ईरान युद्ध से रूस की चांदी: दुनिया में रूसी तेल-गैस की मांग बढ़ी, भारत की जेब हो रही ढीली!

अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रूस के जिस तेल-गैस को खरीदने से देश कतराते थे, ईरान युद्ध के कारण उसकी डिमांड में जबरदस्त उछाल आया है. नतीजा ये कि 2022 के बाद पहली बार, भारत को अपने बंदरगाहों पर रूसी तेल की डिलीवरी यूरोपीय ब्रेंट क्रूड से भी महंगे दाम पर लेनी पड़ रही है.

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  • ईरान युद्ध की वजह से रूस के प्रतिबंधित तेल और गैस की अंतरराष्ट्रीय मांग में अचानक वृद्धि हो गई है
  • होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से ब्रेंट क्रूड 25 पर्सेंट तो डिमांड बढ़ने से रूसी यूराल तेल 50% महंगा हो गया है
  • भारत को रूसी तेल खरीदने की छूट भले ही मिली हो लेकिन अपने यहां तेल की डिलीवरी ब्रेंट से भी महंगी पड़ रही है
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अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रही जंग ने रूस की चांदी कर दी है. अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रूस के जिस तेल और गैस को खरीदने से अधिकतर देश कतराते थे, उसकी मांग में जबरदस्त उछाल आया है. नतीजा ये कि 2022 के बाद पहली बार, भारत को अपने बंदरगाहों पर रूसी तेल की डिलीवरी यूरोपीय ब्रेंट क्रूड से भी महंगे दाम पर लेनी पड़ रही है. 

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से सप्लाई ठप

दरअसल युद्ध छिड़ने के बाद ईरान ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (Strait of Hormuz) को बंद कर दिया है. इससे दुनिया की लगभग 20 फीसदी तेल और गैस सप्लाई ठप पड़ गई है. सप्लाई रुकने से तेल की कमी हो गई है और ब्रेंट क्रूड के दाम लगातार बढ़ रहे हैं. दुनिया में 60-70% कच्चे तेल के सौदों की कीमत इसी ब्रेंट क्रूड के आधार पर तय होती है. 

देखें- ईरान युद्ध के बीच क्या देश में बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम? सरकार से आई राहत की खबर

ब्रेंट क्रूड 25% तो रूसी यूराल 50% महंगा हुआ

होर्मुज स्ट्रेट बंद होने एक हफ्ते में ही ब्रेंट क्रूड 25 फीसदी महंगा होकर 89 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है. युद्ध नहीं रुका तो तेल महंगा होकर 150 डॉलर तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है. ब्रेंट ही नहीं, रूसी यूराल क्रूड भी 50 फीसदी महंगा हो गया है. रूस के प्रिमोर्स्क बंदरगाह पर लोडिंग के वक्त जो यूराल पहले 45.7 डॉलर प्रति बैरल मिल रहा था, डिमांड बढ़ने पर अब उसके दाम भी 50 पर्सेंट बढ़कर 68.6 डॉलर तक पहुंच गए हैं. 

पहली बार, G7-EU के प्राइस कैप से भी महंगा

इस तरह से देखा जाए तो रूसी तेल अब जी7 के 60 डॉलर प्रति बैरल और EU के 44.10 डॉलर प्रति बैरल के प्राइस कैप से भी ऊपर पहुंच चुका है. कीमतों की ये सीमा 2022 में यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद लगाई गई थी. इसका मतलब ये कि अगर रूसी तेल कंपनियां इससे ज्यादा दाम पर अपना तेल बेचेंगी तो पश्चिमी देशों की शिपिंग सर्विस और इंश्योरेंस का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगी. 

देखें- ईरान संकट से सरकार सतर्क! भारतीय तेल कंपनियों से कहा उत्पादन बढ़ाओ - सूत्र

अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने की छूट दी 

रूसी तेल खरीदने पर पश्चिमी देशों की कड़ी पाबंदियों के बावजूद अपनी घरेलू जरूरतों का हवाला देते हुए रूस से तेल खरीद रहा था. हालांकि पिछले कुछ समय में इसमें काफी कमी आई है. लेकिन अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से बने संकट को देखते हुए अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने पर लगी पाबंदियों में भारत को 30 दिनों की छूट दे दी है. 

भारत को महंगा पड़ रहा रूसी तेल

भारत को रूसी तेल खरीदने की छूट भले ही मिल गई हो, लेकिन उसे यह तेल ब्रेंट के मुकाबले महंगा पड़ रहा है. रॉयटर्स का आकलन है कि भारत को अपने बंदरगाहों पर रूसी तेल की डिलीवरी लेने के लिए ब्रेंट के 89 डॉलर रेट से 4-5 डॉलर प्रति बैरल ज्यादा पेंमेंट करना पड़ रहा है. इसकी वजह तेल और गैस डिलीवरी की बढ़ी लागत है. रूसी तेल विक्रेताओं को एक लाख मीट्रिक टन वाले जहाज को किराए पर लेने के लिए फरवरी के 10-12 मिलियन डॉलर के मुकाबले अब 15 मिलियन डॉलर चुकाने पड़ रहे हैं. रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से दावा किया है कि मार्च ही नहीं, अप्रैल की शुरुआत में भी भारत को रूसी तेल अपने यहां ज्यादा कीमत पर खरीदना पड़ सकता है.  

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