ईरान की ताकत समझने में हो गई अमेरिका से भूल? सुपरपावर को कैसे दे रहा 6 हफ्तों से चुनौती

ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने जब हमला किया तो किसी को अंदाजा नहीं था कि ईरान इतनी मजबूती के साथ दोनों देशों का सामना कर पाएगा. माना जा रहा था कि युद्ध कुछ दिनों में समाप्त हो जाएगा, लेकिन 6 हफ्ते बाद भी ईरान अमेरिका-इजरायल से लड़ रहा है.

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ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई के बारे में किसी को पता नहीं है, लेकिन ईरान मजबूती से युद्ध लड़ रहा है.
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  • अमेरिका-इजरायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों व सैन्य क्षमताओं को नुकसान पहुंचाया, पर पूरी ताकत समाप्त नहीं हुई है
  • ईरान ने पुराने अमेरिकी और सोवियत हथियारों की रिवर्स इंजीनियरिंग कर सैन्य आत्मनिर्भरता हासिल की
  • ईरान ने साइबर युद्ध को महत्वपूर्ण रणनीति बनाया है और पश्चिमी देशों के नेटवर्क पर हमलों के आरोप लगे हैं
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पिछले छह सप्ताह से अमेरिका और इजरायल के हमलों ने ईरान के परमाणु ठिकानों को नुकसान पहुंचाया है और उसकी सैन्य क्षमता को कमजोर किया है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान की पूरी ताकत को केवल इन हमलों से पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा सकता. सैन्य इतिहास और सिद्धांत के एक विशेषज्ञ की मानें तो ईरान की आधुनिक सैन्य संरचना, उसकी तकनीकी क्षमताओं और अंतरराष्ट्रीय सैन्य गतिविधियों को समझना यह अनुमान लगाने के लिए जरूरी है कि युद्ध में अब आगे क्या हो सकता है.

अमेरिकी और रूसी हथियारों की रिवर्स इंजीनियरिंग

  1. 1979 से पहले ईरान की सेना पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका, पर काफी हद तक निर्भर थी. ईरान ने 1980 में जब ईरान-इराक युद्ध में हस्तक्षेप किया, तब उसके पास उस समय के आधुनिक हथियारों का बड़ा भंडार था, जिसमें लगभग 80 एफ-14 लड़ाकू विमान, 200 से अधिक एफ-4 और एफ-5 विमान तथा हजारों टैंक शामिल थे, लेकिन 1988 में युद्ध समाप्त होने तक ईरान की सेना कमजोर हो चुकी थी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण उसे हथियारों की आपूर्ति लगभग बंद हो गई थी.
  2. ईरान वैश्विक स्तर पर लगभग अलग-थलग पड़ गया. 1990 के दशक में उसने कुछ हथियार सोवियत संघ और चीन से आयात किए, लेकिन आर्थिक सीमाओं के कारण बड़े पैमाने पर सैन्य खर्च संभव नहीं था. इन प्रतिबंधों ने ईरान को आत्मनिर्भर बनने के लिए मजबूर किया और उसने पुराने अमेरिकी तथा सोवियत हथियारों की रिवर्स इंजीनियरिंग शुरू की. ये अधिकतर हथियार पुराने और सीमित क्षमता वाले थे, लेकिन घरेलू उत्पादन ने उसकी सैन्य क्षमता बनाए रखने में मदद की.
  3. 1990 के बाद ईरान ने मिसाइल तकनीक में उल्लेखनीय प्रगति की, जिसमें घरेलू उत्पादन के साथ-साथ उत्तर कोरिया जैसे देशों से तकनीकी सहयोग भी शामिल माना जाता है. इसी अवधि में ईरान ने “वन-वे अटैक ड्रोन” विकसित करना शुरू किया, जो अपेक्षाकृत सस्ते और दूर तक हमला करने में सक्षम हथियार हैं.

ईरान का सैन्य ढांचा

  • ईरान की सैन्य संरचना के दो प्रमुख हिस्से हैं— नियमित सेना (आर्तेश) और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी). आर्तेश मुख्य रूप से देश की पारंपरिक रक्षा और सीमित घरेलू सुरक्षा की भूमिका निभाती है. इसके विपरीत, आईआरजीसी अधिक शक्तिशाली और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली सैन्य इकाई है, जिसे क्षेत्रीय स्तर पर शक्ति दिखाने का काम सौंपा गया है. ईरान के सैन्य संसाधनों का बड़ा हिस्सा और उन्नत उपकरण इसी को प्राप्त होते हैं.
  • आईआरजीसी के भीतर ‘कुद्स फोर्स' एक विशेष इकाई है, जिसका कार्य विदेशी अभियानों और प्रभाव विस्तार से जुड़ा है. यह बल मध्य पूर्व के विभिन्न देशों में ईरान समर्थित समूहों को सहायता और प्रशिक्षण देता रहा है.
  • ईरान लंबे समय से लेबनान स्थित हिज्बुल्लाह का प्रमुख समर्थक रहा है. हिज्बुल्लाह के जरिए ईरान इजरायल को टारगेट करता है. हाल के वर्षों में ईरान ने गाजा पर शासन करने वाले और इजरायल पर हमला करने वाले हमास को भी समर्थन दिया है. हमास सुन्नी संगठन है, जबकि ईरान शिया बहुल देश है. ईरान का उद्देश्य क्षेत्रीय स्तर पर सैन्य और राजनीतिक प्रभाव बनाए रखना रहा है, जबकि वह सीधे बड़े युद्ध में उलझने से बचता है.

साइबर युद्ध और अप्रत्यक्ष रणनीति

  1. ईरान ने सैन्य क्षेत्र के साथ-साथ साइबर युद्ध को भी एक महत्वपूर्ण रणनीतिक हथियार के रूप में विकसित किया है. ईरानी हैकरों पर पश्चिमी देशों की सैन्य और सरकारी प्रणालियों पर हमले करने के आरोप लगते रहे हैं.
  2. इनमें अमेरिकी सरकारी नेटवर्क और बुनियादी ढांचे पर हमले के दावे शामिल हैं, हालांकि कई घटनाओं के विस्तृत विवरण और आधिकारिक पुष्टि सीमित रही है.
  3. विशेषज्ञों के अनुसार, साइबर हमले ईरान को कम लागत में अधिक प्रभाव डालने का विकल्प प्रदान करते हैं, जिससे वह सीधे सैन्य टकराव के बिना भी वैश्विक स्तर पर प्रभाव डाल सकता है.

ईरान का परमाणु कार्यक्रम

  • ईरान का परमाणु कार्यक्रम 1980 के दशक से अंतरराष्ट्रीय विवाद का विषय रहा है. ईरानी सरकार हमेशा यह दावा करती रही है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण ऊर्जा उत्पादन के लिए है, लेकिन पश्चिमी देशों ने यूरेनियम संवर्धन की गतिविधियों को लेकर चिंता जताई है.
  • अत्यंत जटिल साइबर हमले ‘स्टक्सनेट' ने 2010 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को बड़ा झटका दिया था, जिससे उसके संवर्धन सेंट्रीफ्यूजों के कामकाज में बाधा उत्पन्न हुई. इस हमले की जिम्मेदारी किसी देश ने औपचारिक रूप से नहीं ली, लेकिन इसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को वर्षों पीछे धकेलने वाला माना जाता है.
  • ईरान और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों तथा जर्मनी के बीच 2015 में हुए समझौते के तहत ईरान ने अपने संवर्धन कार्यक्रम को सीमित करने पर सहमति दी थी, जिसके बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में राहत दी गई. 2018 में अमेरिका इस समझौते से अलग हो गया, जिसके बाद यह व्यवस्था कमजोर पड़ गई. इसके बावजूद कुछ समय तक यह समझौता आंशिक रूप से प्रभावी रहा, लेकिन 2020 के बाद ईरान ने फिर से अपने परमाणु कार्यक्रम और बैलिस्टिक मिसाइल तथा ड्रोन उत्पादन को तेज कर दिया.

ईरान की अब कितनी ताकत 

अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए, जिसे अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के परमाणु ढांचे को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाने वाला बताया. इसके जवाब में ईरान ने इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन की बौछार की, जिनमें से अधिकतर को इजरायल के डिफेंस सिस्टम ने रोक दिया. संघर्ष के शुरुआती छह हफ्तों में ईरान ने कम से कम 650 मिसाइलें दागीं और क्षेत्रीय लक्ष्यों पर भी कई हमले किए गए हैं.

अमेरिका ने ईरान की मिसाइल उत्पादन और भंडारण सुविधाओं को निशाना बनाने पर विशेष ध्यान दिया है. हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि ईरान के पास अभी कितना हथियार भंडार बचा है.

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ईरान ने अपने कुछ लंबी दूरी के हथियारों को सुरक्षित रखा है, जबकि अमेरिकी रक्षा अधिकारियों का दावा है कि उसकी बड़े पैमाने पर हमले करने की क्षमता काफी कमजोर हो चुकी है.

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यह भी माना जा रहा है कि ईरान की उत्पादन क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंचा है, लेकिन उसकी मौजूदा सैन्य संरचना, ड्रोन तकनीक, मिसाइल कार्यक्रम और प्रॉक्सी नेटवर्क उसे अभी भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय शक्ति बनाए हुए हैं. साथ ही होर्मुज पर उसकी पकड़ और खाड़ी देशों में अमेरिकी हितों के कारण वो लगातार दबाव बनाए रखेगा.

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