ईरान-अमेरिका को एक मेज पर लाकर फालतू इतरा रहा पाकिस्तान, शांति वार्ता पर फैसले तो कहीं और ही हुए हैं

Iran-America Peace Talks Islamabad: अमेरिका-ईरान के बीच जंग रुकवाकर पाकिस्तान में शांति वार्ता की पेशकश करने वाला भारत के पड़ोसी मुल्क की भूमिका इस पूरे मसले में काफी हद तक केवल प्रतीकात्मक है न कि ठोस. इसे ऐसे समझिए कि यूएस-ईरान के बीच सीजफायर पाकिस्तान ने नहीं कराया है और असल फैसले कहीं और हुए हैं.

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  • पाकिस्तान ने ईरान-अमेरिका शांति वार्ता की मेजबानी की है, जिसे प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ कूटनीतिक सफलता मानते हैं
  • अमेरिका-ईरान के बीच संघर्ष विराम हताशा और विकल्पों की कमी के कारण हुआ है, जो अस्थिर स्थिति दर्शाता है
  • पाकिस्तान की भूमिका इस संघर्ष विराम में केवल प्रतीकात्मक है और असल कूटनीतिक निर्णय कहीं और हुए हैं
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नई दिल्ली:

Iran-America Peace Talks Islamabad: ईरान-अमेरिका को इस्लामाबाद में एक ही मेज पर लाकर पाकिस्तान खूब खुश है. पाक पीएम शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर इसे कूटनीतिक जीत मान रहे हैं. पीएम शहबाज ने अपने देश के नाम संबोधन में सेना के सर्वेसर्वा आसिम मुनीर की जमकर तारीफ की है. कहा कि वार्ता को सफल बनाने की पूरी कोशिश करेंगे. आज दोनों देशों के बीच जारी तल्खी सामान्य होगी या मामला और आगे बढ़ जाएगा, ये तो वक्त ही बताएगा. अमेरिका-ईरान के बीच जंग रुकवाकर पाकिस्तान में शांति वार्ता की पेशकश करने वाला भारत के पड़ोसी मुल्क की भूमिका इस पूरे मसले में काफी हद तक केवल प्रतीकात्मक है न कि ठोस. इसे ऐसे समझिए कि यूएस-ईरान के बीच सीजफायर पाकिस्तान ने नहीं कराया है और असल फैसले कहीं और हुए हैं. सोशल मीडिया पोस्ट के अलावा ऐसे कोई ठोस कूटनीतिक प्रमाण नहीं हैं जो साबित करें कि पाकिस्तान ने ही यह समझौता करवाया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल दावों के आधार पर पाकिस्तान को इस ऐतिहासिक समझौते का असली सूत्रधार नहीं माना जा सकता.  

एक कमजोर धागे पर टिका संघर्ष विराम

मध्य पूर्व (Middle East) में लगभग 40 दिनों के भीषण संघर्ष के बाद, कम से कम दो हफ्तों के लिए हर तरह के हमले शांत हुए हैं, लेकिन यह शांति एक ऐसे कमजोर धागे पर टिकी है जो किसी भी क्षण टूट सकता है.यह संघर्ष विराम हताशा और विकल्पों की कमी का परिणाम है.अमेरिका की 'रैपिड स्ट्राइक एग्जिट स्ट्रैटीजी' (तेजी से हमला कर बाहर निकलने की रणनीति) ने सुरक्षा समुदाय में विश्वास पैदा नहीं किया है. जमीनी स्थिति का आकलन करने के लिए खार्ग द्वीप पर हमला करने का आखिरी प्रयास किया गया था, लेकिन वह भी जमीनी ऑपरेशनों के लिए बहुत अस्थिर और जोखिम भरा साबित हुआ.ट्रंप की ओर से दी गई समय सीमा (ultimatum) खत्म होने से ठीक एक दिन पहले, जब अमेरिका के पास विकल्प खत्म हो गए और राजनयिक दबाव बढ़ने लगा, तो अपनी साख बचाने के लिए उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा था.इसी मजबूरी के चलते इस 'संघर्ष विराम के सर्कस' (ceasefire circus) की शुरुआत हुई.

पाकिस्तान बेवजह ही खुश है

रिपोर्ट के अनुसार, कई कारक इस ओर इशारा करते हैं कि संघर्ष विराम (सीजफायर) में पाकिस्तान की भूमिका प्रचार के माध्यम से केवल एक हाई-वोल्टेज प्रतीकात्मक खेल है, ताकि वह खुद को एक मुख्य खिलाड़ी के रूप में पेश कर सके.रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि इस मामले में पाकिस्तान का कोई राजनयिक या प्रभावशाली महत्व नहीं है.पाकिस्तान केवल एक "साधारण सुविधा प्रदाता" (facilitator) के रूप में काम कर रहा है, जबकि वहां का मीडिया उसे एक प्रमुख मध्यस्थ (mediator) के रूप में पेश करने की पूरी कोशिश कर रहा है. हाल ही में, भारत में ईरान के दूत ने भी संघर्ष को सुलझाने में पाकिस्तान की मध्यस्थता के दावों को खारिज कर दिया था.

रिपोर्ट में कहा गया है,"पाकिस्तान का एकमात्र सहारा उसकी 'इस्लामी राजनीति' है, जो इस संघर्ष में इस्लामाबाद की भूमिका को सीमित कर देती है.यह उसे केवल एक मध्यस्थ या 'बिचौलिए' (middleman) के रूप में ही इस मुद्दे पर पेश कर रही है, जिसका कूटनीतिक प्रभाव या मध्यस्थता पर असर न के बराबर है, जबकि दावा इसके विपरीत किया जा रहा है."पाकिस्तान के पास ईरान या अमेरिका को युद्धविराम के लिए मनाने के लिए आखिर क्या ताकत या प्रभाव है? लगभग कुछ भी नहीं.तो फिर इस पूरी घटना में पाकिस्तान को मुख्य खिलाड़ी मानने का क्या औचित्य है? सिर्फ दिखावे के अलावा कुछ नहीं.

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ईरान ने ही खोल दी पोल 

रिपोर्ट के अनुसार, ईरान और अमेरिका के उन बयानों का गलत मतलब निकाला गया है जिनमें पाकिस्तान की भूमिका का जिक्र था, जिससे ऐसा लगा कि इस्लामाबाद इस पूरी प्रक्रिया का मुख्य खिलाड़ी है.रिपोर्ट में आगे कहा गया, "दोनों देशों के नेताओं की ओर से जारी बयानों का असली सार यह है कि पाकिस्तान को एक 'मध्यस्थ' (mediator) के बजाय केवल किसी डाकिए के रूप में कार्य करना चाहिए. 'आईएएनएस' (IANS) से विशेष बातचीत में, भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने युद्ध के दौरान पाकिस्तान की भूमिका पर पूछे गए सवाल के जवाब में कहा कि उसने कोई बड़ी भूमिका नहीं निभाई है. उन्होंने कहा, "हमने पाकिस्तान को युद्ध में भाग लेते हुए नहीं देखा है, लेकिन उनकी भूमिका सकारात्मक भी नहीं रही है.संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने निजी कारणों से उन्हें केवल एक 'सुविधा प्रदाता' (facilitator) के रूप में इस्तेमाल करना चुना है.हमें इस 15-सूत्रीय योजना को लागू करने के लिए अमेरिका पर पूरा भरोसा है."

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