होर्मुज संकट का ‘परमानेंट इलाज’? नेतन्याहू का पाइपलाइन फॉर्मूला क्या बदल देगा गेम

इजरायली पीएम नेतन्याहू ने सुझाव दिया है कि खाड़ी देशों का तेल और गैस अब होर्मुज से होकर न जाए, बल्कि पाइपलाइन के जरिए सऊदी से होते हुए Red Sea और फिर Mediterranean Sea तक पहुंचाया जाए. इसका सीधा मतलब है कि ईरान के ‘चोक पॉइंट’ को पूरी तरह बायपास किया जाए.

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  • बेंजामिन नेतन्याहू ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर तेल सप्लाई की निर्भरता कम करने के लिए नया सुझाव दिया है.
  • उन्होंने खाड़ी देशों के तेल को पाइपलाइन से सऊदी होते हुए रेड सी और मेडिटरेनियन तक पहुंचाने का प्रस्ताव रखा है.
  • इस योजना का मुख्य उद्देश्य ईरान के होर्मुज जलसंधि पर प्रभाव और वैश्विक तेल सप्लाई पर उसके दबाव को कम करना है.
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नई दिल्ली:

मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध और ऊर्जा संकट के बीच बेंजामिन नेतन्याहू ने एक बड़ा सुझाव दिया है. ऐसा सुझाव जो सिर्फ मौजूदा संकट नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की ग्लोबल एनर्जी पॉलिटिक्स को बदल सकता है. उनका कहना है कि दुनिया को अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भरता कम करनी होगी और तेल-गैस के रास्ते बदलने होंगे.

दरअसल Strait of Hormuz वह समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया का करीब 20% कच्चा तेल गुजरता है. एक तरफ ईरान और दूसरी तरफ सऊदी अरब, UAE और ओमान जैसे देश हैं. इसकी भौगोलिक स्थिति इसे बेहद संवेदनशील बनाती है. जरा सा तनाव और पूरी दुनिया की तेल सप्लाई पर असर पड़ जाता है. यही वजह है कि हर युद्ध या टकराव के दौरान तेल की कीमतें अचानक उछल जाती हैं.

नेतन्याहू का प्रस्ताव: समुद्र छोड़ जमीन का रास्ता

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का मानना है कि इस समस्या का स्थायी समाधान समुद्री रास्ते पर निर्भरता खत्म करना है. उन्होंने सुझाव दिया है कि खाड़ी देशों का तेल और गैस अब होर्मुज से होकर न जाए, बल्कि पाइपलाइन के जरिए सऊदी अरब से होते हुए Red Sea और फिर Mediterranean Sea तक पहुंचाया जाए. इसका सीधा मतलब है. ईरान के ‘चोक पॉइंट' को पूरी तरह बायपास करना.

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असली रणनीति: ईरान की पकड़ कमजोर करना

इस प्रस्ताव के पीछे सबसे बड़ी रणनीतिक सोच ईरान के प्रभाव को कम करना है. होर्मुज पर उसकी भौगोलिक पकड़ उसे यह ताकत देती है कि वह वैश्विक तेल सप्लाई को प्रभावित कर सके. अगर पाइपलाइन के जरिए वैकल्पिक रास्ता तैयार हो जाता है, तो यह दबाव काफी हद तक खत्म हो जाएगा. यानी यह सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि पावर बैलेंस बदलने की कोशिश है.

आसान नहीं है रास्ता: राजनीति से लेकर सुरक्षा तक चुनौती

हालांकि यह प्लान जितना आकर्षक लगता है, उतना ही जटिल भी है. सबसे बड़ी चुनौती सऊदी अरब की सहमति है, क्योंकि पूरा रूट उसी की जमीन से होकर जाएगा. इसके अलावा अरब देशों और इजरायल के बीच रिश्तों की जटिलता भी बड़ा फैक्टर है. हजारों किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बनाने में अरबों डॉलर का खर्च आएगा और जमीन पर होने की वजह से यह सुरक्षा के लिहाज से भी संवेदनशील रहेगी. आतंकी हमले या युद्ध में इसे निशाना बनाया जा सकता है.

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ईरान की जवाबी चाल: होर्मुज को ‘हथियार' बनाना

दूसरी ओर ईरान होर्मुज पर अपनी पकड़ और मजबूत करने में लगा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक वह जहाजों पर टोल लगाने, अमेरिकी और इजरायली जहाजों की आवाजाही पर रोक लगाने और प्रतिबंध लगाने वाले देशों के जहाजों को सीमित करने जैसे कदम उठा रहा है. इससे साफ है कि ईरान इस जलमार्ग को सिर्फ व्यापारिक रास्ता नहीं, बल्कि एक रणनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना चाहता है.

अगर प्लान लागू हुआ तो क्या बदलेगा?

अगर नेतन्याहू का यह प्लान जमीन पर उतरता है, तो दुनिया का एनर्जी मैप बदल सकता है. समुद्री रास्तों की जगह पाइपलाइन नेटवर्क ज्यादा अहम हो जाएगा, तेल की कीमतों में अस्थिरता कम हो सकती है और मिडिल ईस्ट में पावर बैलेंस भी बदल सकता है. इससे सऊदी अरब की भूमिका और मजबूत होगी, जबकि ईरान का प्रभाव कम हो सकता है.

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भूगोल बदलने की कोशिश

होर्मुज संकट सिर्फ युद्ध या तनाव का मुद्दा नहीं, बल्कि भूगोल की देन है. नेतन्याहू का प्रस्ताव इसी भूगोल को बदलने की कोशिश है, ताकि दुनिया एक ऐसे रास्ते पर निर्भर न रहे, जिसे कभी भी बंद किया जा सकता है. हालांकि यह विचार लंबी दौड़ का है और इसमें कई राजनीतिक व रणनीतिक बाधाएं हैं, लेकिन अगर यह सफल होता है, तो यह 21वीं सदी की सबसे बड़ी एनर्जी शिफ्ट साबित हो सकता है.

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