“जब तक कंपनी नोटिस बोर्ड पर सैलरी बढ़ने का लिखित ऐलान नहीं करेगी, तब तक हम काम पर नहीं जाएंगे.” यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि सैकड़ों मजदूर परिवारों की मजबूरी है. नोएडा में सैलरी को लेकर मजदूरों के आंदोलन, हिंसा पर फैक्ट्रियों कर्मियों ने NDTV से अपना दर्द साझा किया. महिला कर्मियों ने बताया- सरकार ने न्यूनतम मजदूरी बढ़ाकर ₹16,890 तय की है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई कंपनियां अब भी पुरानी सैलरी दे रही हैं.
मजदूरों का कहना है कि न तो बढ़ी हुई सैलरी मिल रही है और न ही कोई लिखित नोटिस दिया जा रहा है. जब तक कंपनी नोटिस बोर्ड पर साफ‑साफ नहीं लिखती कि अगली सैलरी बढ़ी हुई मिलेगी, तब तक वे काम पर नहीं लौटेंगे.
मजदूर बताते हैं कि कुछ जगहों पर सैलरी बढ़ी होने की बातें सुनी जा रही हैं, लेकिन कंपनियां इसकी पुष्टि लिखित रूप में नहीं कर रहीं.
सरकार अपना काम कर रही है, लेकिन नीचे बैठे लोग, ठेकेदार और फैक्ट्री मैनेजमेंट, मजदूरों को उनका पूरा हक नहीं दे रहे. ओवरटाइम के घंटे काट लिए जाते हैं. पांच मिनट लेट होने पर हाफ डे काट लिया जाता है, लेकिन चार‑पांच घंटे के ओवरटाइम का पैसा नहीं दिया जाता.
पराए शहर में, छोटे से कमरे में रहने वाले ये मजदूर ₹4,000 से ₹5,000 किराया दे रहे हैं. बिना सैलरी के घर चलाना नामुमकिन हो गया है. किराया समय पर न देने पर मकान मालिक का दबाव, पानी की दिक्कतें, रोज़मर्रा की परेशानियां और ऊपर से काम बंद. महिलाएं बताती हैं कि उनके पति तीन‑तीन दिन से फैक्ट्री जा रहे हैं, लेकिन गेट नहीं खोला जा रहा. फोन बंद कर दिए गए हैं. फैक्ट्री कहती है कि पुरानी सैलरी पर काम करो या फिर मत आओ. विरोध और हड़ताल के बाद पुलिस और प्रशासन ने भी मजदूरों को वापस भेज दिया.
काम बंद होने का सीधा असर बच्चों पर पड़ रहा है. कई मजदूर परिवार अपने बच्चों की स्कूल फीस नहीं भर पा रहे. फीस न भरने की वजह से बच्चों को स्कूल से वापस भेज दिया गया है. किसी का बच्चा चौथी क्लास में है, किसी को प्राइमरी स्कूल में डालना पड़ा, क्योंकि फीस का बोझ अब उठाया नहीं जा रहा.
मजदूर कहते हैं कि जितनी छुट्टी उतनी कटौती तय है. घर बैठे कोई आमदनी नहीं, लेकिन बिजली का बिल, पानी का किराया, स्कूल फीस और खाना—सब चल रहा है. मजबूरी ऐसी है कि अगर जल्द समाधान नहीं हुआ तो कई लोग गांव लौटने की बात कर रहे हैं.
मजदूरों की सरकार से बस एक ही गुज़ारिश है—जो न्यूनतम मजदूरी तय की गई है, उसे ज़मीन पर लागू कराया जाए. कंपनियों को नोटिस बोर्ड पर लिखकर साफ बताना चाहिए कि कब और कितनी सैलरी मिलेगी. मजदूर कोई दान नहीं, बस अपनी मेहनत की पूरी कीमत चाहते हैं.
एनडीटीवी इंडिया के लिए, सत्यम बघेल की रिपोर्ट.