नई दुनिया को जन्म देने वाले होर्मुज की कहानी- बंद होते ही दुनिया क्यों तड़पने लगी?

नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था कि हिंद महासागर वैश्विक राजनीति का केंद्र है, जो शक्ति इसे नियंत्रित कर लेगी, वही दुनिया पर राज करेगी. आज अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध के बाद होर्मुज स्‍ट्रेट को लेकर छिड़े घमासान से दुनिया में भर में हलचल है.

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  • होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के करीब 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में गैस के निर्यात का प्रमुख मार्ग है.
  • फारस की खाड़ी से ओमान की खाड़ी तक होर्मुज की चौड़ाई करीब 54 किलोमीटर और गहराई 50 से 60 मीटर है.
  • होर्मुज बंद होने से आर्थिक मंदी, तेल उत्पादन में गिरावट और ऊर्जा संकट जैसे गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं.
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दुनिया के नक्शे में होर्मुज जलडमरूमध्य सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक संतुलन की धुरी है. यहीं से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में गैस गुजरती है. यही वजह है कि होर्मुज में हलचल भर से अंतरराष्ट्रीय बाजार कांपने लगते हैं. ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच का तनाव दरअसल जमीन या मिसाइलों से ज्यादा तेल और नियंत्रण की लड़ाई है. होर्मुज के इतिहास और उसकी रणनीतिक ताकत को समझने के बाद यह साफ हो जाता है कि आखिर क्‍यों होर्मुज के बंद होते ही पूरी दुनिया तड़पने लगती है. 

होर्मुज दुनिया के नक्शे में एक खास तरह की बनावट है, जहां समुद्र धरती के बीच रास्ता बनाता है या यूं कहें कि धरती समुद्र को भीतर आने का रास्ता देती है. हम जब नक्शे में हिंद महासागर से अफ्रीका की आगे बढ़ रहे होते हैं तो बीच में दाहिनी ओर अरब सागर है. उससे आगे बढ़ें तो ओमान की खाड़ी है और आगे बढ़ें तो फारस की खाड़ी है. अब अगर इराक और कुवैत की ओर से बाहर आएं तो सबसे पहले फारस की खाड़ी है और फिर होर्मुज जलडमरूमध्य. उसके बाद ओमान की खाड़ी फिर अरब सागर और उसके बाद अंत में हिंद महासागर. फारस की खाड़ी से ओमान की खाड़ी के बीच की कुल दूरी 167 किलोमीटर है. चौड़ाई औसतन 54 किलोमीटर है. जहाज चलने का दायरा दोनों तरफ 3 से 4 किलोमीटर है. गहराई औसत 50 से 60 मीटर है. अधिकतम गहराई 200 मीटर है, जहां पर सुपर टैंकर चलते हैं. फारस की खाड़ी में 8 देशों की समुद्री सीमा खुलती है. 

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13 से 14 लाख करोड़ रुपए का तेल व्यापार

सामान्य दिनो में यहां से रोज 120 से 145 जहाज गुजरते हैं, जिसमें से 60 से 70 प्रतिशत तेल और गैस के होते हैं. प्रतिदिन औसतन बीस मिलियन बैरल क्रूड ऑयल होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया के अन्य देशों में जाता है, जो कि कुल पेट्रोलियम उपभोग का बीस फीसदी है. समुद्री तेल व्यापार का 25% है. दुनिया का लिक्विड नेचुरल गैस का 19 से 20% स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जाता है. हर दिन होर्मुज से 13 से 14 लाख करोड़ रुपए का तेल व्यापार होता है. इसमें LNG,पेट्रोलियम उत्पाद, केमिकल्स और अन्य माल जोड़ें तो होर्मुज से रोजाना का व्‍यापार करीब 208 अरब रुपए का हो जाता है. 

होर्मुज को लेकर बढ़ जाती है टेंशन 

इन आंकड़ों से साफ समझा जा सकता है कि होर्मुज दुनिया के लिए कितना महत्‍वपूर्ण है. कह सकते हैं कि अगर दुनिया की राजनीति का दिल कहीं धड़कता है तो उसकी नाड़ी होर्मुज से होकर गुजरती है. ये केवल समुद्री मार्ग नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, सैन्य शक्ति और कूटनीतिक दबाव का संगम है. दुनिया के 70 फीसदी देशों में होर्मुज के कारण चिंता बढ़ गई है. युद्ध हो या शांति होर्मुज में पत्ता भी खड़कता है तो होर्मुज और मिडिल ईस्ट पर निर्भर देशों को छतें हिलने लगती हैं. यही वजह है कि होर्मुज पर कंट्रोल सुपरपॉवर की जंग का नया मुकाम बन चुका है. 

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अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध में चीन और रूस शामिल नहीं हैं, लेकिन पर्दे के पीछे सुपर एक्टिव हैं. दुनिया के कई और देश इसमें न चाहते हुए भी इनडायरेक्टली शामिल हैं. होर्मुज संकट और युद्ध की वजह से दुनिया में देशों के रिश्ते फिर से बन और बिगड़ रहे हैं. देश के बीच रिश्तों का एक नया समीकरण बन रहा है, जो होर्मुज पर निर्भर हैं और जो होर्मुज पर निर्भर नहीं हैं. जो होर्मुज को कंट्रोल करने वाले के साथ हैं और जो उसके खिलाफ हैं. सुपरपॉवर की रेस में उसका पलड़ा भारी होगा, जो होर्मुज पर काबिज होगा. 

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फारसी भाषा का शब्‍द है होर्मुज, जानें पूरा इतिहास

होर्मुज के आईने में दुनिया की सूरत देखने से पहले होर्मुज का इतिहास जान लेना जरूरी है. होर्मुज, फारसी भाषा का शब्द है. इसकी शुरूआत उससे भी पहले अवेस्ता भाषा में मिलती है. अभी होर्मुज की पहचान भौगोलिक है, लेकिन मूल रूप से ये एक धार्मिक-सांस्कृतिक शब्द है. होर्मुज की उत्पति अहुर-मज्दा से हुई है. अहुरा का मतलब प्रभु और मज्दा का मतलब ज्ञान है. मतलब ज्ञान का परम देव या सर्वोच्च बुद्धिमान ईश्वर. ये अहुर मज्दा से ओहरमज्द हुआ और फिर आधुनिक फारसी या अरबी में होर्मुज हो गया. इतिहास में झांके तो देवताओं के नाम पर शहरों का नाम की लंबी परंपरा नजर आती है. 10वीं शताब्दी में ईरान के समुद्र तट पर एक व्यापारिक कस्बा था ओल्ड होर्मुज. नुकसान और खतरे से रक्षा के लिए इसका नाम अहुरमज्दा के नाम पर रखा गया था, लेकिन बेहद क्रूर और खूंखार मंगोलों के हमले से बचने के लिए होर्मुज के लोग मुख्य जमीन को छोड़कर रक्षा के लिए समुद्री द्वीप में आ गए, तबसे होर्मुज एक द्वीप का नाम है. एक सी-स्ट्रेट का नाम है.यह शब्द होर्मुज ईरानी जोरेस्ट्रिएन कल्चर का प्रतिनिधि है. किसी अशुभ से बचने के लिए देवता अहुर मज्दा के नाम पर जो शहर बसाया गया वो दुनिया की तमाम इकोनॉमी के लिए डर का दूसरा नाम बन गया. होर्मुज का खुलना और बंद होने संप्रभु देशों के सौभाग्य और दुर्भाग्य की वजह बन गया है. 

होर्मुज के इतिहास में झांके तो पता चलता है कि इक्कीसवीं सदी में जो हो रहा है, वो कोई नई बात नहीं है. चौथी से छठी शताब्दी ईसा पूर्व में यहां फारसी संस्कृति थी, तब होर्मुज से भारत-अरब और पूर्वी अफ्रीका का व्यापार होता था. उस वक्‍त मसाले, रेशम, मोती और कीमती पत्थर प्रमुख थे. रूपया, डॉलर, रियाल, युआन का झंझट नहीं था और सामान के बदले सामान का चलन था या फिर सोने की मुहर चलती थीं. 10वीं से 15वीं शताब्दी तक ईरान के मुख्य समुद्र तट पर पुराना होर्मुज शहर बन चुका था. बाद में मंगोलों ने हमला किया तो ईरान के तट से समुद्र के द्वीप में शिफ्ट हो गए. तब ये एक स्वतंत्र राज्य था इसे दुनिया का बाजार कहा जाता था. 1507 ई में पुर्तगाली सेनापति अल्फोंसो द अब्लुकर्क ने होर्मुज पर कब्जा कर लिया. यहां से पुर्तगाली हिन्द महासागर के व्यापार को नियंत्रित करते थे. होर्मुज में पुर्तगालियों ने अपना किला भी बनाया था. 1622 में सफवी शासक शाह अब्बास प्रथम ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की मदद से पुर्तगालियों को होर्मुज से बाहर का रास्ता दिखा दिया. इसी के बाद बंदर अब्बास का दर्जा बढ़ा, लेकिन पूर्व को पश्चिम से जोड़ने में होर्मुज की भूमिका बनी रही. इतिहास के प्राचीन, मध्ययुग और आधुनिक काल को देखने के बाद होर्मुज आधुनिक दुनिया को भी देख रहा है, यहां उसका रेग्यूलेटर वाला इस्तेमाल हो रहा है. 

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होर्मुज का किंग कौन?

  • ईसा पूर्व से 7वीं सदी तक- फारसी राजघराना
  • 7वीं-10वीं शताब्दी- उमय्यद और अब्बासी
  • 11वीं–17वीं सदी- होर्मुज राजघराना (टोल टैक्स वसूलता था)
  • 1507-1622- पुर्तगाली साम्राज्य (टोल टैक्स वसूलता था)
  • 1622-18वीं सदी- सफविद साम्राज्य (ब्रिटिश इंडिया कंपनी ने पुर्तगालियों को भगाया)
  • 1947 तक- ब्रिटिश शासन
  • 1947-1979- ईरानी शाह शासन
  • 1979 से अब तक  - इस्लामिक गणराज्य


मिडिल ईस्ट के लिए लाइफलाइन है होर्मुज

इतिहास होर्मुज की नियति बताता है. होर्मुज सिर्फ जलमार्ग नहीं है, बल्कि विश्व की ऊर्जा राजनीति का नियंत्रण बिंदु है.  अंतरराष्‍ट्रीय राजनीति के तापमान का मीटर है. वर्तमान में भी होर्मुज की ऐतिहासिक भूमिका बरकरार है. दुनिया में पेट्रोलियम की जरूरत का करीब 30% मिडिल ईस्ट और ईरान से आता है, जबकि दुनिया में गैस की जरूरत का 18% मिडिल ईस्ट से आता है. यहां पर ये जान लेना जरूरी है कि मिडिल ईस्ट अपनी पेट्रोलियम और गैस सप्लाई के लिए होर्मुज पर कितना ज्यादा निर्भर है. 

मिडिल ईस्ट के कुल पेट्रोलियम निर्यात का 70 से 75% हिस्सा होर्मुज से निकलता है. इराक, कुवैत, कतर, बहरीन, ईरान का 90 से 100 फीसदी पेट्रोलियम होर्मुज से जाता है. सऊदी अरब का 60 से 65% होर्मुज से जबकि 35 से 40% ही ईस्ट वेस्ट पाईप लाइन से जाता है. संयुक्त राज्य अमीरात का 65 से 70% तेल होर्मुज से. 35 से 40% तेल फुजैरह पाइपलाइन से. होर्मूज से जाने वाले पेट्रोलियम पदार्थों का केवल 13 से 28 फीसदी ही पाइप लाइन के जरिए जा सकता है. 70% तेल किसी भी स्थिति में होर्मुज होकर ही निकलता है. LNG गैस में निर्भरता बहुत ज्यादा है. कतर की 93% गैस, यूएई की 96% गैस होर्मुज से जाती है, जो कि दुनिया में गैस की कुल सप्लाई का 19-20% है. 

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होर्मुज की सप्लाई में संकट का महत्व समझना हो तो दुनिया के कुछ महत्वपूर्ण देशों के आंकडे़ आपको बता देते हैं.  

  • जापान का 88% पेट्रोलियम और 80% गैस 
  • दक्षिण कोरिया का 73% पेट्रोलियम 65% गैस  
  • चीन का 40% पेट्रोलियम और 25%गैस 
  • ताईवान का 55% पेट्रोलियम
  • थाईलैंड का 45% पेट्रोलियम
  • सिंगापुर का 30% पेट्रोलियम 
  • इंडोनेशिया का 25% पेट्रोलियम
  • भारत का 64% पेट्रोलियम
  • पाकिस्तान का 50% पेट्रोलियम
  • बांग्लादेश का 60% पेट्रोलियम
  • यूरोपियन यूनियन का 14% पेट्रोलियम 
  • ऑस्ट्रेलिया का 20% पेट्रोलियम
  • तुर्की का 35% पेट्रोलियम


एशिया के एनर्जी बजट का 90% होर्मुज से आता है, जिसमें चीन, जापान, साउथ कोरिया का बड़ा हि्स्सा है. इसमें से जापान और साउथ कोरिया अमेरिका के मित्र हैं, जबकि चीन अमेरिका का बड़ा व्यापारिक पार्टनर है. ये बात अलग है कि चीन अमेरिका के  सुपर पॉवर और डॉलर दोनों को चुनौती देता है. चीन होर्मुज के रास्ते ईरान से जो व्यापार करता है उसका भुगतान डॉलर की जगह यूआन से करता है. वहीं अमेरिका ने जो सिस्टम बनाया है, उसमें पेट्रोलियम की खरीद फरोख्त का माध्यम है अमेरिका का डॉलर. ईरान के अलावा मिडिल ईस्ट के बाकी देश अपना पेट्रोलियम व्यापार अमेरिकी डॉलर में भी करते हैं. 

होर्मुज अचानक से प्रचलित शब्द हो गया

दुनिया की इकोनॉमी में होर्मुज के पेट्रोलियम और गैस का जबरदस्‍त महत्व है. अगर एक दिन भी होर्मुज बंद होता है तो वैश्विक अर्थव्‍यवस्‍था को जबरदस्‍त नुकसान होता है. अगर होर्मुज बंद होता है तो प्रतिदिन उत्पादन 8 से 11 मिलियन बैरल घटता है.  इसकी वजह से बजट घाटा बढ़ता है. सब्सिडी, वेतन, योजना खर्च में कमी आती है. बड़े निर्यातकों की जीडीपी में 1.5 से 3% तक की कमी आ जाती है और छोटे देशों में मंदी की शुरूआत हो जाती है. बाजार में पैसा घटता है, बैंक संकट में आते हैं और रिएल स्टेट में भी स्लोडाउन आता है. विदेशी निवेशक पूंजी निकाल कर भागने लगते हैं और ये सब आर्थिक संकट को जन्म देते हैं. यह अभी मिडिल ईस्ट के लिए है, लेकिन इसका असर आयातकों पर भी पड़ना शुरू होता है, क्योंकि बिना तेल के इकोनॉमी के पहिए का घूमना बहुत मुश्किल होता है. इसीलिए होर्मुज को कोई हल्के में नहीं लेता है. दुनिया में सुपर पावर की जो जंग चल रही है, उसमें होर्मुज का महत्व बढ़ गया है, क्योंकि एनर्जी पर जिसका कंट्रोल होगा, वही विश्व की पावर सप्लाई का रिमोट अपने पास रखेगा. 

ईरान पर हमले के बाद दुनिया में बालिग हुई नई पीढ़ी को मिडिल ईस्ट का महत्व समझ में आया है. दुनिया के नक्शे में बने इन देशों से उनके घर, ऑफिस, गाड़ी,नौकरी और जेब से कितना नजदीकी रिश्ता है वो भी समझ में आया है. यह बदलाव तैयार करने में होर्मुज की बड़ी भूमिका है. वर्ल्ड एटलस देखते हुए जिन देशों से आंखें यूं ही गुजर जाती थीं उसे छात्र रुक कर गौर से देखते हैं. होर्मुज का महत्व उभर कर सामने आया है और यह दुनिया भर की राजनीति का महत्वपूर्ण टॉपिक बन गया है. 

युद्ध ने हमारी स्थिति खराब कर दी: शुमेर

अमेरिका की सिनेट में अल्पसंख्यक सिनेटर चक शुमेर ने कहा कि इस युद्ध ने हमें आज पहले से भी बदतर स्थिति में डाल दिया है. होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण के मामले में युद्ध ने हमारी स्थिति खराब कर दी है. ईरानी शासन की ताकत के मामले में युद्ध ने हमारी स्थिति खराब कर दी है. गैस की ऊंची कीमतों के मामले में युद्ध ने हमारी स्थिति खराब कर दी है. ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं पर कोई रोक नहीं लगी है और अमेरिकी विश्वसनीयता पूरी तरह से खत्म हो गई है. यह अविश्वसनीय है. 

ईरान पर हमले के पीछे घोषित तौर पर इजरायल और अमेरिका के अलग अलग कारण सामने आए. अमेरिका ने कहा कि इजरायल का परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए खतरा है. अरब देशों और इजरायल के लिए खतरा है, इसलिए उसे नष्ट करना जरूरी है. इजरायल का मानना है कि ईरान की सत्ता पर काबिज अयातुल्लाह का शासन खत्म करना जरूरी है क्योंकि वो इजरायल को खत्म करने के लिए हिजबुल्‍लाह और हूती जैसे आतंकी संगठनों को पालता-पोसता है. इसलिए अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान को आतंकी कहा और हमला किया. यहां तक तो ठीक था लेकिन जैसे ही लड़ाई होर्मुज पर आई तो पूरी दुनिया परेशानी महसूस करने लगी.  

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्‍टार्मर कह चुके हैं कि यह हमारा युद्ध नहीं है. उन्‍होंने कहा कि हम इस संघर्ष में शामिल नहीं होंगे. यह हमारे राष्ट्रीय हित में नहीं है और ब्रिटेन में जीवनयापन की लागत को वहन करने का सबसे प्रभावी तरीका मध्य पूर्व में तनाव कम करने और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए दबाव डालना है, जो ऊर्जा के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है. इस उद्देश्य के लिए, हम अपने लिए उपलब्ध हर कूटनीतिक मार्ग का उपयोग कर रहे हैं. 

हालांकि अमेरिका का इरादा शायद कुछ और ही है. उन्हें अपने साथी देशों की परेशानी नहीं दिख रही है. अमेरिका अपने दोस्‍तों से इसलिए गुस्सा है कि उन्‍होंने लड़ाई में उनकी मदद नहीं की. बम से होर्मुज का रास्ता खुलवाने नहीं आए. होर्मुज से ईरान की माइंस हटाने के लिए माईनस्वीपर्स नहीं दिए. यही कारण है कि वह यूरोप और नाटो के दोस्तों से रिश्ता तोड़ने पर आमादा हैं. 

नाटो पेपर टाइगर है. पुतिन उनसे नहीं डरते. अमेरिका से डरते हैं. मुझे कई बार बताया है. नाटो पेपर टाइगर है. मुझे उनकी मदद की जरूरत भी नहीं है. साउथ कोरिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया ने मदद नहीं की. उन्होंने हमें अपनी एयर स्ट्रिप भी नहीं दी.

डोनाल्‍ड ट्रंप

अमेरिका के राष्ट्रपति


दुनिया में एक्सपर्ट का एक ऐसा वर्ग है जो मानता है कि ईरान पर ट्रंप का असली दुख साथियों का धोखा नहीं है, बल्कि असली पीड़ा होर्मुज में नहीं घुस पाने की है. एक्सपर्ट इस बात पर सहमत हैं कि ईरान पर हमले के पीछे मिसाइल और एटमबम नहीं तेल और उसका कंट्रोल है. अमेरिका की नजर ईरान के तेल पर है. राष्ट्रपति ट्रंप खुद कई बार ईरान की तेल कैपिटल खर्ग आईलैंड पर कब्जे की बात कह चुके हैं. 

साथ ही ट्रंप कह चुके हैं कि अगर मुझे चुनने का मौका मिले, तो मैं क्या करना चाहूंगा? तेल ले लूंगा. क्योंकि यह आसानी से उपलब्ध है, वे इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते. दुर्भाग्य से अमेरिकी जनता हमें घर लौटते देखना चाहती है. अगर यह मेरे हाथ में होता तो मैं तेल ले लेता, उसे अपने पास रखता और खूब पैसा कमाता और मैं ईरान के लोगों की देखभाल भी करता, जितनी अच्छी तरह से उनकी देखभाल की गई है, उससे कहीं बेहतर. 

ट्रंप के बयान ने इरादे कर दिए साफ

ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका के लिए तेल ही असली टारगेट है. राष्ट्रपति ट्रंप जब दूसरी बार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे थे तब उन्होंने अपने देश के तेल कारोबारियों को खुश करने के लिए नारा दिया था-ड्रिल बेबी ड्रिल. जबकि अमेरिका में तेल की खुदाई के विरोध के लिए एक बड़ा प्रेशर ग्रुप काम करता है. हमले के तुरंत बाद ईरान ने जैसे ही तेल संपन्न पड़ोसी देशों पर हमले की मिसाइलें दागी तो ये साबित हो गया कि लड़ाई तेल की ही है, क्योंकि ईरान की मिसाइलें भले ही गिरी उन अमेरिकी फौजी अड्डों पर हो जो अरब देशों में उनकी रक्षा के लिए बने हैं. हालांकि उनका संदेश साफ था कि दुनिया का एनर्जी सप्लायर जोन अब युद्ध के चक्रव्यूह में फंस चुका है. बाद में ईरान की कुछ मिसाइल अमेरिका के करीब सऊदी अरब के तेल क्षेत्र में भी गिरीं. ईरान की रणनीति, टारगेट और संदेश क्लियर था कि होर्मुज को रेग्यूलेट करने की कोई भी कोशिश दुनिया को तेल संकट और आर्थिक संकट में डाल देगी. ईरान पर गिरा हर बम दुनियाभर की इकोनॉमी को भी तबाह करेगा. ईरान के पड़ोसियों ने ये बात दुनिया को खुल कर बताई है. 

कतर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद अल अंसारी ने कहा कि इस तरह युद्ध जारी रखने से क्षेत्र के लोगों, अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों को और अधिक नुकसान ही होगा. इस युद्ध के जारी रहने से कोई विजेता नहीं है, केवल हारने वाले हैं और आर्थिक स्थिति के दुष्परिणामों के कारण हारने वालों का दायरा हर दिन बढ़ता जा रहा है. 

दुनिया की इकोनॉमी और एनर्जी बजट में होर्मुज का महत्व क्यों इतना ज्यादा है? इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि हम और आप अभी भी अपनी ऊर्जा के लिए सबसे ज्यादा पेट्रोल, गैस और कोयले का ही इस्तेमाल करते हैं. ग्लोबल प्राइमरी एनर्जी मिक्स के आंकडे़ देखें तो पता चलता है कि दुनिया की प्राइमरी एनर्जी सप्लाई में इनका बड़ा योगदान है. 

दुनिया को होर्मुज से मिलती है ऊर्जा

  • पेट्रोलियम की हिस्सेदारी 34%
  • नेचुरल गैस का हिस्सा 23%
  • कोयले की भूमिका 25%
  • जल ऊर्जा 6%
  • परमाणु ऊर्जा 4%
  • पवन ऊर्जा 3%
  • सौर ऊर्जा 2%
  • अन्य का हिस्सा 3%

 
आंकड़े साफ बताते हैं कि पूरी दुनिया के लिए जो चीज इतनी जरूरी है, उसका कंट्रोल करने वाले की भूमिका भी दुनिया में बहुत महत्वपूर्ण होगी. अमेरिका इस बात को अच्छी तरह समझता है इसीलिए वो होर्मुज में अपनी भूमिका को मजबूत रखना चाहता है. इसके लिए वो ऐसे कदम भी उठाने को तैयार है जो अभी तक नहीं उठाए गए हैं.

क्‍या बड़े कदम उठा सकता है अमेरिका?

अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि हम वास्तव में एक ऐसी दुनिया चाहते हैं, जहां तेल और गैस का निर्बाध प्रवाह हो, जहां लोग अपने घरों को गर्म और ठंडा करने का खर्च उठा सकें, जहां लोग काम पर जाने के लिए परिवहन का खर्च उठा सकें. ऐसा तब तक संभव नहीं है जब तक ईरानी आर्थिक आतंकवाद में लिप्त हैं. इसलिए उन्हें यह जानना होगा कि हमारे पास ऐसे उपाय हैं, जिनका हमने अभी तक उपयोग नहीं किया है. अमेरिका के राष्ट्रपति इनका उपयोग करने का निर्णय ले सकते हैं और यदि ईरानी अपना आचरण नहीं बदलते हैं तो वे निश्चित रूप से इनका उपयोग करेंगे. 

जेडी वेंस के इस बयान को परमाणु बम की धमकी माना गया. हालांकि बाद में अमेरिका ने साफ किया कि इरादा एटम बम का नहीं है. लेकिन ईरान ने होर्मुज को एटम बम से भी ज्यादा घातक बना दिया है. होर्मुज ईरान को अमेरिका से लड़ने की आर्थिक ताकत देता है. होर्मुज युद्ध में अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ईरान को स्ट्रेटजिक बढ़त देता है. होर्मुज एक नायाब जियोपॉलिटिकल वेपन है, जो एक तरफ ईरान को सुरक्षा देता है तो दूसरी तरफ दुनिया की आर्थिक प्रगति का बीमा है, जिसके बिना दोनों असुरक्षित हैं. ईरान के खिलाफ अमेरिका की अड़चन मिसाइल और ड्रोन नहीं बल्कि होर्मुज ही हैं. इसीलिए अमेरिका तेल के व्यापार में होर्मुज पर ईरान के कंट्रोल को आर्थिक आतंकवाद मानता है. 

साथ ही वेंस ने कहा कि राष्ट्रपति ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि ईरानी होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से जितना संभव हो उतना आर्थिक नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका ईरान पर उससे कहीं अधिक आर्थिक नुकसान पहुंचाने में सक्षम है जितना ईरान हम पर या दुनिया भर में हमारे मित्रों पर पहुंचा सकता है इसलिए मुझे उम्मीद है कि वे समझदारी से काम लेंगे. 

होर्मुज पर कंट्रोल की कोशिश, पैसे और पेट्रोल के लिए!

यहां आते आते पिक्चर क्रिस्टल क्लियर हो जाती है. होर्मुज पर कंट्रोल की लड़ाई पैसे और पेट्रोल की है. ईरान ने होर्मुज पर ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के बाद एक नया काम किया वो ये कि उसने होर्मूज से सेफ एग्जिट के लिए पैसे लेने शुरू कर दिए हैं. एक डॉलर प्रति बैरल या दो मिलियन प्रति टैंकर. भुगतान क्रिप्टो या चीनी मुद्रा युआन में. ईरान सोच रहा है कि अब होर्मुज से छह लाख करोड़ कमाएगा, जबकि होर्मुज एक अंतरराष्‍ट्रीय जल डमरूमध्य है, जो कि ईरान और ओमान के बीच स्थित है, यहां ट्रांजिट पैसेज का अधिकार लागू है. इसका मतलब है कि ईरान या ओमान यहां से गुजरने के नाम पर किसी तरह का कोई टैक्स नहीं ले सकते हैं. ये अन्तरराष्ट्रीय समुद्री कानून UNCLOS का कानून है. 

होर्मुज को लेकर जब स्ट्रेटजी इस स्तर पर तैयार है तो कुछ सवाल स्वाभाविक हैं. क्या ईरान पर हमला होर्मुज के लिए किया गया या फिर अमेरिका और इजरायल की मिसहैंडलिंग की वजह से होर्मुज का संकट दुनिया के सामने खड़ा है? होर्मुज का भविष्य अब क्या है? होर्मुज से निकलने वाले क्रूड ऑयल और गैस पर कंट्रोल की इतनी महंगी कोशिशें क्यों हो रही हैं? जिसमें जान-माल और धन सबका नुकसान हो रहा है. 

1 बैरल क्रूड ऑयल का मतलब 159 लीटर कच्चा तेल होता है. इस तेल को प्रोसेस करने पर बनता है- 

  • 42% पेट्रोल  
  • 27% डीजल  
  • 10% जेट फ्यूल, जिससे विमान चलते हैं
  • 4% LPG जो हमारे आपके किचन सिलेंडर में होती है
  • 7% पेट्रोकेमिकल फीड स्टॉक्स (नाफ्था) जिसका इस्तेमाल खेतों के लिए खाद बनाने में होता है
  • 5% मरीन फ्यूल
  • 2% लूब्रीकेंट/वैक्स
  • 3% असफाल्ट/बिटुमिन जिससे हमारी आपकी सड़क बनती है


क्रूड से गाड़ी के इंजन का ऑयल, ग्रीस, लुब्रीकेंट ऑयल, हाईड्रोलिक ऑयल, सल्फर, प्लास्टिक, पॉलिमर, केमिकल, पेंट, पॉलिएस्टर से लेकर चेहरे पर लगाने वाली खास तरह की क्रीम सहित करीब करीब 50 आईटम सीधे तौर पर बनते हैं. अब अगर इकोनॉमी में इनका योगदान देखें तो पता चलेगा कि होर्मुज पर इतना जोर क्यों है? और ये आज की बात नहीं है. इतिहास में कई बार ऐसा हो चुका है. 

होर्मुज पर पुर्तगालियों का नियंत्रण था. वो यहां से हिंद महासागर का व्यापार कंट्रोल करते थे. उस समय होर्मुज पर टोल टैक्स वसूला जाता था, तब होर्मुज पहली बार हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया था. 

ईरान ने अपने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया. इससे पहले ब्रिटेन और पश्चिमी देश ईरान का तेल मैनेज करते थे. ब्रिटेन ने होर्मुज में शिपिंग का दबाव बनाया तब होर्मुज बंद तो नहीं हुआ था, लेकिन ट्रेड पर असर पड़ा था. 

होर्मुज पर कब-कब मंडराया संकट 

  1. 1980-88: ईरान-अमेरिका युद्ध में होर्मुज के तेल टैंकर्स पर हमले किए गए. सैकड़ो जहाज को नुकसान पहुंचा. अमेरिका ने ऑपरेशन अर्नेस्ट विल चलाया और टैंकर्स को सैन्य सुरक्षा दी गई. 
  2. 1988: होर्मुज में अमेरिका और ईरान के बीच झड़प हुई. इसे ऑपरेशन प्रेयिंग मेंटिस नाम दिया गया था. फिर भी होर्मुज पूरी तरह से बंद नहीं हुआ था. इसी साल अमेरिका की नौसेना ने ईरान का यात्री विमान गिरा दिया. घटना होर्मुज के आसपास हुई थी. यूएस ने इसे गलती से हुई कार्रवाई बताया था, तनाव था लेकिन उस वक्‍त भी होर्मुज बंद नहीं हुआ था. 
  3. 2008: ईरान की स्पीडबोट अमेरिकी युद्धपोत के करीब पहुंच गई थी, लेकिन होर्मुज पर असर नहीं पड़ा. 
  4. 2011-12: ईरान ने पश्चिम प्रतिबंधों के जवाब में होर्मुज को बंद करने की धमकी दी थी, लेकिन होर्मुज बंद नहीं हुआ था. 
  5. 2019: गल्फ ऑफ ओमान में जापान और नार्वे के टैंकर्स पर हमला हुआ. ब्रिटिश टैंकर को ईरान ने जब्त कर लिया. अमेरिका ने तब भी ईरान को जिम्मेदार ठहराया था. वैश्विक तेल की कीमतों में उछाल आया. लेकिन 2026 जैसा संकट कभी नहीं आया था.  इसमें अमेरिका को उसके साथियों ने अकेला छोड़ दिया है. यहां तक कि जिन अरब देशों की रक्षा के लिए अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में मिलिट्री बेस बनाए हैं, वो भी ईरान के हमले का जवाब नहीं दे रहे हैं, जबकि ईरान के साथ चीन और रूस खड़े दिखाई दे रहे हैं. चीन ईरान का सबसे बड़ा बिजनेस पार्टनर है. वो युआन देकर उनका तेल खरीदता है. ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि क्या अमेरिका होर्मूज को कंट्रोल करके एशिया और साउथ में चीन की बढ़त को काउंटर करना चाहता है? क्या होर्मुज की वजह से मिडिल ईस्ट के समीकरण बदल जाएंगे?

होर्मुज बंद तो रास्ता क्या है?

यहां सवाल ये उठता है कि क्या होर्मुज अनिवार्य मजबूरी है? क्या होर्मुज का कोई बायपास नहीं है? क्या तेल और गैस को मिडिल ईस्ट से बाहर निकालने का केवल एक ही जरिया है? इसका जवाब खोजने की कोशिश हमने की है, होर्मुज बंद होता है तो ये विकल्‍प हो सकते हैं. 

  • सऊदी अरब में ईस्ट-वेस्ट पेट्रोलाइन है. ये सऊदी अरब के पूर्वी तेलक्षेत्रों के लिए काम करती है. लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक जाती है और हर दिन 7 मिलियन बैरल तेल ट्रांसपोर्ट करती है. 
  • यूनाइटेड अरब अमीरात में हबशन फुजैराह तेल पाइललाइन है. गल्फ ऑफ ओमान में है, लेकिन ये सिर्फ 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन ही ट्रांसपोर्ट करती है. 
  • इराक और तुर्की के बीच में किर्कुन-जेहान पाइपलाइन है. सीधे यूरोप में तेल पहुंचा सकती है, लेकिन राजनीतिक और सुरक्षा काऱणों से संवेदनशील है. 
  • दक्षिण ईरान में गोरेह-जास्क पाइपलाइन है. एक मिलियन बैरल प्रतिदिन का ट्रांसपोर्ट होता है. 
  • लाल सागर में एक कॉरिडोर है. सऊदी यानबू और मिस्र की सुमेद पाइप लाइन. 
  • एक IMEC कॉरीडोर प्रस्तावित है. जिसका पूरा नाम है इंडिया मिडिल ईस्ट यूरोप इकोॉनामिक कॉरीडोर है, जो कि भारत को अरब देश-इजरायल और यूरोप से जोड़ेगा. G-20 शिखर सम्मेलन में इसकी घोषणा हुई थी. हालांकि मौजूदा स्थिति में ये सब बहुत सीमित हैं और होर्मुज का कोई विकल्प नहीं है. 

ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या समुद्री गलियारों से पैदा होने वाले होर्मुज जैसे संकटों से बचने का क्या तरीका है ? क्या हर देश को अपने आयात दुनियाभर में फैला कर रखने चाहिए, लेकिन सवाल ये भी है कि देश अपने आयात के कितने भी ठिकाने क्यों न बना लें अगर अमेरिका ऐसे ही हर जगह अपनी शर्तें चलाने की कोशिश करेगा तो भविष्य में होर्मुज जैसे विवाद जन्म नहीं लेंगे इसकी क्या गारंटी है. 
 

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