"एक बार फिर वही लापरवाही, एक बार फिर वैसा ही भयानक हादसा और एक बार फिर कागजी कार्रवाई. लेकिन आखिरकार कब तक? हमारा सिस्टम एक हादसे के बाद दूसरे हादसे का इंतजार क्यों करता है?"
"किसी के घर का इकलौता चिराग बुझ गया तो किसी बूढ़े और बीमार पिता का एकमात्र सहारा हमेशा के लिए छिन गया. लखनऊ का यह अग्निकांड सिर्फ 15 मौतों का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह 15 हंसते-खेलते परिवारों के तबाह होने की बेहद दर्दनाक दास्तान है." इस वीडियो में देखिए उन बदनसीब दोस्तों और परिजनों की आपबीती, जिन्होंने इस अग्निकांड में अपने सबसे अजीज लोगों को खो दिया. मिलिए अब्दुल रहमान के दोस्त शेख से, जो रोते हुए बताते हैं कि कैसे हादसे की खबर मिलने के बाद वे पागलों की तरह अब्दुल को फोन मिला रहे थे. फोन की घंटी बज रही थी, व्हाट्सएप पर डबल टिक भी हो रहा था, लेकिन अब्दुल उस फोन को उठाने के लिए अब इस दुनिया में नहीं बचा था.
अब्दुल रहमान अपने परिवार का इकलौता बेटा था. उसके पिता लकवा (Paralysis) के शिकार हैं और मां बूढ़ी गृहणी हैं. दो बहनों की शादी के बाद पूरे घर की जिम्मेदारी अब्दुल के ही कंधों पर थी. महज 10 महीने पहले ही उसे एक आईटी टेक्नीशियन के रूप में यह नौकरी मिली थी. वह अपनी इस नौकरी से बेहद खुश था क्योंकि अब वह अपने बीमार माता-पिता को एक बेहतर जिंदगी दे पा रहा था. लेकिन इस प्रशासनिक लापरवाही ने उसकी जिंदगी की उड़ान को शुरू होने से पहले ही खत्म कर दिया.
इसी हादसे में एनिमेशन सीख रहे आदित्य श्रीवास्तव की भी मौत हो गई. जब आदित्य की मां को इस हादसे की खबर मिली, तो वे बदहवास हालत में मौके पर पहुंचीं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.
आखिर इन बेगुनाह बच्चों की मौत का हिसाब कौन देगा? क्या चंद रुपयों के लालच में आवासीय बिल्डिंग को कमर्शियल बनाने वालों को कभी कड़ी सजा मिल पाएगी? रोते हुए दोस्तों और बिलखती माताओं के इन आंसुओं का जवाब हमारे सिस्टम के पास क्या है? देखिए NDTV की यह दिल दहला देने वाली ग्राउंड रिपोर्ट.