- ईरान ने अमेरिकी F-15E लड़ाकू विमान को मार गिराया है. एक पायलट बच गया, मगर दूसरा लापता है
- 1979 में ईरान ने अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर 52 अमेरिकी कर्मियों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा था
- 2016 में फारस की खाड़ी में ईरान ने अमेरिकी नौसेना के नौ नाविकों को हथियार उतारने और पूछताछ के बाद रिहा किया था
35 दिनों तक ईरान पर अमेरिकी लड़ाकू विमान बम बरसाते रहे और ईरान कराहता रहा. शनिवार को स्थिति बदल गई. एक F-15E लड़ाकू विमान को ईरान ने मार गिराया गया. इसमें दो लोग सवार थे. एक को बचा लिया गया, और दूसरा शख्स लापता है. अब उसे खोजने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच होड़ मची हुई है. F-15E में एक पायलट और पिछली सीट पर एक वेपन सिस्टम अधिकारी शामिल होते हैं.
लड़ाकू विमान गिराए जाने के कुछ ही घंटों के भीतर, स्थानीय ईरानी मीडिया ने एक सार्वजनिक घोषणा प्रसारित की: "प्रिय और सम्मानित लोगों, यदि आप दुश्मन पायलट या पायलटों को जीवित पकड़कर पुलिस और सैन्य बलों को सौंप देते हैं, तो आपको एक मूल्यवान पुरस्कार और बोनस मिलेगा." इस घोषणा के बाद वाशिंगटन और तेहरान के बीच लापता चालक दल के सदस्य तक सबसे पहले पहुंचने की होड़ मच गई.
1979 में क्या हुआ था
अगर ईरान लापता पायलट को पकड़ लेता है, तो यह पहली बार नहीं होगा जब तेहरान ने अमेरिकी कर्मियों को बंधक बनाया हो. लगभग 5 दशक पहले, 4 नवंबर 1979 को, ईरान के अपदस्थ शाह कैंसर के इलाज के लिए न्यूयॉर्क पहुंचे. इसके बाद अयातुल्ला खामेनेई समर्थक छात्रों के एक समूह ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास में घुसकर 66 अमेरिकियों को बंधक बना लिया, जिनमें राजनयिक, सैन्य अटैची और अमेरिकी मरीन दूतावास के गार्ड शामिल थे. उनमें से 52 को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया और अंततः 20 जनवरी 1981 को राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के उद्घाटन भाषण के कुछ घंटों बाद रिहा किया गया.
2016 था बेइज्जती वाला
इस घटना के लगभग 40 साल बाद, 12 जनवरी 2016 को, कुवैत से बहरीन जा रही अमेरिकी नौसेना की दो रिवरिन कमांड नौकाएं फारस की खाड़ी में फारसी द्वीप के पास ईरानी क्षेत्रीय जल में भटक गईं. नौकाएं फारसी द्वीप से लगभग एक समुद्री मील की दूरी मौजूद ईरान के एक बड़े सैन्य अड्डे के पास पहुंच गईं. नौ पुरुष और एक महिला सहित नौ नाविकों को सशस्त्र इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के सदस्यों ने बंदूक की नोक पर और आंखों पर पट्टी बांधकर तब हिरासत में ले लिया. तब अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने हिरासत में लिए जाने के पांच मिनट के भीतर ही ईरानी विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जरीफ को फोन किया, जिसके बाद दोनों के बीच कई बार बातचीत हुई. 15 घंटे बाद नाविकों को बिना किसी नुकसान के रिहा कर दिया गया.
मगर इसमें अमेरिका की घनघोर बेइज्जती हुई. ईरानी सेना ने नाविकों को अपने हथियार उतारने, घुटने टेकने और अपने हाथ सिर के पीछे रखने का आदेश दिया और इस दौरान उनकी तस्वीरें और वीडियो बना ली. इसके बाद चालक दल को फारसी द्वीप ले जाया गया, जहां उनसे पूछताछ की गई और उन्हें रात भर हिरासत में रखा गया. अगले दिन उन्हें छोड़ दिया गया.
अपनी रिहाई के लिए, नाविकों ने ईरान के दिए हुए जबरन खाने को कहा गया और कैमरे पर खुश दिखाई देने के लिए कहा गया. एक कैप्टन को ईरानियों की तरफ से लिखा गया माफीनामा पढ़ने को कहा गया. उस समय तक नाविकों को यह नहीं पता था कि यह सब होने से पहले ही अमेरिकी सरकार ने गुप्त वार्ताओं के माध्यम से उनकी बिना शर्त रिहाई सुनिश्चित कर ली थी. बाद में, अमेरिकी नौसेना की जांच में पाया गया कि मानचित्रण तकनीक उपलब्ध होने के बावजूद, चालक दल को यह एहसास नहीं हुआ कि वे कहां हैं.
अमेरिकी नौसेना बलों के केंद्रीय कमान के कमांडर वाइस एडमिरल केविन एम डोनेगन ने कहा, "12 जनवरी 2016 की घटना से जुड़ी परिस्थितियां बहुत निराशाजनक थीं."
ब्रिटिश कर्मियों को भी हिरासत में लिया
अमेरिका अकेला ऐसा देश नहीं है, जिसके सैन्यकर्मी ईरानी हिरासत में गए हैं. मार्च 2007 में, ईरानी नौसेना ने फारस की खाड़ी में व्यापारिक जहाजों के नियमित निरीक्षण के दौरान 15 ब्रिटिश नाविकों और मरीन सैनिकों को बंदूक की नोक पर पकड़ लिया. ब्रिटेन का कहना था कि उसके कर्मी उस समय इराकी जलक्षेत्र में थे, जबकि ईरान का कहना था कि वे अवैध रूप से ईरानी क्षेत्र में प्रवेश कर गए थे. यह कोई अकेली घटना नहीं थी. 2004 में, आठ ब्रिटिश सैनिकों को तीन दिनों तक हिरासत में रखा गया था, जब उनकी नावें ईरानी जलक्षेत्र में बह गईं थीं. उन्हें आंखों पर पट्टी बांधकर पूछताछ की गई और रिहा करने से पहले ईरानी टेलीविजन पर माफीनामा पढ़ने के लिए मजबूर किया गया.
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