- 1973 के तेल संकट में अरब देशों ने पश्चिमी देशों के खिलाफ तेल आपूर्ति रोक कर वैश्विक राजनीति प्रभावित की थी.
- आज ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य पर दबाव बनाकर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान पैदा करने की कोशिश कर रहा है.
- होर्मुज जलडमरूमध्य से वैश्विक तेल सप्लाई का लगभग 20-25 % गुजरता है, जिससे किसी भी रुकावट का बड़ा असर होता है.
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच ईरान की रणनीति ने 1973 के तेल संकट की याद दिला दी है. उस समय Yom Kippur War के दौरान अरब देशों ने पश्चिमी देशों के खिलाफ तेल आपूर्ति रोक दी थी, जिससे वैश्विक राजनीति की दिशा बदल गई थी. उस समय के इस कड़े फैसले ने न केवल दुनिया भर में ऊर्जा का हाहाकार मचाया था, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था की दिशा को भी हमेशा के लिए बदल दिया था. आज ईरान की गतिविधियों में उसी पुराने रणनीतिक दबाव की झलक दिखाई दे रही है, जो आधुनिक दौर में भी एक बड़े वैश्विक संकट का संकेत दे रही है.
होर्मुज सबसे अहम ऊर्जा मार्गों में से एक
आज ईरान सीधे तेल सप्लाई बंद करने के बजाय होर्मुज जलडमरूमध्य पर दबाव बनाकर वहीं असर पैदा करने की कोशिश करता दिख रहा है. होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा मार्गों में से एक है, जहां से करीब 20-25 प्रतिशत वैश्विक तेल सप्लाई गुजरती है. ऐसे में यहां किसी भी तरह की रुकावट का असर तुरंत वैश्विक बाजारों पर पड़ता है. तेल की कीमतों में उछाल, सप्लाई चेन पर दबाव और आर्थिक अनिश्चितता बढ़ जाती है.
हालांकि, 1973 और आज के हालात में बड़ा अंतर है. तब अरब देश एकजुट थे, जबकि ईरान इस रणनीति में लगभग अकेला नजर आता है. इसके अलावा अब कई देशों के पास रणनीतिक तेल भंडार हैं और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत भी विकसित हो चुके हैं, जिससे प्रभाव कुछ हद तक कम हो सकता है.
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डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सख्त चेतावनी दी
इस पूरे समीकरण में सबसे अहम भूमिका अमेरिका की है. डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य खुला रहना चाहिए, वरना गंभीर सैन्य परिणाम हो सकते हैं. उन्होंने यह भी संकेत दिया है कि युद्धविराम समझौते में होर्मुज को खोलना एक प्रमुख शर्त हो सकती है.
ऐसे में जहां किंग फैसल की रणनीति आर्थिक दबाव के जरिए कूटनीति को मजबूर करती थी. वहीं, ईरान का यह कदम सीधे सैन्य टकराव को जन्म दे सकता है. कुल मिलाकर, ईरान का ‘ऑयल प्रेशर' वैश्विक दबाव तो बना सकता है, लेकिन क्या यह जंग को रुकवा पाएगा, यह अब भी बड़ा सवाल बना हुआ है.
उस समय तेल को फैसल ने बनाया था ढाल
बता दें कि किंग फैसल का 'ऑयल वेपन' 1973 के अरब-इजरायल युद्ध के दौरान वैश्विक राजनीति का सबसे मारक हथियार बनकर उभरा था. सऊदी अरब के राजा फैसल बिन अब्दुलअजीज ने इजरायल को मिल रहे अमेरिकी और पश्चिमी समर्थन के विरोध में एक कड़ा रुख अपनाते हुए तेल की आपूर्ति को ही राजनीतिक ढाल बना लिया. इस ऐतिहासिक कदम के तहत सऊदी अरब ने न केवल पश्चिमी देशों को तेल का निर्यात रोक दिया, बल्कि उत्पादन में भी भारी कटौती की. इसका परिणाम एक भीषण वैश्विक ऊर्जा संकट के रूप में सामने आया, जिसने अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को रातों-रात चार गुना तक बढ़ा दिया. किंग फैसल की इस रणनीति ने साबित कर दिया कि तेल सिर्फ ईंधन नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीति की दिशा बदलने वाला एक शक्तिशाली आर्थिक हथियार है.
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