहीं, बल्कि जातीय और सामाजिक समीकरण भी बड़ा रोल निभाएंगे.

सबसे ज्यादा चर्चा स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार को लेकर हो रही है. मंत्री बनने के बाद उन्हें छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना जरूरी है. ऐसे में उन्हें विधान परिषद भेजा जाना पक्का है.  इसी तरह पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का नाम भी उम्मीदवारों में शामिल है. वे भी फिलहाल किसी सदन के सदस्य नहीं हैं.

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इसके अलावा जेडीयू कुछ नए चेहरों को मौका देकर सामाजिक संतुलन बनाने की कोशिश कर सकती है. पार्टी अति पिछड़ा (EBC), मुस्लिम, कुशवाहा और दलित वर्ग से उम्मीदवार उतार सकती है. जेडीयू की कोशिश होगी कि विधानसभा चुनाव से पहले अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत संदेश दिया जाए.

वहीं बीजेपी भी जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर उम्मीदवार तय कर सकती है. पार्टी गैर-यादव पिछड़ा वर्ग, सवर्ण और दलित समाज के नेताओं को मौका देने पर विचार कर रही है. बीजेपी संगठन में सक्रिय नेताओं और चुनावी रणनीति में अहम भूमिका निभाने वाले चेहरों को भी विधान परिषद भेज सकती है.

हम (HAM) प्रमुख जीतन राम मांझी भी अपने दल के लिए कम से कम एक सीट चाहते हैं. मांझी महादलित राजनीति का बड़ा चेहरा माने जाते हैं और एनडीए उन्हें नाराज नहीं करना चाहता. वहीं चिराग पासवान की पार्टी भी अपने कोटे की मांग कर रही है. ऐसे में एनडीए नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि सीटें कम हैं और दावेदार ज्यादा.

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महागठबंधन भी इस चुनाव को गंभीरता से ले रहा है. आरजेडी अपनी एक सीट बचाने की कोशिश करेगी. पार्टी मुस्लिम-यादव समीकरण के साथ विपक्षी एकजुटता का संदेश देना चाहती है. हालांकि संख्या बल एनडीए के पक्ष में होने की वजह से महागठबंधन की राह आसान नहीं मानी जा रही

.राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधान परिषद का यह चुनाव आने वाले विधानसभा चुनाव का ट्रेलर साबित हो सकता है. सीट बंटवारे और उम्मीदवारों के जरिए सभी दल अपने सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने की कोशिश करेंगे. एनडीए जहां सहयोगियों को साथ रखकर मजबूत एकता दिखाना चाहता है, वहीं महागठबंधन इस चुनाव के जरिए अपनी मौजूदगी बनाए रखने की कोशिश करेगा.

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