(सौजन्य: सोमनाथ ट्रस्ट, गुजरात सरकार)
भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर, गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में भगवान सोमनाथ प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं. यह पावन भूमि, जिसे प्रभास क्षेत्र के नाम से जाना जाता है, केवल एक तीर्थ स्थल नहीं बल्कि भारत की अटूट श्रद्धा, संघर्ष और पुनरुत्थान का जीवंत प्रतीक है.
प्रभास क्षेत्र: ऋषियों और देवताओं की साधना स्थली
'प्रभास' का अर्थ है तेजोमय प्रकाशमान. प्राचीन काल से ही यह क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र रहा है.
ऋषियों की भूमि: यहां भगवान परशुराम से लेकर महर्षि कणाद जैसे महान ऋषियों ने तपस्या की है.
भास्कर क्षेत्र: प्राचीन काल में यहाँ 12 सूर्य मंदिर हुआ करते थे, जिसके कारण इसे 'भास्कर क्षेत्र' भी कहा जाता है.
श्रीकृष्ण की अंतिम लीला: पुराणों के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अंतिम लीलाएं इसी प्रभास क्षेत्र में पूर्ण की थीं.
युगों-युगों का इतिहास: निर्माण और विध्वंस
मान्यता है कि सोमनाथ मंदिर का निर्माण अलग-अलग युगों में अलग-अलग धातुओं और सामग्रियों से हुआ.
सतयुग: सोमराज (चंद्रदेव) द्वारा सुवर्ण (सोना) से.
त्रेतायुग: रावण द्वारा रजत (चांदी) से.
द्वापर युग: भगवान श्री कृष्ण द्वारा चंदन की लकड़ी से.
मध्यकाल में इस मंदिर ने कई आक्रमण झेले. 11वीं शताब्दी में महमूद गजनी से लेकर अलाउद्दीन खिलजी और औरंगजेब तक, कई आक्रांताओं ने इसे लूटा और नष्ट किया. लेकिन हर बार राजा भीमदेव, सिद्धराज जयसिंह और कुमारपाल जैसे नायकों ने इसका पुनर्निर्माण कराया. अपनी आस्था की रक्षा के लिए हमीर जी गोहिल और वेगड़ा भील जैसे वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी.
आधुनिक भारत का संकल्प: सरदार पटेल की भूमिका
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ. जूनागढ़ की आजादी के बाद, लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल 13 नवंबर 1947 को प्रभास पाटन पहुंचे. मंदिर के खंडहरों को देखकर उन्होंने समुद्र का जल हाथ में लेकर संकल्प किया. "हम श्री सोमनाथ मंदिर का पुनः निर्माण करेंगे."
कन्हैयालाल मुंशी के ऐतिहासिक ज्ञान और सरदार पटेल के दृढ़ संकल्प से आधुनिक सोमनाथ मंदिर का स्वप्न साकार हुआ. 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की. आधुनिक मंदिर की वास्तुकला (कैलाश महामेरू प्रसाद) वर्तमान सोमनाथ मंदिर नागर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसे प्रसिद्ध वास्तुकार प्रभाशंकर सोमपुरा ने डिजाइन किया है.
मुख्य आकर्षण और पूजा का समय
आरती: प्रतिदिन सुबह 7:00 बजे, दोपहर 12:00 बजे और शाम 7:00 बजे.
अन्य मंदिर: परिसर में माता पार्वती, कपर्दी विनायक, कष्टभंजन हनुमान और द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन भी उपलब्ध हैं.
संग्रहालय: खुदाई में मिले प्राचीन अवशेषों को प्रभास पाटन म्यूजियम में सहेज कर रखा गया है.
श्री सोमनाथ महादेव का मंदिर भारत के 'स्वर्ण युग' की वापसी का प्रतीक है. आज यह मंदिर आधुनिक तकनीक और प्राचीन परंपराओं का अनूठा संगम है. यहां की दिव्य आरती और समुद्र की लहरों का नाद भक्तों को असीम शांति प्रदान करता है.