धरती के नीचे छिपी एक और दुनिया! आर्कटिक महासागर की गहराइयों में मिला रहस्यमयी जीवन

आर्कटिक महासागर की गहराइयों में वैज्ञानिकों को मिली एक रहस्यमयी दुनिया, जहां बिना सूरज की रोशनी के फल-फूल रहा है जीवन. जानिए इस ऐतिहासिक खोज की पूरी कहानी.

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धरती के नीचे छिपी एक और दुनिया!

वैज्ञानिकों ने आर्कटिक महासागर की गहराइयों में एक ऐसी छिपी हुई दुनिया की खोज की है, जिसने समुद्र के भीतर जीवन और पृथ्वी के कार्बन चक्र को लेकर हमारी सोच को पूरी तरह बदल कर रख दिया है. न्यूज़वीक की रिपोर्ट के मुताबिक,  रहस्यमयी इकोसिस्टम समुद्र की सतह से करीब 2.5 मील नीचे, घोर अंधेरे और जमा देने वाली ठंड के बीच मौजूद है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि यहां जीवन पूरी तरह फल-फूल रहा है.

यह खोज इसलिए भी बेहद अहम मानी जा रही है क्योंकि इसका सीधा असर ग्लोबल क्लाइमेट साइंस और आर्कटिक समुद्र तल से खनिज निकालने जैसे मुद्दों पर पड़ सकता है. आने वाले समय में यह खोज अंतरराष्ट्रीय नीतियों और समुद्री संरक्षण से जुड़े फैसलों की दिशा तय कर सकती है.

वैज्ञानिकों की टीम ने किया ऐतिहासिक खुलासा

इस अनोखी खोज का नेतृत्व वैज्ञानिक जुलियाना पानिएरी और जोनाथन टी. सी. कोपली ने किया. उनकी टीम ने आर्कटिक महासागर के नीचे अब तक के सबसे गहरे मीथेन हाइड्रेट माउंड्स खोजे हैं, जिन्हें फ्रेय्या माउंड्स नाम दिया गया है. ये माउंड्स ग्रीनलैंड सागर के मोलॉय रिज क्षेत्र में स्थित हैं और समुद्र की सतह से करीब 4,000 मीटर नीचे पाए गए हैं.

बर्फ जैसे मीथेन से बनी संरचनाएं, जिनमें बसता है जीवन

शोध के मुताबिक, ये माउंड्स गैस हाइड्रेट से बने हैं, जो बर्फ जैसी संरचनाएं होती हैं और इनमें मीथेन, अन्य गैसें और कच्चा तेल फंसा होता है. ये संरचनाएं सीधे समुद्र तल से बाहर निकलती हैं और यहीं एक पूरा जैविक संसार विकसित हो गया है.

वैज्ञानिकों ने इस इलाके की जांच के लिए ‘ऑरोरा' नाम के एक रिमोट कंट्रोल वाहन का इस्तेमाल किया. इसमें उन्होंने शंकु के आकार के जमे हुए मीथेन और तेल के ढेर देखे, जिनकी चौड़ाई छह मीटर तक थी और जिनसे लगातार गैस के बुलबुले निकल रहे थे.

बिना सूरज की रोशनी के अंधेरे में पलता जीवन

ऑरोरा से ली गई तस्वीरों में इन माउंड्स के आसपास एम्फिपॉड्स, लाल झींगे, घोंघे, पॉलीकीट कीड़े और कई तरह के क्रस्टेशियंस नजर आए. वैज्ञानिकों ने यहां 20 से ज्यादा प्रजातियों को रिकॉर्ड किया है. यहां पाए गए स्क्लेरोलिनम ट्यूब वर्म्स के घने समूह इस बात का सबूत हैं कि जीवन कितनी विषम परिस्थितियों में भी खुद को ढाल सकता है.

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सूरज नहीं, रसायन है जीवन का आधार

इस पूरे इकोसिस्टम की नींव कीमो-सिंथेसिस पर टिकी है. इसमें बैक्टीरिया मीथेन और सल्फाइड जैसे रसायनों से ऊर्जा प्राप्त करते हैं और यही बैक्टीरिया पूरे फूड चेन का आधार बनते हैं. रासायनिक जांच में यह भी सामने आया कि यहां मौजूद गैसों में मीथेन के साथ-साथ एथेन, प्रोपेन और ब्यूटेन भी शामिल हैं, जो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि ये गैसें पृथ्वी की गहराइयों से आ रही हैं.

अब तक की सबसे गहरी गैस रिसाव खोज

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अब तक का सबसे गहरा गैस हाइड्रेट रिसाव है. इससे पहले ऐसे रिसाव 2,000 मीटर से कम गहराई पर ही देखे गए थे. जहाज पर लगे सोनार उपकरणों ने मीथेन से भरपूर गैस के विशाल गुबार भी रिकॉर्ड किए, जो 3,300 मीटर से ज्यादा ऊंचाई तक उठते पाए गए. इन्हें दुनिया के सबसे ऊंचे गैस फ्लेयर्स में गिना जा रहा है.

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भविष्य के लिए चेतावनी और उम्मीद दोनों

यह खोज न सिर्फ समुद्र के भीतर जीवन को लेकर नई समझ देती है, बल्कि यह भी सवाल खड़े करती है कि क्या हमें ऐसे संवेदनशील इलाकों में डीप-सी माइनिंग करनी चाहिए या नहीं. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह इकोसिस्टम बेहद नाजुक है और इसमें किसी भी तरह की छेड़छाड़ इसके संतुलन को बिगाड़ सकती है.

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