यूरोप ने यूक्रेन से पहले व्‍यापार को चुना... भारत के साथ ट्रेड डील को लेकर EU पर भड़के अमेरिकी वित्त मंत्री 

अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने एक इंटरव्यू में भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भले ही देश अपने आर्थिक हितों की बेहतरी के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन यूरोप के फैसलों ने उसकी यूक्रेन नीति के गंभीर विरोधाभास को उजागर कर दिया है. 

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  • भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच हाल ही में हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर अमेरिका ने नाराजगी जताई है.
  • स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यूरोपीय देशों ने यूक्रेन युद्ध पर व्यापार और आर्थिक हितों को प्राथमिकता दी है.
  • अमेरिकी वित्त मंत्री ने कहा कि यूरोप का यह कदम उसकी यूक्रेन नीति के गंभीर विरोधाभास को उजागर करता है.
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भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच हाल ही में हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर अमेरिका ने नाराजगी जताई है. अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इस डील को लेकर यूरोप पर तीखा हमला किया है. उनका कहना है कि यूरोपीय देशों ने यूक्रेन युद्ध पर अपनी स्पष्ट स्थिति को कमजोर करते हुए व्यापार और आर्थिक हितों को प्राथमिकता दी है. अमेरिकी मीडिया से बातचीत में बेसेंट ने कहा कि भले ही हर देश अपने आर्थिक फैसलों के लिए स्वतंत्र है, लेकिन यूरोप का यह कदम उसकी यूक्रेन नीति के गंभीर विरोधाभास को उजागर करता है. 

बेसेंट ने कहा, “यूरोप और भारत ने इस बड़ी ट्रेड डील पर साइन किए, क्या इससे अमेरिका को खतरा है? नहीं, उन्हें अपने लिए जो सही लगे, वो करना चाहिए. लेकिन यूरोपियन मुझे बेहद निराशाजनक लगते हैं, क्योंकि वे यूक्रेन-रूस युद्ध की फ्रंटलाइन पर खड़े हैं.”

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युद्ध को अप्रत्‍यक्ष रूप से फंड करने का आरोप

उन्होंने यूरोपीय देशों पर उस युद्ध को अप्रत्यक्ष रूप से फंड करने का भी आरोप लगाया, जिसकी वे सार्वजनिक रूप से निंदा करते हैं. रूस के यूक्रेन पर हमले और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद भारत ने बेहद सस्ते रूसी कच्चे तेल की खरीद बढ़ा दी थी. बेसेंट के मुताबिक, इसके बाद यूरोप, भारत से उसी रूसी तेल के रिफाइंड उत्पादों का बड़ा खरीदार बन गया. 

उन्होंने कहा, "भारत ने प्रतिबंधित रूसी तेल खरीदा और फिर उसका रिफाइंड उत्पाद कौन खरीद रहा था? यूरोपीय देश यानी यूरोप खुद अपने खिलाफ चल रहे युद्ध को फंड करता रहा, यह बात गढ़ी हुई लगती है, लेकिन यह सच है.”

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यूरोपीय देश हमारे साथ नहीं आए: बेसेंट 

साथ ही उन्‍होंने कहा कि अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीदने को लेकर 25 फीसदी टैरिफ लगाया, लेकिन यूरोप ने ऐसे किसी कदम में साथ देने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि यूरोप ऐसा इसलिए कर रहा था क्योंकि वह भारत के साथ ट्रेड नेगोसिएशंस को आगे बढ़ाना चाहता था. 

उन्होंने कहा, “यूरोपीय देश हमारे साथ नहीं आए और बाद में पता चला कि वे इस बड़ी ट्रेड डील को पूरा करना चाहते थे. जब भी कोई यूरोपीय नेता यूक्रेन के लोगों की अहमियत की बात करे तो याद रखिए, उन्होंने यूक्रेन से पहले व्यापार को चुना.  व्यापार, यूरोपीय व्यापार, यूक्रेन में युद्ध खत्म करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है.”

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अमेरिका भी सस्ती ऊर्जा पा सकता था: बेसेंट 

बेसेंट ने स्वीकार किया कि ऊर्जा आयात पर यूरोप की भारी निर्भरता ने उसके फैसलों को प्रभावित किया है. उन्‍होंने कहा, “मुझे लगता है कि उनकी समस्या का एक हिस्सा ऊर्जा की जरूरत है. वे सस्ती ऊर्जा चाहते हैं.” साथ ही जोड़ा कि अमेरिका भी सस्ती ऊर्जा पा सकता था, “अगर हम भी प्रतिबंधित रूसी तेल खरीदना चाहते.”

ये बयान इस बात की ओर संकेत करते हैं कि रूस पर आर्थिक दबाव को कितनी सख्ती से लागू किया जाए, इसे लेकर पश्चिमी देशों में तनाव बढ़ रहा है, खासतौर पर तब जब घरेलू आर्थिक और राजनीतिक हित दांव पर हों. यूरोपीय अधिकारी तर्क देते हैं कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, जबकि वे यूक्रेन का समर्थन जारी रखते हैं. 

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यूरोपीय यूनियन और भारत के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हाल के सालों के सबसे बड़े समझौतों में से एक है और माना जा रहा है कि इससे दोनों पक्षों के आर्थिक संबंध गहरे होंगे. हालांकि बेसेंट के बयान यह भी दिखाते हैं कि अमेरिका में इस समझौते को यूरोप की जटिल और विवादित भू-राजनीतिक रणनीति के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है, जहां व्यापार, ऊर्जा और वैश्विक राजनीति के बीच संतुलन लगातार मुश्किल होता जा रहा है. 

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