- ईरान की IRGC के कमांडर ने अमेरिका पर पाकिस्तान के एयरबेस का उपयोग करने का गंभीर आरोप लगाया है.
- अमेरिका और इजरायल ने ईरान के ठिकानों पर संयुक्त हमले किए जिसमें ईरान के शीर्ष नेता की मौत हुई थी.
- PAK-ईरान की लंबी सीमा के कारण पाकिस्तान के एयरबेस का इस्तेमाल अमेरिका ने किया.
मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग के बीच पाकिस्तान पर गंभीर आरोप लगा है. ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कमांडर हुसैन नेताज ने दावा किया है कि अमेरिका ने ईरान पर हमलों के लिए पाकिस्तानी एयरबेस का इस्तेमाल किया. नेताज ने चेतावनी दी है कि अगर यह साबित हुआ तो पाकिस्तान को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी.
यह दावा ऐसे वक्त में आया है जब अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान के ठिकानों पर संयुक्त हमले किए. इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई समेत शीर्ष नेतृत्व की मौत हो गई. जवाब में ईरान ने इजरायल और मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए.
पाकिस्तान पर शक क्यों?
पाकिस्तान और ईरान के बीच करीब 900 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है. बलूचिस्तान से सिस्तान-बलूचिस्तान तक फैली यह सीमा रणनीतिक लिहाज से बेहद अहम है. लंबे समय से यह चर्चा रही है कि पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस समेत कुछ सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल अमेरिकी सैन्य लॉजिस्टिक्स के लिए होता रहा है, हालांकि इस्लामाबाद ने कभी खुलकर इसकी पुष्टि नहीं की. ईरानी कमांडर का आरोप इसी संदर्भ में देखा जा रहा है कि अमेरिका को ईरान तक पहुंचने के लिए पाकिस्तान की जमीन या हवाई सुविधा मिली.
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'अपने ही घर में आग' क्यों लगा रहा पाकिस्तान?
दिलचस्प बात यह है कि ईरान पर हमले से ठीक पहले पाकिस्तान ने 27 फरवरी को अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर एयरस्ट्राइक की और 'ओपन वॉर' जैसा माहौल बना दिया. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि तीन हफ्ते पुराने आतंकी हमले के बाद अचानक इतनी तीव्र कार्रवाई क्यों?
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की हाइब्रिड सैन्य-नागरिक नेतृत्व, जिसमें सेना प्रमुख आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ शामिल हैं, एक मुश्किल स्थिति में फंस गए थे.
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एक तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ करीबी रिश्ते हैं, दूसरी तरफ घरेलू दबाव. पाकिस्तान में करीब 20% शिया आबादी है. अगर यह संदेश जाता कि पाकिस्तान ने ईरान पर हमले में अमेरिका-इजरायल की मदद की, तो देश के भीतर जबरदस्त विरोध भड़क सकता था.
यहीं से 'बैकबर्निंग' की थ्योरी सामने आती है. जैसे जंगल की आग रोकने के लिए फायरफाइटर छोटी नियंत्रित आग लगाते हैं, वैसे ही पाकिस्तान ने अफगानिस्तान मोर्चा खोलकर घरेलू संकट को प्राथमिकता दिखाने की कोशिश की.
विरोध प्रदर्शन और संदिग्ध चुप्पी
ईरान पर हमले के बाद कराची और लाहौर में अमेरिकी ठिकानों के बाहर उग्र प्रदर्शन हुए. कराची में अमेरिकी मरीन की गोलीबारी में प्रदर्शनकारियों की मौत की खबरें भी आईं. सवाल यह उठा कि पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियां प्रदर्शनकारियों को दूतावास परिसर तक पहुंचने से क्यों नहीं रोक सकीं? क्या यह एक संदेश था, वॉशिंगटन को यह बताने का कि 'हालात काबू से बाहर हैं, हम खुलकर मदद नहीं कर सकते?'
ईरान की धमकी से बढ़ी इस्लामाबाद की मुश्किलें
आईआरजीसी कमांडर हुसैन नेताज की चेतावनी के बाद पाकिस्तान की कूटनीतिक मुश्किलें बढ़ गई हैं. अगर ईरान को यकीन हो गया कि उसकी सरजमीं से हमले हुए, तो सीमा पर तनाव बढ़ सकता है. पाकिस्तान खुद आर्थिक संकट, अफगान सीमा पर संघर्ष और घरेलू अशांति से जूझ रहा है. ऐसे में ईरान के साथ सीधा टकराव उसके लिए भारी पड़ सकता है.
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इस पूरे प्रकरण में एक बात तो स्पष्ट है कि मिडिल ईस्ट की इस जंग में पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल गहराते जा रहे हैं।. क्या उसने अमेरिका को लॉजिस्टिक सपोर्ट दिया? या अफगानिस्तान में युद्ध छेड़कर खुद को 'व्यस्त' दिखाने की रणनीति अपनाई?
ईरान की धमकी के बाद अब इस्लामाबाद को सफाई देनी होगी. वरना 'अपने ही घर में लगाई आग' कहीं पूरे इलाके को अपनी चपेट में न ले ले.













