कैलाश मानसरोवर यात्रा: बौद्ध डिप्लोमेसी के बाद अब शिव डिप्लोमेसी, चीन का नया प्लान क्या?

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  • प्रकाशित: जुलाई 14, 2026

हिंदू आस्था में कैलाश पर्वत शिव का स्वरूप और मानसरोवर मोक्ष का प्रतीक है. इसकी परिक्रमा को कई जन्मों का पुण्य माना जाता है. दशकों बाद 2025 में यात्रा फिर शुरू हुई और चीन ने इस साल 24,000 भारतीय तीर्थयात्रियों को अनुमति दी है. लेकिन नास्तिक चीन अब इसी यात्रा को डिप्लोमेसी का हथियार बना रहा है. गलवान, डोकलाम और सीमा तनाव के बाद चीन की प्रवक्ता ने "यात्रा दिलों को करीब लाए" कहकर पोस्ट की. सवाल ये है कि क्या चीन बदल गया या उसकी कूटनीति? असल में कैलाश तिब्बत के नगारी क्षेत्र में है, जिस पर चीन का नियंत्रण है. भारत से 3 रास्ते हैं - उत्तराखंड, नेपाल, सिक्किम. एक भारतीय तीर्थयात्री औसतन ₹1.70 लाख खर्च करता है, जो चीनी पर्यटक से 3.7 गुना ज्यादा है. इससे नगारी की आय 300% तक बढ़ी है. चीन ने पहले बौद्ध डिप्लोमेसी के तहत नेपाल के लुंबिनी में ₹19,000 करोड़ लगाए. अब "शिव डिप्लोमेसी" से वो हिंदू आस्था को सॉफ्ट पावर टूल बना रहा है. भारत के लिए ये आस्था है, चीन के लिए जियो-पॉलिटिकल प्रॉपर्टी. क्या इससे सीमा विवाद या अविश्वास खत्म होगा? इतिहास कहता है - भारत-चीन के रिश्ते हमेशा व्यापार + विवाद के दो ट्रैक पर चलते हैं. सहयोग भी, सतर्कता भी.

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