- ईरान डील से नाराज इजरायल अमेरिका के खिलाफ जा सकता है? पूर्व राजनयिक का दावा- चाहकर भी इजरायल ऐसा नहीं करेगा
- इस जंग ने अमेरिका- इजरायल के लिए कुछ चीजें साफ कर दी हैं- केवल सैन्य ताकत के दम पर ईरान को झुकाना आसान नहीं है
- इजरायल को पता है कि उसकी पूरी सैन्य, कूटनीतिक और आर्थिक ताकत लंबे समय से अमेरिका के मजबूत समर्थन पर टिकी है
क्या इजरायल सचमुच अमेरिका की इच्छा के खिलाफ जा सकता है? क्या बेंजामिन नेतन्याहू ईरान पर ऐसा कोई कदम उठा सकते हैं जो व्हाइट हाउस को मंजूर न हो? और क्या हालिया अमेरिका-ईरान समझौते ने इजरायल को पहली बार कूटनीतिक रूप से असहज स्थिति में ला खड़ा किया है? डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान कि 'अमेरिका के बिना इजरायल नहीं होगा' केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं था, बल्कि उसने दोनों देशों के रिश्तों की असली ताकत और निर्भरता को उजागर कर दिया.
एक पूर्व राजनयिक से बातचीत में हमने समझने की कोशिश की कि अमेरिका-ईरान डील के बाद इजरायल के विकल्प कितने सीमित हैं और नेतन्याहू पर राजनीतिक दबाव कितना बढ़ गया है.
तल्ख होते रिश्ते
ईरान से डील के बाद अमेरिका और इजरायल के बीच रिश्ते तल्ख हो गए हैं. डील की एक शर्त यह भी है कि लेबनान में भी सीजफायर लागू हो और यह बात मानने को इजरायल तैयार नहीं है. लेबनान के साथ एक अलग सीजफायर के बावजूद इजरायल ने उसपर हमला बोला है और यह बात अमेरिका को नागवार गुजर रही है. ट्रंप ने बड़ी मेहनत के बाद ईरान से जंग खत्म की है और वह नहीं चाहते कि इजरायल के हमले की वजह से ईरान नाराज हो जाए. ट्रंप ने तो यहां तक कह दिया है कि अमेरिका के बिना इजरायल नहीं होगा, और मेरे बिना भी इजरायल नहीं होगा. दूसरी तरफ इजरायली पीएम नेतन्याहू ने साफ-साफ कह दिया है कि उनकी सेना ने लेबनान पर कब्जे वाली जमीन से पीछे नहीं हटेगी. इजरायल डील में पार्टी नहीं है और अगर हिजबुल्लाह ने लेबनान से हमला किया तो जवाबी हमला जारी रहेगा.
क्या इजरायल बागी हो सकता है?
इस जंग ने अमेरिका और इजरायल के लिए कुछ चीजें साफ कर दी हैं- केवल सैन्य ताकत के दम पर ईरान को झुकाना आसान नहीं है. चार दशक से ज्यादा समय से लगे प्रतिबंधों और आर्थिक दबावों को झेलने के बावजूद ईरान टूटा नहीं है. अब तो उसके हाथ एक और हथियार लग गया है जिसे अमेरिका की खुफिया एजेंसियां परमाणु से भी बड़ा हथियार मान रही हैं- भविष्य में ईरान जब चाहे तब होर्मुज बंद कर सकता है. यह सच्चाई भी अब ट्रंप को पता लग चुकी है.
इस पूरी स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या इजरायल अमेरिका के खिलाफ जा सकता है, क्या बागी होकर वह कोई बड़ी पॉलिसी अपना सकता है? यही सवाल हमने नॉर्वे में भारत के राजदूत पद से रिटायर और अभी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स (IICA) में प्रोफेसर, डॉ बी बाला भास्कर से की. उनका कहना है कि इजरायल किसी भी परिस्थिति में अमेरिका के खिलाफ नहीं जा सकता. उन्होंने कहा, "इजरायल को अमेरिका और ट्रंप सरकार से इससे अधिक सपोर्ट नहीं मिल सकता था. अमेरिका अभी जो फैसले ले रहा है, उसे इजरायल के खिलाफ नहीं देखा जाना चाहिए. अभी डोनाल्ड ट्रंप जो फैसले ले रहे हैं, वह अमेरिका और इजरायल, दोनों के लिए सही है."
अगर इन सबके बावजूद इजरायल ने बगावत की तो क्या होगा? इस सवाल पर डॉ बी बाला भास्कर का जवाब था कि अमेरिका तुरंत चाहे तो इजरायल के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव लेता आएगा. चीन और रूस उसके पक्ष में वोट देने के लिए तैयार रहेंगे. नेतन्याहू पर पहले ही युद्ध अपराध के लिए इंटरनेशनल कोर्ट का वारंट जारी हो रखा है. कुल मिलाकर बगावत करने पर नेतन्याहू के लिए स्थिति बहुत मुश्किल हो जाएगा. नेतन्याहू अकेले ईरान के खिलाफ हमले की बात सोचेंगे भी नहीं क्योंकि वह अमेरिका के साथ मिलकर भी ईरान को नहीं हरा पाए हैं.
अमेरिका के हित अब बदल गए हैं
अमेरिका के अंदर यहूदी लॉबी बहुत मजबूत है. वहां जो भी सरकार बनी है, वह इजरायल के पक्ष में मजबूती से खड़ी रही है. इसके पीछे की वजह सिर्फ यह नहीं है कि वॉल स्ट्रीट पर एक तरह से राज करने वाले यहूदी समुदाय से अमेरिकी नेताओं को खूब चंदा मिलता है. इसके पीछे एक धार्मिक कारण भी है. बाइबल की कुछ भविष्यवाणियों के अनुसार यह माना जाता है कि "यीशु मसीह का दूसरा आगमन" तब होगा, जब दुनिया के अंत समय में इजरायल का विस्तार और उत्थान होगा.
वैसे साल 2012 तक मिडिल ईस्ट में अमेरिका और इजरायल के हित काफी हद तक एक जैसे थे, भले उनकी प्राथमिकताएं अलग थीं. उस समय अमेरिका के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा ऊर्जा सुरक्षा का था. उसे यहां से तेल और गैस मिलता था. दूसरी ओर, इजरायल की प्राथमिकता अपनी सुरक्षा और दुश्मनों पर सैन्य बढ़त बनाए रखना था. लेकिन 2012 के बाद जब अमेरिका को अपने यहां ही खुद का तेल और गैस मिल गया यानी जब शेल तेल क्रांति आई तो उसके बाद स्थिति बदल गई. अमेरिका, जो पहले बड़े पैमाने पर तेल आयात करता था, खुद तेल निर्यात करने वाला देश बन गया. इससे उसकी खाड़ी देशों के तेल पर निर्भरता कम हो गई.
बाला भास्कर के अनुसार जितनी मदद ट्रंप ने इजरायल की इस जंग में कूदकर कर दी है, उतनी कोई भी अन्य अमेरिका सरकार नहीं करती. अमेरिका इजरायल के ही इस खुफिया इनपुट पर जंग में कूदा था कि अगर ईरान के बड़े नेताओं और सैन्य अधिकारियों को एक साथ हमले में मार दिया जाए तो तेहरान का शासन गिर जाएगा. लेकिन यह इनपुट गलत साबित हुआ. अब इजरायल अमेरिका पर दोबारा जंग में शामिल होने का दबाव नहीं डाल सकता. उन्होंने कहा, "बगावत करने की ताकत इजरायल में नहीं है क्योंकि सही अर्थों में अमेरिका के बिना इजरायल नक्शे पर नहीं दिखेगा."
दोनों तरफ चुनाव और अपने-अपने दांव
अमेरिका की घरेलू राजनीति के लिए हद हो गई थी और वह जंग को बढ़ाने के पक्ष में नहीं थी. रिपब्लिकन पार्टी में भी ट्रंप समर्थक नेता ऐसे समझौते की तलाश में थे जिससे अमेरिका किसी बड़े युद्ध में न फंसे. डॉ बी बाला भास्कर मानते हैं कि अमेरिका और पूरी दुनिया में इजरायल से भी अधिक नेतन्याहू का विरोध बढ़ रहा है. यहां तक कि अमेरिका के अंदर भी जो यहूदी लोग हैं, वे नेतन्याहू के खिलाफ हैं. इसके लिए उन्होंने वाशिंगटन पोस्ट के उस सर्वे का हवाला दिया, जिसके अनुसार अमेरिका में 61% यहूदी लोगों का कहना है कि इजरायल ने गाजा में युद्ध अपराध किए हैं और लगभग 40% लोग इसकी कार्रवाई को नरसंहार बताते हैं. उन्होंने कहा, "अमेरिका के आम लोगों का मत तो और विरोध में है. ऐसे में डोनाल्ड को आगे खुद भी मिडटर्म इलेक्शन लड़ना है, वो भी दिखाना चाहते हैं कि उनका स्टैंड इजरायल को लेकर अब कड़ा है."
दूसरी तरफ इजरायल में भी चुनाव होने हैं. नेतन्याहू बहुत ही मुश्किल स्थिति में दिख रहे हैं. नेतन्याहू न तो ईरान के खिलाफ और न ही हिजबुल्लाह के खिलाफ कोई निर्णायक नतीजा हासिल कर पाए हैं. उनकी हार तय मानी जा रही है. डॉ बाला भास्कर के अनुसार ईरान का मुद्दा इजरायल को एक कर देता है, इजरायल की पूरी राजनीति ही ईरान के विरोध पर टिकी है. ईरान हमेशा उनका दुश्मन रहेगा. लेकिन अब नेतन्याहू के लिए स्थिति बहुत गंभीर है. उन्होंने कहा, "इजरायल के लोग नेतन्याहू से बहुत तंग आ चुके हैं. अब उनकी कहानी खत्म हो चुकी है."
कुल मिलाकर इजरायल की ताकत चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न दिखे, उसकी रणनीतिक सांसें अब भी काफी हद तक वॉशिंगटन से ही चलती हैं. ईरान के साथ समझौते के बाद ट्रंप और नेतन्याहू की प्राथमिकताएं अलग-अलग दिख रही हैं. एक तरफ ट्रंप युद्ध खत्म कर अपनी राजनीतिक जीत दिखाना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ नेतन्याहू के सामने सत्ता बचाने की चुनौती है.
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