पाकिस्तान में 4 लाख के कर्ज के लिए ईसाई मजदूर को जबरन कबूल करवाया इस्लाम, अब बच्चे पहचान की लड़ाई लड़ रहे

पाकिस्तान में 96 प्रतिशत से ज्यादा आबादी मुस्लिम है. यह उन देशों की सूची में आठवें स्थान पर है जहां ईसाइयों को सबसे ज्यादा उत्पीड़न झेलना पड़ता है.

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पाकिस्तान में उत्पीड़न झेल रहे ईसाई समुदाय के लोग
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  • पाकिस्तान के कसूर जिले में ईसाई मजदूर को कर्ज के दबाव में जबरन इस्लाम धर्म स्वीकार करने को मजबूर किया गया
  • सरकारी रिकॉर्ड में पिता का धर्म मुस्लिम दर्ज होने से 5 बच्चों को ईसाई धर्म में पहचान पत्र मिलने से रोका जा रहा
  • परिवार ने आर्थिक तंगी के कारण लगभग चार लाख पाकिस्तानी रुपये का कर्ज लिया था, जिससे दबाव और उत्पीड़न बढ़ा
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पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग किस हाल में जीते हैं, यह पूरी दुनिया जानती है. उन्हें किस तरह प्रताड़ित किया जा रहा है, इसका एक और सबूत सामने आ गया है. पाकिस्तान में ईसाई धर्म से आने वाले और ईंट-भट्ठे में काम करने वाले एक व्यक्ति का जबरन इस्लाम में धर्म परिवर्तन कर दिया गया. यह बदलाव देश के सरकारी रिकॉर्ड में भी दर्ज हो गया. इसी वजह से उसके पांच बच्चों को अपने राष्ट्रीय पहचान पत्र में अपना धर्म ईसाई लिखने की अनुमति नहीं मिल रही है.

सुफयान मसीह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के कसूर जिले में एक भट्ठे पर काम करते हैं. उन्होंने बताया कि उनके पिता सादिक मसीह को कई साल पहले कर्ज के दबाव में इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया गया था. वो अपने पुराने मालिक से लिया हुआ कर्ज नहीं चुका पा रहे थे. बाद में पाकिस्तान की राष्ट्रीय डाटाबेस और पंजीकरण प्राधिकरण (NADRA) के रिकॉर्ड में उनका धर्म मुस्लिम दर्ज कर दिया गया और उन्हें “मुहम्मद सादिक” नाम से नया पहचान पत्र (CNIC) जारी किया गया.

सुफयान ने कहा कि क्योंकि उनके पिता सरकारी रिकॉर्ड में मुस्लिम दर्ज हैं, इसलिए अब उन्हें ईसाई के रूप में पंजीकरण करने की अनुमति नहीं दी जा रही. वे चाहते हैं कि उनके दस्तावेज़ में उनकी असली पहचान दिखाई जाए.

4 लाख के कर्ज में बदल गया धर्म

करीब 15 साल पहले परिवार की आर्थिक हालत और खराब हो गई, जब सादिक मसीह की पत्नी रशीदा गंभीर रूप से बीमार हो गईं. इलाज और घर खर्च के लिए उनके पिता ने 4 लाख पाकिस्तानी रुपये का कर्ज लिया था. रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तान के ईंट-भट्ठों में मजदूर अक्सर मालिकों से एडवांस पैसे लेते हैं और इससे वे कर्ज और दबाव में फंस जाते हैं. मानवाधिकार संगठनों ने कहा है कि इससे मजदूरों का शोषण और मजबूरी बढ़ती है.

सुफयान ने कहा कि उनके पिता पढ़े-लिखे नहीं थे और आर्थिक रूप से कमजोर थे, इसलिए उन पर लगातार दबाव डाला गया. इसी दबाव में उन्होंने सरकारी रिकॉर्ड में मुस्लिम पहचान स्वीकार कर ली, लेकिन दिल से उन्होंने अपना धर्म नहीं बदला. अब इस बदलाव का असर बच्चों पर भी पड़ा है, क्योंकि सरकारी सिस्टम में बच्चों का रिकॉर्ड माता-पिता से जुड़ा होता है. अधिकारियों ने परिवार से कहा है कि बच्चे केवल मुस्लिम के रूप में ही दर्ज हो सकते हैं.

सुफयान ने सवाल किया कि जब वे ईसाई हैं और उसी तरह पले-बढ़े हैं, तो सिर्फ पहचान पत्र के लिए अपने धर्म से इनकार क्यों करें? मसीह परिवार की मांग है कि सरकारी रिकॉर्ड में सादिक मसीह का असली नाम और धर्म दोबारा दर्ज किया जाए और बच्चों को आधिकारिक रूप से ईसाई के रूप में पंजीकरण करने की अनुमति मिले.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि पाकिस्तान, जहां 96 प्रतिशत से ज्यादा आबादी मुस्लिम है, उन देशों की सूची में आठवें स्थान पर है जहां ईसाइयों को सबसे ज्यादा उत्पीड़न झेलना पड़ता है.

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