- साइंस जर्नल 'नेचर' की एडिटर इन चीफ डॉ. मैग्डेलेना स्किपर ने ईरान युद्ध का वैज्ञानिक, मानवीय नजरिए से आकलन किया
- कहा कि युद्ध के प्रतिबंधों, सीमाएं बंद होने से अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग और शोध प्रभावित हो रहे हैं
- उनका कहना है कि राजनीति जब साक्ष्यों के खिलाफ हो जाती है तो इसका बौद्धिक और पीढ़ीगत नुकसान होता है
मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच सैन्य संघर्ष अब केवल भौगोलिक सीमाओं या रणनीतिक जीत-हार तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह ग्लोबल साइंस की जड़ों पर भी प्रहार कर रहा है. प्रतिष्ठित साइंस जर्नल 'नेचर' की एडिटर इन चीफ डॉ. मैग्डेलेना स्किपर ने ईरान युद्ध का वैज्ञानिक और मानवीय नजरिए से आकलन करते हुए कहा कि आधुनिक युद्ध न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय शोध के बुनियादी ढांचे बल्कि ग्लोबल नॉलेज इकोसिस्टम के लिए खतरा बन गए हैं.
शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बने युद्ध
भारत दौरे पर आईं डॉ. स्किपर ने NDTV से खास बातचीत में कहा कि कोई भी जंग अपने साथ बड़ी तबाही लेकर आती है. उसका खामियाजा इंसानों को ही भुगतना पड़ता है. इन संघर्षों से मानवीय संकट पैदा होते है. ये सिर्फ राजनीतिक इवेंट नहीं रह गए हैं, ये शोधकर्ताओं, सामाजिक वैज्ञानिकों और पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स के लिए भी बड़ी चुनौती बन रहे हैं.
अनुसंधान पर भारी पड़ रही पाबंदियां
आज का विज्ञान पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर टिका है. प्रयोगशालाएं एक से दूसरे देशों के बीच लोगों, डेटा, मटीरियल और उपकरणों पर निर्भर करती हैं. बंद सीमाएं, प्रतिबंध और आर्थिक पाबंदियां इस प्रवाह को रोक देते हैं. शोधकर्ता सीमाएं नहीं देखते, वो एकदूसरे के ज्ञान से लाभ उठाना चाहते हैं. जब भी इस तरह की पाबंदियां लगती हैं, भले ही कुछ समय के लिए लगें, वो रिसर्च के काम को ठप कर देती हैं. उन्होंने अपना उदाहरण देते हुए बताया कि मौजूदा संघर्ष की वजह से उड़ानें रद्द होने से कारण उनका भारत आना भी लगभग टल गया था. यह स्थिति उन हजारों वैज्ञानिकों की सच्चाई है, जिनका दशकों का शोध नेटवर्क इन संघर्षों के कारण कुछ ही दिनों में बिखर जाता है.
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जंग में विज्ञान की रचनात्मक भूमिका
इसके बावजूद डॉ. स्किपर का मानना है कि विज्ञान युद्ध में भी रचनात्मक भूमिका निभा सकता है. युद्ध के दौरान और बाद में किए गए शोध का डेटा अक्सर भविष्य में जंग रोकने में मददगार साबित हो सकता है, चाहे हथियारों पर कंट्रोल हो, पर्यावरण की निगरानी हो या फिर लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा मामला हो. लेकिन युद्ध ऐसी चीज है, जो जरूरतमंद लोगों तक विज्ञान के फायदों को पहुंचने से रोक देती है. वैज्ञानिक मामलों पर दुनिया की प्रख्यात हस्ती डॉ. स्किपर ने कहा कि खाड़ी और मध्य पूर्व की अस्थिरता से ऊर्जा बाजार, सप्लाई चेन और जलवायु संबंधी प्रतिबद्धताएं प्रभावित हो रही हैं. दुनिया आपस में इस तरह जुड़ी हुई है कि किसी भी कोने में होने वाला संघर्ष अगर लंबा चले तो उसका असर सिर्फ उसी इलाके तक नहीं रहता.
अमेरिका में शोध के प्रति नेगेटिविटी
डॉ. स्किपर ने राजनीतिक नेतृत्व खासकर अमेरिका में अनुसंधान के प्रति नकारात्मक रवैये पर भी खुलकर चर्चा की. डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का जिक्र करते हुए उन्होंने शोध के प्रति बढ़ती नेगेटिविटी पर गहरी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि फंड में कटौती और वैज्ञानिक एजेंसियों के ढांचे बदलने की कोशिशों से सिस्टम में सुधार के बजाय नुकसान हो रहा है. कई आदेशों को तो यूएस कांग्रेस में पलटा जा चुका है. लेकिन दीर्घकालीन नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती.
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर देश के लीडर ही लगातार साइंस और टेक्नोलोजी की आलोचना करते रहेंगे तो 17-18 साल की युवा पीढ़ी वैज्ञानिक करियर चुनने से कतराने लगेगी. इससे भविष्य की साइंटिफिक पाइपलाइन सूख सकती है. उन्होंने जोर देकर कहा कि ये समस्या सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है, जिस तरह से विशेषज्ञता को लेकर नकारात्मकता बढ़ रही है और आवाजाही प्रभावित हो रही है, उससे विज्ञान भी बच नहीं सकता.
युद्ध से बौद्धिक, पीढ़ीगत नुकसान
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध खत्म होने की संभावना पर डॉ. स्किपर ने कहा कि ये काम जितनी जल्दी पूरा हो, उतना अच्छा है. उन्होंने इसका मानवीय पहलू बताते हुए कहा कि विज्ञान युद्ध में पक्ष चुनने के बजाय संवाद के रास्ते खोलने, साझा तथ्यों को सुरक्षित रखने और नतीजों का ईमानदारी से दस्तावेजीकरण करने में मदद कर सकता है. उनका कहना था कि जब राजनीति साक्ष्यों के खिलाफ हो जाती है और युद्ध सीमाओं को बंद कर देता है, तो इसका नुकसान केवल रणनीतिक नहीं बल्कि बौद्धिक और पीढ़ीगत होता है.














