- यूक्रेन युद्ध ने साबित किया कि रूस को रोकना अब भी किसी की क्षमता से बाहर है और वह अकेले टिक सकता है
- अमेरिका-इजरायल के खिलाफ ईरान युद्ध में रूस और चीन की सहायता से संघर्ष लंबा और जटिल होता जा रहा है
- भारत को विश्व के सभी बड़े शक्तियां अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही हैं, पर भारत संतुलन बनाकर चलना चाहता है
दो युद्धों ने दशकों से चले आ रहे दुनिया के समीकरणों ने ध्वस्त कर दिया. दुनिया में नये तरीके से शक्ति संतुलन बन रहा है. यूक्रेन युद्ध ने ये साबित कर दिया कि सोवियत संघ के विघटन के बाद भी रूस को रोकना किसी के बस की बात नहीं. अगर रूस ने कुछ ठान लिया तो पूरी दुनिया एक तरफ और रूस दूसरी तरफ भी रहे तो वो हारेगा तो नहीं. अमेरिका और यूरोप ने पूरी ताकत लगा ली यूक्रेन युद्ध में रूस को हराने या रोकने की पर वो रुका नहीं. अमेरिका को फायदा नहीं दिखा तो इस युद्ध से धीरे-धीरे किनारे हो गया. अब यूरोप कितने दिनों तक यूक्रेन की मदद के लिए टिक पाएगा, ये देखने वाली बात है.
चीन-रूस ने अमेरिका को फंसाया?
दूसरा युद्ध ईरान में शुरू हुआ तो अमेरिका-इजरायल की अजेय जोड़ी के सामने ये लगा कि ईरान ज्यादा टिक नहीं पाएगा. मगर हालात ये है कि अमेरिका दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अब तक सबसे ज्यादा खर्च होने वाले युद्ध से निकलने के लिए छटपटा रहा है. उसके कई फाइटर जेट, डिफेंस सिस्टम, राडार ध्वस्त हो गए. ट्रंप ने साफ तौर पर कहा कि रूस और चीन ईरान की मदद कर रहे हैं, जैसे अमेरिका यूक्रेन की मदद कर रहा है. मतलब अब ये युद्ध तब तक नहीं रुकेगा जब तक की रूस और चीन नहीं चाहेंगे. कुछ-कुछ वैसे ही जैसे यूक्रेन युद्ध तब तक नहीं रुकेगा जब तक अमेरिका और यूरोप नहीं चाहेंगे.
फ्रांस ने मौके पर मारा चौका
साफ है कि अमेरिका अब अकेला सुपरपावर नहीं है. रूस लौट आया है. चीन ताकतवर हो चुका है और किसी को भी पानी पिलाने की हैसियत रखता है. मगर इन सबके बीच एक और चीज है, नाटो टूट के करीब पहुंच चुका है. नाटो में अमेरिका के अलावा यूरोप के 31 देश हैं. ईरान युद्ध में नाटो के नहीं लड़ने से अब अमेरिका नाराज है और देख लेने की धमकी दे रहा है. ऐसे में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने मध्यम आकार की शक्तियों से अमेरिका और चीन का डटकर मुकाबला करने का आह्वान किया है. मैक्रों ने इस सप्ताह अपने एशियाई दौरे के दौरान इस संदेश पर जोर दिया कि हमारा उद्देश्य दो वर्चस्ववादी शक्तियों के अधीन रहना नहीं है. हम चीन जैसे किसी देश के प्रभुत्व पर निर्भर नहीं रहना चाहते, न ही हम अमेरिका की अनिश्चितताओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होना चाहते हैं.
क्या चाहता है फ्रांस
मैक्रों ने कहा कि यूरोपीय देशों का जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय कानून, लोकतंत्र, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर साझा एजेंडा है. उन्होंने ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा और भारत जैसे अन्य समान विचारधारा वाले देशों का भी उल्लेख किया. उन्होंने तर्क दिया कि यह गठबंधन एआई, अंतरिक्ष, ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, रक्षा, सुरक्षा - "किसी भी क्षेत्र" पर मिलकर काम कर सकता है.
दूसरे विश्व युद्ध वाली चाल
पिछले कुछ वर्षों में, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस के नेता चार्ल्स डी गॉल द्वारा स्थापित परंपरा का पालन करते हुए, मैक्रों ने बार-बार चीन और अमेरिका के बीच मध्य मार्ग अपनाने की कोशिश की है और वैश्विक व्यवस्था में विभाजन के खिलाफ चेतावनी दी है, लेकिन अमेरिका द्वारा अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की अवहेलना करने के कारण, फ्रांस की पारंपरिक स्थिति का प्रभाव अब अलग तरह से पड़ रहा है. मैक्रों जून में फ्रांस में होने वाले जी-7 शिखर सम्मेलन की मेजबानी के दौरान अपने इस संदेश को और मजबूत करेंगे. भारत इस मामले में एकमात्र ऐसा देश है, जिसे सभी अपने साथ रखना चाहते हैं. रूस, अमेरिका, चीन और अब यूरोप भी भारत को अपने पाले में करने की कोशिश कर रहा है. हालांकि, इसकी बहुत कम गुंजाइश है कि भारत किसी एक गुट में शामिल होगा. हां, वो सभी गुटों के बीच पावर बैलेंस जरूर करता रहेगा.
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