श्मशान घाट में खामोश खड़ा एक पिता, 13 साल की लड़ाई के बाद बेटे को पीड़ा से मुक्ति मिली. आंखों के आंसू कब के सूख चुके थे, बस सीने में उठता सैलाब रह गया. 13 साल तक बेटे की सेवा में दिन‑रात एक कर देने वाले पिता अशोक राणा आज श्मशान घाट पर खामोशी के साथ खड़े हैं. सामने उनके जिगर का टुकड़ा, बेटा हरीश, अपनी आखिरी यात्रा पर निकल चुका है. मानसिक पीड़ा से लेकर हर वो तकलीफ, जिसने एक बुजुर्ग पिता को भीतर तक झकझोर दिया था, आज किसी अंतिम बिंदु पर आकर रुक गई है.
श्मशान घाट पर अशोक राणा की पथराई आंखें बेटे के पार्थिव शरीर को निहार रही हैं. चेहरे पर गहरा दुख है, लेकिन आंखों में आंसू नहीं. शायद वो आंसू 13 साल पहले ही सूख गए थे, जब उन्होंने बेटे को हर दिन तड़पते देखा था. दिल में उमड़ती पीड़ा शब्दों में नहीं ढल पा रही, लेकिन एक पिता का दिल आज भी जार‑जार रो रहा है.
करीबी दे रहे ढाढ़स, पर नजरें शून्य में टिकीं
पास खड़े करीबी लोग अशोक राणा को ढाढ़स बंधाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनकी नजरें कहीं और नहीं जातीं. जिस बेटे की मुक्ति के लिए उन्होंने बीते 13 साल अदालतों के चक्कर काटे, वो अब चैन की नींद सो चुका है. बेटे की पीड़ा खत्म होने का सुकून और उसे खो देने का दर्द- दोनों एक साथ उनके चेहरे पर साफ झलक रहे हैं.
एक पिता के लिए आंखों के सामने बेटे का शव पड़े होने से बड़ा दुख कुछ नहीं होता. लेकिन अशोक राणा ने अपने बेटे को असहनीय दर्द से आज़ाद कराने के लिए यह दुख खुद चुना. जब पीड़ा इंसान की सहनशक्ति से बाहर हो जाए, तो उससे मुक्ति ही एकमात्र रास्ता बन जाती है.
कांपते हाथों से मिला न्याय
हरीश के पिता ने बेटे के लिए सुप्रीम कोर्ट से इसी मुक्ति की मांग की थी. शीर्ष अदालत ने भी इस बेटे को दर्द से मुक्ति देने का आदेश दिया, लेकिन यह फैसला देते वक्त न्याय के हाथ भी कांप रहे थे. आज श्मशान घाट पर खड़ा यह पिता उस फैसले की कीमत अपने दिल से चुका रहा है.