- यूरोपीय संघ और भारत ने लगभग दो दशकों की बातचीत के बाद एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौते की घोषणा की है
- अमेरिका विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन इस समझौते को नकारात्मक रूप से देख रहा है और इससे असंतुष्ट है
- यूरोप अपनी अर्थव्यवस्था को अमेरिका से स्वतंत्र करने के लिए भारत को एक प्रभावी साझेदार मान रहा है
यूरोप-भारत ट्रेड डील ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है. अब तक किसी भी देश की तरफ से आधिकारिक कोई रिएक्शन नहीं आया है, मगर हर देश में इसे लेकर चर्चा बहुत हो रही है. अमेरिका के सभी मीडिया संस्थानों में इसे प्रमुखता से दिखाया और बताया जा रहा है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने तो यहां तक लिख दिया है कि ट्रंप के कारण 17 सालों से टल रहे समझौते को अंतिम रूप दे दिया गया.
न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है, "यूरोपीय संघ और भारत के नेताओं ने मंगलवार को लगभग दो दशकों की बातचीत के बाद एक व्यापार समझौते की घोषणा की. राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा वैश्विक व्यवस्था को लगातार बदलने और लंबे समय से चले आ रहे गठबंधनों की परीक्षा लेने के कारण दोनों पक्षों के लिए यह समझौता और भी जरूरी हो गया है. हालांकि अंतिम मुक्त व्यापार समझौते को अभी ब्रुसेल्स और नई दिल्ली में कानूनी जांच से गुजरना होगा, लेकिन यह समझौता दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक समूह और सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था भारत को एक साथ लाता है. यह ऐसे समय में हुआ है, जब संयुक्त राज्य अमेरिका को एक कम विश्वसनीय आर्थिक साझेदार के रूप में देखा जा रहा है और चीन सस्ते सामानों से दुनिया को भर रहा है."
मतलब साफ है कि अमेरिका में इसे राष्ट्रपति ट्रंप की नाकामी और चीन के भारत और यूरोप की जवाबी तैयारी मान रहा है. ट्रंप की तरफ से अब तक कोई इस पर रिएक्शन नहीं आया है, मगर समझौते से पहले अमेरिकी ट्रेजरी सचिव (वित्त मंत्री) स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यूरोप ने भले रूस के साथ अपने तेल खरीद को महत्वपूर्ण रूप से समाप्त कर दिया है, लेकिन अब वो भारत में रिफाइन हो रहे रूसी तेल उत्पादों को खरीदने की तैयारी में है और इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध को वित्त पोषित (फंडिंग) कर रहे हैं. इससे समझा जा सकता है कि अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत और यूरोप इस समझौते को अंतिम रूप दें.
क्यों नहीं चाहता था अमेरिका
अमेरिका तकनीक और गठबंधनों के दम पर ही सुपरपावर बना है. यूरोप का उसे पूरा समर्थन मिला है. यूरोप ने अपनी सारी ऊर्जा अमेरिका में लगा दी. धीरे-धीरे यूरोप खुद अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर होने लगा. मगर, ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद यूरोप को इस बात का सबसे ज्यादा एहसास हुआ. पहले यूक्रेन युद्ध को लेकर उनकी बयानबाजी और फिर ग्रीनलैंड को लेकर उनके रुख ने यूरोप के सब्र की सीमा तोड़ दी.
ट्रंप के टैरिफ की धमकी के बाद यूरोप को समझ आया कि उसे अपनी अर्थव्यवस्था को अमेरिका के अलावा अन्य देशों के लिए भी खोलना पड़ेगा. रूस उसका दुश्मन देश है और चीन के सस्ते सामान से यूरोप पहले ही डरा हुआ है. ऐसे में यूरोप को भारत ही सबसे प्रभावी साझेदार लगा. मगर यही अमेरिका को चुभ रहा है. अमेरिका नहीं चाहता कि यूरोप के जरिए भारत उसे चैलेंज करने की स्थिति में पहुंचे. अमेरिका को पता है कि यूरोप तकनीक में उससे पीछे तो है, लेकिन इतना भी नहीं कि अगर वो चाह ले तो अमेरिका को टक्कर नहीं दे सकता. भारत के पास मैन पावर है. वो तेजी से बढ़ी अर्थव्यवस्था है. अगर ये दोनों ताकतें मिल जाएं तो अमेरिका की बादशाहत को चंद सालों में ही चुनौती मिल सकती है.
चीन इस डील को लेकर क्या सोच रहा
चीन की हालत तो और भी अजीब है. चीन की मीडिया तक में इस डील को लेकर कोई चर्चा ही नहीं है. वो इसे बिल्कुल महत्व नहीं दे रहा है. कारण उसे पता है कि अमेरिका जो सामान यूरोप को बेचता है, वो भारत नहीं बेचता. मगर चीन को भारत कड़ी टक्कर दे सकता है. यही कारण है कि चीन खुद भी यूरोप को साधने में लगा है. कनाडा के प्रधानमंत्री चीन से डील को लेकर बातचीत कर रहे हैं. फिनलैंड के प्रधानमंत्री भी आज चीन में हैं.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री भी चीन के दौरे पर जाने वाले हैं. चीन चाहता है कि अमेरिका समर्थक देशों के साथ वो ऐसे समझौते कर ले, जिससे दुनिया में उसकी बादशाहत कायम हो. यही कारण है कि वो लगातार यूरोप से दोस्ती के संकेत दे रहा है. हालांकि, वो भारत के साथ संबंधों को अच्छे बनाए रखना चाहता है. यही कारण है कि वो इस पूरे मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है, जिससे दुनिया को ये मैसेज न जाए कि वो इस डील को लेकर सतर्क है
रूस की नजर भारत के हथियार डील पर
रूस की नजर भी इस डील पर बनी हुई है. रूसी समाचार एजेंसी तास ने पीएम मोदी के हथियारों पर दिए बयान को सबसे गंभीरता से लिया है. तास ने लिखा है कि नई दिल्ली को उम्मीद है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र में साझेदारी पर हस्ताक्षर से संयुक्त रक्षा उत्पादन में विस्तार होगा.
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा. "यह साझेदारी आतंकवाद विरोधी, साइबर सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा में हमारे सहयोग को और मजबूत करेगी. यह नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति हमारी साझा प्रतिबद्धता की पुष्टि भी करेगी, हमें हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने में सक्षम बनाएगी और हमारी रक्षा कंपनियों के बीच संयुक्त उत्पादन के नए अवसर पैदा करेगी." जाहिर है रूस को लग रहा है कि भारत अब अपने रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए यूरोप की तरफ रुख धीरे-धीरे कर रहा है. खासकर तब तक जब तक कि रूस और अमेरिका की तनातनी कम नहीं हो जाती और उस पर लगे प्रतिबंधों में ढील नहीं मिल जाती.
कनाडा ने अमेरिका को दिखाया आईना
कनाडा के ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधन मंत्री टिम हॉजसन ने मंगलवार को कहा कि यूरोपीय संघ के साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता उन वैश्विक महाशक्तियों के लिए एक करारा जवाब है, जो टैरिफ और आर्थिक एकीकरण को दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं. उन्होंने कहा कि कनाडा अपने ग्राहक आधार में विविधता लाने और संयुक्त राज्य अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए भारत को ऊर्जा निर्यात बढ़ाने के लिए उत्सुक है. उन्होंने यह भी कहा कि ओटावा कभी भी अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल उत्पीड़न के लिए नहीं करेगा. हम ऐसी दुनिया में नहीं रहना चाहते जहां सबसे ताकतवर लोग दूसरों पर टैरिफ लगा दें. हम ऐसी दुनिया में रहना चाहते हैं, जहां हम मुक्त व्यापार में विश्वास करते हैं, जहां हम भरोसेमंद रिश्तों में विश्वास करते हैं.
ये भी पढ़ें-
India-EU Trade Deal: विकसित भारत के साथ दुनिया के लिए अहम कैसे समझिए













