पेट्रोल-डीजल, अनाज से लेकर चाय-चीनी तक... भारत खींच ले हाथ तो मोहताज हो जाएगा नेपाल, फिर भंसार वाली गलती क्यों?

Nepal Tax on Indian Goods: नेपाल के पास अपनी कोई रिफाइनरी नहीं है. उसकी 100% पेट्रोलियम सप्लाई भारतीय तेल कंपनियों के भरोसे चलती है. दोनों देशों के बीच रिश्तों को मजबूत करने के लिए रक्सौल-अमलेखगंज सीमा पार पेट्रोलियम पाइपलाइन बनाई गई है.

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नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने हाल ही में भारत से जाने वाले सामान पर भंसार टैक्स लगा दिया.

नेपाल एक ऐसा देश है जो चारों तरफ से जमीन से घिरा है. नक्शे को ध्यान से देखें तो समझ आता है कि नेपाल की भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी है कि उसकी जिंदगी की डोर पूरी तरह भारत से बंधी हुई है. सुबह की चाय की चीनी से लेकर गाड़ियों में दौड़ने वाले पेट्रोल तक, सब कुछ भारत से ही नेपाल पहुंचता है. लेकिन विडंबना देखिए, जिस भारत पर नेपाल की अर्थव्यवस्था और आम जन-जीवन सांस लेता है, उसी भारत के व्यापारियों और आम लोगों के लिए नेपाल 'भंसार' (कस्टम ड्यूटी) जैसे नियम लागू कर देता है. पारंपरिक और दोस्ताना रिश्तों को ताक पर रखकर उठाए जाने वाले ये कदम हैरान करते हैं.

समझने की कोशिश करते हैं कि भारत, नेपाल के लिए क्या अहमियत रखता है और क्यों नेपाल का यह रवैया खुद उसके पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है.

व्यापार और निवेश का सबसे बड़ा सहारा

आंकड़े झूठ नहीं बोलते. अगर नेपाल के कुल व्यापार को देखा जाए, तो अकेले भारत के साथ उसका व्यापार करीब 63.01% है. नेपाली वित्तीय वर्ष 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, यह व्यापार लगभग 8.02 अरब डॉलर का बैठता है. इतना ही नहीं, नेपाल जो कुछ भी दुनिया को बेचता है, उसका सबसे बड़ा हिस्सा यानी कुल निर्यात का भारी-भरकम 67.71% अकेले भारत खरीदता है. नेपाल मुख्य रूप से इलायची, रोल्ड आयरन शीट, खाने का तेल, जूस, प्लाईवुड और जूट जैसी चीजें भारत को बेचकर अपनी जेब भरता है.

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सिर्फ व्यापार ही नहीं, नेपाल में होने वाले कुल विदेशी निवेश (FDI) का एक-तिहाई हिस्सा भारत से जाता है. भारत से नेपाल को होने वाले निर्यात पर नजर डालें तो साल 2023-24 में यह 7,040.98 मिलियन डॉलर था, जो साल 2024-25 में बढ़कर 7,334.87 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया. साफ है कि अगर भारत हाथ खींच ले, तो नेपाल के बाजार सूने हो जाएंगे.

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थाली के अनाज से लेकर गाड़ियों के ईंधन तक... सब भारत के भरोसे

नेपाल की खाद्य सुरक्षा पूरी तरह से भारतीय खेतों पर टिकी हुई है. भारत से नेपाल को भारी मात्रा में चावल, गेहूं, दालें और अन्य अनाज निर्यात किए जाते हैं. आलम यह है कि जब भी भारत घरेलू जरूरतों के कारण चीनी या अन्य अनाजों के निर्यात पर मामूली प्रतिबंध भी लगाता है, तो नेपाल के बाजारों में हाहाकार मच जाता है और वहां महंगाई आसमान छूने लगती है. इसके अलावा नेपाल की सड़कों पर दौड़ने वाली गाड़ियों, दोपहिया वाहनों, जीवन रक्षक दवाओं, लोहे और स्टील का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता भी भारत ही है.

भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय और नेपाल राष्ट्र बैंक के आंकड़ो के मुताबिक, नेपाल के पास अपनी कोई रिफाइनरी नहीं है. उसकी 100% पेट्रोलियम सप्लाई भारतीय तेल कंपनियों के भरोसे चलती है. दोनों देशों के बीच रिश्तों को मजबूत करने के लिए रक्सौल-अमलेखगंज सीमा पार पेट्रोलियम पाइपलाइन बनाई गई, जो दक्षिण एशिया की पहली क्रॉस-बॉर्डर पाइपलाइन है. इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) द्वारा पोषित इस पाइपलाइन से नेपाल ऑयल कॉर्पोरेशन को हर महीने करीब 15 करोड़ नेपाली रुपये की बचत होती है. दिसंबर 2020 में इस पाइपलाइन ने नेपाल को एक ही महीने में 10 करोड़ लीटर डीजल सप्लाई करने का रिकॉर्ड बनाया था. अब इसका विस्तार चितवन तक किया जा रहा है.

जमीन के साथ-साथ आसमान में भी दोनों देश जुड़े हैं. भारत-नेपाल हवाई सेवा समझौते के तहत दोनों तरफ से हर हफ्ते 30,000 सीटें आवंटित की गई हैं. यानी नेपाल की कनेक्टिविटी की हर नस भारत से होकर गुजरती है.

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बिजली संकट दूर करने का 'पावर' प्लान

नेपाल में नदियों का जाल तो है, लेकिन उनके पास बिजली बनाने का बुनियादी ढांचा नहीं था. भारत ने एक्सिम बैंक (EXIM Bank) के जरिए नेपाल को लोन (Lines of Credit) देकर वहां कोशी कॉरिडोर और मोदी-लेखनाथ जैसी बड़ी बिजली ट्रांसमिशन लाइनें बनवाईं. अप्रैल 2022 में शुरू हुई 90 किमी लंबी सोलू कॉरिडोर ट्रांसमिशन लाइन इसका जीता-जागता उदाहरण है, जिसने उत्तर-पूर्वी नेपाल को उनके राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ा.

  • भारत की SJVN लिमिटेड नेपाल का सबसे बड़ा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट 'अरुण-III' (900 मेगावाट) बना रही है.
  • लोअर अरुण और अरुण-4 परियोजनाओं पर भी काम चल रहा है.
  • जीएमआर (GMR) कंपनी 900 मेगावाट का अपर कर्णाली प्रोजेक्ट और एनएचपीसी (NHPC) 1200 मेगावाट का वेस्ट सेती प्रोजेक्ट संभाल रही है.
  • ये परियोजनाएं पूरी होने के बाद नेपाल न सिर्फ आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि भारत को बिजली बेचकर पैसा भी कमा सकेगा.

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अंतरिक्ष से लेकर विज्ञान तक में भारत देता है साथ

भारत सिर्फ जरूरत का सामान ही नहीं दे रहा, बल्कि नेपाल को भविष्य की तकनीक से भी लैस कर रहा है. भारत की वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) और नेपाल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी अकादमी (NAST) मिलकर जॉइंट रिसर्च कर रहे हैं. वैज्ञानिक एक-दूसरे के देशों में जाकर नई खोजों पर काम कर रहे हैं.

नेपाल को अंतरिक्ष की राह भी भारत ही दिखा रहा है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) मिलकर नेपाल के 'मुनाल' (Munal) उपग्रह को भारत के पीएसएलवी (PSLV) रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजने की कोशिश हुई थी.

दोनों देशों के बीच क्या है संधियां?

दोनों देशों के बीच'भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि 1950' चली आ रही है. यह संधि नेपाल के नागरिकों को भारत में खुली आवाजाही, रहने, जमीन-जायदाद खरीदने और नौकरी-व्यापार करने का वही अधिकार देती है जो एक भारतीय नागरिक को मिलता है. इसी का नतीजा है कि लाखों नेपाली नागरिक भारत में काम करते हैं और उनके द्वारा भेजा जाने वाला पैसा (रेमिटेंस) नेपाल की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है.

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इसके अलावा 2009 की व्यापार संधि नेपाल के सामानों को बिना किसी ड्यूटी (शुल्क) के भारतीय बाजारों में एंट्री देती है. वहीं 'ट्रीटी ऑफ ट्रांजिट' (जिसका जून 2023 में 7 साल के लिए नवीनीकरण किया गया) के तहत नेपाल दुनिया के किसी भी तीसरे देश से व्यापार करने के लिए भारत के रास्तों और बंदरगाहों का इस्तेमाल करता है. रेल सेवा समझौते (RSA) के जरिए भारतीय और नेपाली रेलवे मिलकर माल ढुलाई को सस्ता और सुगम बना रहे हैं.

फिर 'भंसार' विवाद खड़ा कर क्यों कड़वाहट घोलता है नेपाल?

इतना सब कुछ होने के बाद भी, जब नेपाल अपनी घरेलू राजनीति या किसी बाहरी प्रभाव में आकर भारत से आने वाले सामानों, गाड़ियों या व्यापारियों पर 'भंसार' (कस्टम) के कड़े नियम थोप रहा है, तो इससे सदियों पुराने रिश्तों को ठेस पहुंचती है. भारत से जाने वाली रोजमर्रा की चीजों पर अचानक टैक्स बढ़ा देना या सीमा पर कड़ाई करना सीधे तौर पर उन समझौतों का उल्लंघन जैसा दिखता है, जिनके दम पर नेपाल सर्वाइव कर रहा है.

जब भारत अपनी खाद्य सुरक्षा के लिए चीनी या अनाज के निर्यात पर कोई पाबंदी लगाता है, तो नेपाल के पेट में दर्द होने लगता है. लेकिन जब खुद नेपाल 'भंसार' के जरिए भारतीय व्यापारियों के लिए मुश्किलें खड़ी करता है, तो वह भूल जाता है कि उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह भारत के रुख पर निर्भर है.

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