“आपका अपना लेबनान है और मेरा अपना लेबनान है.”
खलील जिब्रान के इन शब्दों में आज का लेबनान झलकता है.
NDTV के रिपोर्टर नजीर मसूदी पहुंचे खलील जिब्रान के गांव बशरी में. वही जगह जहाँ महान कवि, दार्शनिक और कलाकार खलील जिब्रान जन्मे, और जहाँ उनका फाइनल रेस्टिंग प्लेस यानी मकबरा मौजूद है. यही बशरी आज भी बर्फ़ से ढके पहाड़ों के बीच खामोशी से खड़ा है, उस जंग से लगभग अछूता जो बाकी लेबनान को झकझोर रही है.
यहां खलील जिब्रान का म्यूज़ियम है, उनकी क़ब्र है, और उसी परिसर में भारत के महान कवि रविंद्रनाथ टैगोर की प्रतिमा भी. लेबनान की कल्चरल मिनिस्ट्री ने इन दो साहित्यिक महान हस्तियों की दोस्ती और आपसी सम्मान के प्रतीक के रूप में सितंबर में इस स्टैच्यू का अनावरण किया था. दोनों एक-दूसरे को अमेरिका में जानते थे, और विचारों की यह दोस्ती आज भी यहां ज़िंदा है.
खलील जिब्रान ने अपनी ज़िंदगी अमेरिका में बिताई, लेकिन मरने से पहले उन्होंने वसीयत की कि उन्हें उनके अपने गाँव बशरी में ही दफनाया जाए. उन्होंने यह भी लिखा कि उनकी किताबों, कविताओं और पेंटिंग्स से मिलने वाली रॉयल्टी उनके परिवार को नहीं, बल्कि बशरी गाँव को दी जाए.
आज हर साल लगभग ₹3,00,000 की रॉयल्टी गांव की शिक्षा, अस्पताल और बच्चों की स्कॉलरशिप में खर्च होती है. विश्व युद्ध प्रथम के दौरान लेबनान में अकाल, भूख और मौत को देखकर जिब्रान ने कविता लिखी थी
“Dead are my people.”
जो पंक्तियाँ उन्होंने एक सदी पहले लिखीं, वही आज के लेबनान की सच्चाई बनकर सामने खड़ी हैं.
बशरी के शांत पहाड़ों के बीच से लगता है जैसे खलील जिब्रान आज भी लेबनान को देख रहे हों. उनके शब्द, उनके जज़्बात और उनकी चेतावनी आज भी उतनी ही सच हैं.