ईरान का मिसाइल अंडरवर्ल्ड, जिसके दम पर वो अमेरिका और इजरायल के सामने टिका हुआ है

मिडिल ईस्ट का युद्ध अब 'मिसाइल और इंटरसेप्टर' के गणित पर टिक गया है. जहां अमेरिका हर घंटे 340 करोड़ खर्च कर रहा है, वहीं ईरान के 'सस्ते सुसाइड ड्रोन्स' ने महाशक्ति की रणनीति बदल दी है.

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  • मिडिल ईस्ट के संघर्ष में ईरान के मिसाइल प्रोग्राम और सस्ते ड्रोन अमेरिका जैसी महाशक्ति के लिए चुनौती बन गए हैं
  • अमेरिका ने ईरानी ड्रोन डिजाइन की नकल कर अपनी ड्रोन टास्कफोर्स स्कॉर्पियन में उपयोग करना शुरू किया है
  • ईरान की मिसाइल सिटी पर अमेरिका और इजराइल ने बड़े पैमाने पर हमले कर मिसाइल लॉन्चर्स को निशाना बनाया है
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मिडिल ईस्ट में जारी भीषण संघर्ष अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां जीत और हार का फैसला केवल सेना की संख्या से नहीं, बल्कि 'मिसाइल और इंटरसेप्टर' के गणित से तय हो रहा है. ईरान की सबसे बड़ी ताकत और विरोधियों की सबसे बड़ी यही दो चीजें हैं. पहला ईरान का विशाल मिसाइल प्रोग्राम और दूसरा उसके सस्ते ड्रोन. ईरान के ड्रोन का हमला इतना घातक है कि अमेरिका जैसी महाशक्ति भी चलते युद्ध में इसकी नकल तैयार करने को मजबूर हो गई. इस युद्ध ने दुनिया को दिखा दिया है कि ईरान के ड्रोन और मिसाइल नेटवर्क ने अमेरिका जैसी महाशक्ति को भी अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है. 

ईरान का 'सस्ता' ड्रोन: जब महाशक्ति ने की नकल

ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसके 'शहीद' जैसे  सुसाइड ड्रोन साबित हुए हैं. ये ड्रोन इतने प्रभावी हैं कि अमेरिकी सेंट्रल कमांड के कमांडर ब्रैट कूपर ने स्वीकार किया है कि अमेरिका ने अपनी नई ड्रोन टास्कफोर्स 'स्कॉर्पियन' में ईरानी डिजाइन का ही उपयोग किया है. वहीं दूसरी ओर से अमेरिका 'कमांडर ब्रैट कूपर' ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है. ये मुख्य रूप से ईरानी डिजाइन के ड्रोन हैं. इन्हें और बेहतर बनाया और अब हम इन्हें ईरान के खिलाफ ही इस्तेमाल किया जा रहा है.

ईरान का 'अंडरवर्ल्ड' खतरे में

ईरान ने सालों की मेहनत से पहाड़ों के नीचे और जमीन के भीतर 'मिसाइल सिटी' का एक जाल बिछाया है. मार्च 2025 में दुनिया ने इसका ट्रेलर देखा था. लेकिन आज यही ताकत उसकी कमजोरी बनती दिख रही है. अमेरिका दक्षिण से और इज़रायल उत्तर से इन मिसाइल शहरों के दरवाजों पर प्रहार कर रहा है.अमेरिका का दावा है कि रूस से मिल रही तकनीकी मदद के कारण ईरान अमेरिकी ठिकानों पर सटीक हमले कर रहा है. सैटेलाइट तस्वीरों से पुष्टि हुई है कि सिराज और केरमानशाह जैसे इलाकों में ईरान के मूविंग लॉन्चर्स को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया है.

कितने दिन टिकेगा ईरान?

एक सवाल बार बार उठ रहा है कि ईरान की मिसाइल और ड्रोन आखिर कितने दिन तक अमेरिका और इजरायल के इंटरसेप्टर के सामने टिक पाएंगे. क्या उनका स्टॉक लंबे समय तक चलने के लिए सुरक्षित रहेगा. क्योंकि अभियान तीसरे चरण में है. तीसरे चरण का केवल एक मकसद है. वो है ईरान की मिसाइल क्षमता को खत्म करना है. ईरान से आने वाली हर पांच खबर में से तीन का मैसेज एक ही होता है, या तो ईरान के मिसाइल बेस पर अटैक होता है, या मिसाइल के मूविंग लांचर पर.

अमेरिका ने ये दावा किया है कि  ईरान को रूस से ऐसी टेक्निकल मदद और जानकारी मिल रही है जिसके दम पर वो अमेरिकी सेना के अड्डे पर बिल्कुल सटीक हमले कर रहा है. संभव है कि जैसे रूस के खिलाफ यूक्रेन अमेरिकी मदद से लड़ रहा है वैसे ईरान भी लड़े अगर ये युद्ध लंबा खिंचता है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दावा कर रहे हैं कि अमेरिका को भारी बढ़त है. ट्रंप ने दावा किया कि ईरान में हम बहुत अच्छा कर रहे हैं. किसी ने पूछा कि 0 से 10 में कितना स्कोर करेंगे. तो मैंने कहा कि  में 15 टू 15 में स्कोर करूंगा. उनकी सेना,नौसेना गई, उनका संचार खत्म है. उनके लीडर गए. उनके लीडर्स की दो पीढ़ियां खत्म हो चुकी हैं. अब वो लीडर्स की तीसरी पीढ़ी के साथ हैं. उनकी वायुसेना पूरी तरह से खत्म है. उनके 32 शिप भी समुद्र में डूब चुके हैं. अन्य क्षेत्र में भी हम अच्छा कर रहे हैं.

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युद्ध का खर्च: पेंटागन पर भारी बोझ

डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका हथियारों का उत्पादन तो बढ़ा रहा है, लेकिन इसकी कीमत बहुत भारी है. पेंटागन ने इसका अनुमान भी लगाया है.

  • दैनिक खर्च: 9,160 करोड़ रुपये.
  • शुरुआती 100 घंटे: 34,000 करोड़ रुपये खर्च हुए.
  • प्रति घंटा खर्च: 340 करोड़ रुपये.
  • इक्विपमेंट लॉस: पहले 4 दिनों में ही 18,000 करोड़ रुपये के सैन्य उपकरण नष्ट हो गए.

ईरान की मिसाइल प्रोफाइल और घटती ताकत

एक्सपर्ट्स के अनुसार, युद्ध के चौथे दिन तक ईरान की मिसाइल प्रहार क्षमता में 86% की कमी आई है. इज़रायल का दावा है कि उसने ईरान के 60% यानी लगभग 300 बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्चर्स को नष्ट कर दिया है. रोजाना 20 मिसाइल हमलों की कमी दर्ज की गई है. पहले दिन इजरायल पर 90 मिसाइल फायर की गई. रविवार को फायर मिसाइल की संख्या 60 हो गई. इसके बाद हर दिन बीस मिसाइल कम होती चली गईं. कुल मिलाकर करीब 700 मिसाइल फायर करने का दावा किया जा रहा है.

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ईरान के तरकश के प्रमुख तीर

  • ईमाद: मीडियम रेंज मिसाइल,1700 किलोमीटर तक की मारक क्षमता.
  • खोर्रमशर: मीडियम रेंज मिसाइल है इसकी मारक क्षमता 2000 से 3000 किलोमीटर बताई जाती है.
  • फतह-2: एक हाइपरसोनिक मिसाइल है. 
  • शहाब-3: मीडियम रेंज मिसाइल है इसकी मारक क्षमता 800 से 1300 किलोमीटर है.
  • गदर-1: मीडियम रेंज मिसाल है, 1600 से 2000 किमी की रेंज है.
  • कियाम-1: सॉर्ट रेंज बैलास्टिक मिसाइल है ये 700 से 800 किमी की दूरी तय करती है.
  • फतेह-110 शार्ट रेंज बैलेस्टिक मिसाइल है, जो 200 से 300 किमी. की मार करती है.
  • फतेह 313: शार्ट रेंज मिसाइल है, जो 500 किमी. तक मार करती है. 
  • ज़ोल्फाघर: शार्ट रेंज बैलेस्टिक मिसाइल है, 700 किमी की रेंज है.
  • डेजपुल: शार्टरेंज बैलास्टिक मिसाइल है, जिसकी दूरी 1000 किमी है.

ये सारी मिसाइलें पूरे देश में मिसाइल सिटी में सुरक्षित मानी जाती हैं. जरूरत पड़ने पर ईरान इनका इस्तेमाल करता है.ईरान के मिसाइल मैनेजमेंट सिस्टम से पूरी दुनिया हैरान है. सवाल पूछा जाता है कि अमेरिका और इजरायल जैसी पावरफुल शक्तियां मिलकर भी उसके मिसाइल पॉवर को अभी तक नष्ट क्यों नहीं कर पाई हैं जबकि सालों से कई बार इसे मिटाने की कोशिश की गई है.

इसके अलावा ईरान के पास तोपखाने की ताकत की तरह कोकसन मिसाइल है. ये चालीस से साठ किलोमीटर की दूरी तय कर लेती है. राड नाम की एंटीशिप क्रूज मिसाइल है जो कि 350 किमी. की दूरी तक मार कर सकती है.अली नाम की लैंड अटैक क्रूज मिसाइल है. सेजिल, शाहाब, सिमोघ्र, सोमुर और टोंडूर नाम की मिसाइलें भी ईराने के बेड़े में शामिल हैं। इनके साथ ड्रोन का कॉकटेल बना कर ईरान ने जो अटैक तकनीकी बनाई है. उसने उसे महाशक्तियों के खिलाफ काफी एडवांटेज दिया है.

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