डोनाल्ड ट्रंप को भाव क्यों नहीं दे रहे हैं यूरोपीय देश, क्या ग्रीनलैंड बना रेड सिग्नल की वजह

होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अपील पर किसी देश ने ध्यान नहीं दिया है. कोई भी देश उनकी अपील पर आगे नहीं आया है. आइए हम आपको बताते हैं कि इसकी वजह क्या हो सकती है.

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नई दिल्ली:

ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध का आज 19 वां दिन है. युद्ध शुरू होते ही ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया था. इस इलाके में कई जहाजों पर हमले हुए. होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है. ईरान इसी के मुहाने पर स्थित है.होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे व्यस्त तेल शिपिंग मार्ग है. इससे दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल का आना-जाना होता है. गैस भी बड़ी मात्रा में इसी रास्ते से जाती है. इसके बंद होने से दुनिया की अर्थव्यवस्था दबाव में है. होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवाने की कोशिश अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले काफी दिनों से कर रहे हैं. उन्होंने जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और नैटो के सदस्य देशों से अपने युद्ध पोत इस इलाके में भेजने की अपील की. उन्होंने चीन तक से मदद मांग ली. लेकिन किसी भी देश ने अपना युद्ध पोत होर्मुज जलडमरूमध्य में नहीं भेजा. होर्मुज जलडमरूमध्य ट्रंप के लिए परेशानी का सबब बन गया है. क्या ग्रीनलैंड पर कब्जे को लेकर डोनाल्ड ट्रंप का बयान भी इसकी एक वजह है. आइए जानते हैं कि इन देशों ने ट्रंप की अपील को अनसुनी क्यों कर दी.  

डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया से क्या अपील की थी

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्रूथ सोशल प्लेटफार्म पर लिखा था, ''उम्मीद है कि चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और अन्य देश, जो इस कृत्रिम पांबंदी से प्रभावित हुए हैं, वो उस क्षेत्र में अपने जहाज भेजेंगे ताकि होर्मुज जलडमरूमध्य एक ऐसे देश की ओर से खतरा न हो, जिसका पूरी तरह से सफाया हो चुका है.'' वहीं अमेरिकी उर्जा मंत्री क्रिस राइट ने रविवार को कहा था कि राष्ट्रपति ट्रंप ने जिन देशों का जिक्र किया है, उनमें से कुछ के साथ वो संपर्क में हैं. उन्होंने यह भी कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवाने में चीन एक रचनात्मक भागीदार होगा. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप और क्रिस राइट की ये कोशिशें परवान नहीं चढ़ पाईं. किसी भी देश ने ट्रंप की अपील पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी. यह देखकर ट्रंप नाराज हुए.उन्होंने नैटो के भविष्य पर सवाल उठा दिया. इसके साथ ही उन्होंने अगले महीने होने वाली अपनी चीन यात्रा को स्थगित करने तक की धमकी दे दी. इसके बाद भी किसी देश ने उनका साथ नहीं दिया. 

ट्रंप का साथ देने से हिचकिचा क्यों रहे हैं देश 

ट्रंप की अपील पर मिली ठंडी प्रतिक्रिया की वजह का सवाल हमने मध्य पूर्व मामलों की जानकार और थिंक टैंक ग्रेटर वेस्ट एशिया फोरम, इंडिया की संस्थापक सदस्य डॉक्टर मंजरी सिंह से पूछा. उनका कहना था कि इन देशों की हिचकिचाहट की वजह ये तीन प्रमुख चिंताएं हो सकती हैं, संघर्ष को हिंद महासागर तक फैलने से बचाना, मध्य पूर्व के इस युद्ध का आर्थिक और रणनीतिक भार उठाने की अनिच्छा और इसके लिए पर्याप्त समुचित बातचीत की कमी. उनका कहना था कि देश अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले ले रहे हैं, जो कि ठीक बात है. उनका कहना था कि कई देशों,खासकर यूरोपीय देशों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि यह उनका संघर्ष नहीं है. इन देशों ने सैन्य गठबंधन बनाने की जगह कूटनीति को वरीयता दी है. वो कहती हैं कि यूरोपीय देशों की बदलती जनसांख्यिकी और कुछ देशों में हो रहे जनसांख्यिकीय उलटफेर को भी इस रुख के पीछे की वजह होने से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

डॉक्टर मंजरी कहती हैं कि भारत का रुख भी इसी तरह संतुलित और सोच-समझकर तय किया गया है.उनका कहना था कि अदन की खाड़ी की सुरक्षा करने वाले समुद्री टास्क फोर्स का हिस्सा होने के बावजूद, भारत के होर्मुज जलडमरूमध्य में युद्ध के दौरान किसी गठबंधन में शामिल होने की संभावना कम है. ऐसा करने से उसकी तटस्थता और रणनीतिक स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है. होर्मुज जलडमरूमध्य का ऊर्जा और व्यापार के लिए महत्व देखते हुए,भारत अपनी नौसेना को मुख्य रूप से अपने जहाजों की सुरक्षा के लिए तैनात कर रहा है.

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क्या डोनाल्ड ट्रंप के व्यवहार से दुखी हैं यूरोपीय देश

ट्रंप ने कहा था कि यूरोप और चीन बहुत हद तक खाड़ी से आने वाले तेल पर निर्भर हैं. उन्होंने कहा था कि अगर कोई प्रतिक्रिया नहीं आती है, तो यह 'नैटो के भविष्य के लिए बहुत बुरा' हो सकता है. उनके इस बयान को नैटो को धमकी के तौर पर देख गया.

ईरान के साथ जारी युद्ध को लेकर डोनाल्ड ट्रंप को घरेलू मोर्चे पर भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है. अमेरिका के कई शहरों में ईरान के समर्थन में प्रदर्शन हुए हैं.

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डॉक्टर पवन चौरसिया भारतीय थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन में रिसर्च फेलों हैं. ट्रंप को मिली मित्र देशों की प्रतिक्रिया का सवाल हमने उनसे पूछा. इस सवाल पर वो कहते हैं, ''इसकी दो प्रमुख वजहें हैं. पहली यह कि कोई भी देश किसी दूसरे देश के युद्ध में शामिल होना अपने लिए मुसीबल मोल लेना जैसा मानता है. दूसरी वजह यह है कि जिन यूरोपिय देशों से डोनाल्ड ट्रंप अपील कर रहे है, उन्हें ही या नैटो के सदस्य देशों को उन्होंने अभी महीने भर पहले ही जिस तरह से लताड़ा और ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की बात की है. वो कहते हैं कि ट्रंप ने यूरोप के नेताओं के साथ जिस तरह का बर्ताव किया, उन्हें भला बुरा कहा और ग्रीनलैंड को लेने का जो नैरेटिव गढ़ा, इससे अमेरिका की विश्वसनीयता पर सवाल उठा है. 

वो कहते हैं कि होर्मुज जलडमरूमध्य की संरचना भी एक बड़ी वजह है. वो कहते हैं कि होर्मुज में लड़ने के लिए ईरान को बड़े जहाजों की जरूरत नहीं है, वह नावों से हमला कर तेल से भरे टैंकरों को तबाह कर सकता है, ऐसे में कोई दूसरा देश वहां अपना पोत भेजने का जोखिम क्यों उठाएगा, क्योंकि सैनिकों की शहादत पर उनके अपने देश में भी उनपर दबाव पड़ेगा. लोग सवाल उठाएंगे कि हम अमेरिका के गुलाम क्यों बन रहे हैं. ये परिस्थितियां यूरोप के देशों के लिए डेथ ट्रैप की तरह हैं, जिसमें वो फंसना नहीं चाहते हैं. डॉक्टर चौरसियां कहते हैं कि ट्रंप भी इस बात को समझ गए हैं, इसलिए वो अब अलग राग अलाप रहे हैं. वो अब यह कह रहे हैं कि उनके पास पर्याप्त तेल है, इसलिए उन पर होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने या बंद रहने का कोई असर नहीं पड़ने वाला, जिन देशों का वहां से व्यापार होता है, वो अपना हित देखें. 

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