- मिडिल ईस्ट की जंग सिर्फ मिसाइलों की नहीं, तेल बाजार की भी लड़ाई है.
- अगर तेल 100 डॉलर पार गया तो रूस की कमाई बढ़ सकती है, जबकि अमेरिका-यूरोप पर महंगाई का दबाव बढ़ेगा.
- भारत के लिए यह संकट भी है और अवसर भी.
मिडिल ईस्ट में भड़के युद्ध का असर केवल मिसाइलों और टैंकों तक सीमित नहीं है. बल्कि असली लड़ाई तो दुनिया भर के बड़े बाजारों और सप्लाई चेन को लेकर चल रही है, खासतौर पर तेल और गैस बाजार में इसका प्रभाव सबसे अधिक पड़ा है. ईरान से जुड़ा कोई भी सैन्य टकराव दुनिया की ऊर्जा सप्लाई पर सीधा असर डालता है क्योंकि यह इलाका वैश्विक तेल व्यापार का केंद्र है. इस समय भी वही स्थिति बनती दिख रही है. अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने तेल बाजार को हिला कर रख दिया है. जंग बढ़ने के साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में भी उछाल आने लगा. युद्ध कभी किसी देश या दुनिया के लिए सही नहीं होते और ईरान के साथ युद्ध के कारण खाड़ी देशों पर आए संकट से दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई पर असर पड़ा है. अगर युद्ध और लंबा खिंचा तो तेल संकट का नुकसान जहां कई देशों को होने वाला है वहीं इसका फायदा बहुत हद तक रूस को मिल सकता है.
अभी कुछ दिनों पहले ही अमेरिका की तरफ से यह खबर आई थी कि उसने भारत को रूस से तेल खरीदते रहने की समय सीमा को एक महीना बढ़ा दिया है. ऐसे में कई रणनीतिक और आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो इसका सबसे बड़ा फायदा रूस को हो सकता है. क्योंकि रूस दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस निर्यातकों में से एक है. यानी मिडिल ईस्ट में चल रही जंग का असर हजारों किलोमीटर दूर रूस की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है.
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रूस की तेल से कमाई
रूस की अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल और गैस निर्यात पर निर्भर करती है. रूस दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उत्पादकों में शामिल है. यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे. इन प्रतिबंधों का मकसद रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना था ताकि वह युद्ध जारी न रख सके. लेकिन इन प्रतिबंधों के बावजूद रूस करीब-करीब 70 लाख बैरल तेल प्रति दिन निर्यात करता है. उसके सबसे बड़े तेल खरीदारों में चीन और भारत शामिल हैं.
अब चूंकि ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में बीते दिनों उछाल आया था. हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान को धमकी दिए जाने के बाद कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति डॉलर से नीचे आकर 92 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई थी. पर अगर यह तनाव जारी रहा तो कुछ समय के बाद फिर एक बार कीमतें बढ़ेंगी और ऐसे में रूस को तेल से अरबों डॉलर का अतिरक्त फायदा हो सकता है. दरअसल, तेल महंगा होगा तो निर्यात करने वाले देशों की कमाई खुद-ब-खुद बढ़ जाएगी. और जैसे इस युद्ध के दरम्यान अमेरिका ने भारत को रूस से तेल की खरीद पर एक महीने की राहत दी है, उसी तरह यह संकट जारी रहा तो आने वाले दिनों में यह राहत और बढ़ाई जाएगी जिससे रूस को उसका आर्थिक लाभ भी मिलेगा.
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रूस के लिए क्यों बन सकता है आर्थिक बोनस
यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर कई प्रतिबंध लगाए. यूरोप ने रूस से तेल खरीदना काफी हद तक कम कर दिया. लेकिन रूस ने जल्दी ही एशियाई बाजारों की ओर रुख कर लिया. भारत और चीन जैसे देशों ने रूसी तेल खरीदना जारी रखा. अगर वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ जाती हैं तो रूस को दो तरह से फायदा मिल सकता है.
पहला फायदा, रूस को अपने तेल पर ज्यादा कीमत मिल सकती है.
दूसरा फायदा, कई देश मजबूरी में रूस से ज्यादा तेल खरीदने लग सकते हैं क्योंकि सप्लाई के दूसरे स्रोत महंगे या अस्थिर हो जाएंगे.
यानी जिस समय पश्चिमी देश रूस की अर्थव्यवस्था को दबाने की कोशिश कर रहे हैं, उसी समय तेल बाजार की स्थिति रूस को राहत दे सकती है.
क्या अमेरिका इस स्थिति से बच सकता है?
अमेरिका दुनिया का बड़ा तेल उत्पादक भी है. शेल ऑयल क्रांति के बाद अमेरिका की उत्पादन क्षमता काफी बढ़ गई है. लेकिन फिर भी वैश्विक तेल बाजार की कीमतों पर उसका पूरा नियंत्रण नहीं है. अगर मिडिल ईस्ट में बड़े पैमाने पर युद्ध छिड़ता है और तेल सप्लाई बाधित होती है, तो अमेरिका को भी उच्च कीमतों का सामना करना पड़ेगा. अमेरिका ने कहा भी है कि वह अपनी स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व यानी रणनीतिक तेल भंडार का इस्तेमाल कर सकता है. लेकिन यह समाधान अस्थायी होता है. लंबे समय तक ऊंची कीमतें अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर भी दबाव डाल सकती हैं.
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भारत के लिए यह अवसर है या संकट?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है. भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत तेल विदेशों से खरीदता है. इसलिए जब भी वैश्विक बाजार में तेल महंगा होता है, उसका असर सीधे भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. तेल महंगा होने का मतलब है- आयात बिल बढ़ना, रुपये का कमजोर होना और ऐसे में महंगाई का बढ़ना. लेकिन इस संकट में एक अवसर भी छिपा हो सकता है. यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदना शुरू किया था. इससे भारत को काफी आर्थिक फायदा हुआ.
अब भारत एक बार फिर रूस से अपने तेल खरीद को बढ़ा सकता है जैसे संकेत हाल ही में केंद्र सरकार ने दिए भी हैं. एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देश रूस पर दबाव बनाना चाहते हैं तो दूसरी तरफ रूस भारत का पुराना स्ट्रैटेजिक पार्टनर है. साथ ही मिडिल ईस्ट के कई देश भी भारत के लिए अहम है क्योंकि वहां से न केवल भारत बड़ी मात्रा में तेल आयात करता है बल्कि लाखों की संख्या में वहां भारतीय काम भी करते हैं.
ऐसे में भारत को बेहद संतुलित कूटनीति अपनानी पड़ती है. भारत आम तौर पर किसी भी संघर्ष में खुलकर पक्ष लेने से बचता है और शांति की अपील करता है. यही रणनीति भारत को ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने में मदद करती है.
जंग का वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था पर असर
इतिहास बताता है कि बड़े युद्ध अक्सर ऊर्जा व्यवस्था को बदल देते हैं. 1973 का अरब तेल संकट, 1991 का खाड़ी युद्ध और हाल का यूक्रेन युद्ध, इन सभी घटनाओं ने वैश्विक ऊर्जा राजनीति को बदल दिया. अगर ईरान से जुड़ा संघर्ष लंबा चलता है तो पूरी दुनिया को, खासकर एशियाई देशों चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया को, कम से कम इन तीन चीजों पर काम करना होगा.
पहला, तेल व्यापार के लिए नए रास्ते तलाशने होंगे. दूसरा, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश करनी होगी. और तीसरा, अपने रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने होंगे.
इसके अलावा यह भी बता दें कि रूस, चीन और कई अन्य एशियाई देश पहले से ही डॉलर के बजाय अन्य मुद्राओं में ऊर्जा व्यापार के विकल्प तलाश रहे हैं. कुल मिलाकर आने वाले दिनों में कुछ ऐसे बड़े फैसले लिए जाने का अनुमान है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा राजनीति और कूटनीतिक समीकरणों को बदल सकते हैं.
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