Exclusive: 3 दिन पाकिस्तान में रहा मुर्शिदाबाद, दादा ने भारत में मिलाया, SIR में नाम कटने पर छलका नवाब फैमिली का दर्द

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  • प्रकाशित: अप्रैल 17, 2026

मुर्शिदाबाद के नवाब परिवार की 300 साल पुरानी कहानी और आज के भारत में वोटर होने की लड़ाई. इस वीडियो में हम आपको मिलवाते हैं मुर्शिदाबाद के नवाब साहब सैयद मोहम्मद रज़ा अली मिर्ज़ा से, जिन्हें लोग छोटे नवाब के नाम से जानते हैं. यह वही खानदान है जिसने सदियों तक मुर्शिदाबाद पर हुकूमत की, जिसने 1947 के बंटवारे के समय भी इस धरती को नहीं छोड़ा और आज भी खुद को गर्व से हिंदुस्तानी कहता है.

नवाब साहब के परिवार का इतिहास इसी कमरे की दीवारों में सांस लेता है. उनके दादा सर सैयद वासिफ अली मिर्ज़ा को बंटवारे के वक्त पाकिस्तान जाने का प्रस्ताव मिला था, ऊँचा ओहदा, शोहरत और सुविधाएँ देने का लालच दिया गया. लेकिन उन्होंने साफ कहा था कि जहाँ उनके बाप‑दादा दफन हैं, वही उनका मुल्क है. तीन दिनों तक मुर्शिदाबाद पाकिस्तान के तौर पर रहा, लेकिन उनके हस्तक्षेप के बाद यह शहर भारत का हिस्सा बना रहा.

इतिहास की इतनी गहरी जड़ें होने के बावजूद आज यही परिवार अपनी नागरिकता और वोट के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा है. नवाब साहब के परिवार के करीब 120 लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए हैं. पूरे वार्ड में लगभग 386 वोट कटे हैं. खुद नवाब साहब, उनके बेटे, बहू, रिश्तेदार और यहां तक कि वार्ड के काउंसलर फहीम मिर्ज़ा भी इस बार वोट नहीं डाल पाएंगे.

नवाब साहब बताते हैं कि उन्होंने चुनाव आयोग द्वारा मांगे गए सभी दस्तावेज़ जमा किए. आधार सहित 13 ज़रूरी कागज़ात, पिता की 1976 की मार्कशीट, सर्विस बुक, सुनवाई में दो बार पेशी. इसके बावजूद नाम काट दिया गया. सवाल यह है कि क्या इन दस्तावेज़ों का वेरिफिकेशन नहीं हुआ, या सिस्टम ने एक 300 साल पुराने हिंदुस्तानी परिवार को ही संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया.

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि नवाब साहब इंदिरा गांधी के समय से लगातार वोट डालते आए हैं. कांग्रेस से लेकर मौजूदा सरकार तक, हर चुनाव में उन्होंने मतदान किया. आज वही नवाब साहब और उनके परिवार को वोट देने का अधिकार नहीं है.

नवाब साहब साफ कहते हैं कि वे न बांग्लादेशी हैं, न रोहिंग्या. उनका परिवार 300 सालों से यहीं है. हिंदू‑मुस्लिम एकता की मिसाल उनके घर में आज भी ज़िंदा है. वे मोहर्रम, ईद, बकरीद के साथ पूजा, कीर्तन, मंदिर और धाम में बराबरी से शामिल होते हैं. यहाँ कोई भेद नहीं है, कोई नफरत नहीं है.

अब परिवार ने ट्रिब्यूनल का रुख किया है, लेकिन इस चुनाव में वोट डालने की उम्मीद खत्म हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से भी कोई तत्काल राहत नहीं मिली. सबसे बड़ा दर्द यह है कि पोलिंग बूथ घर से कुछ मीटर की दूरी पर है, लेकिन एक जेनुइन मतदाता होते हुए भी वे वोट नहीं डाल पाएंगे.

यह वीडियो सिर्फ नवाब परिवार की कहानी नहीं है. यह उन लाखों लोगों की कहानी है जिनके नाम वोटर लिस्ट से काटे गए हैं. यह सवाल उठाता है कि जब जेनुइन नागरिक चीख‑चीख कर अपनी पहचान साबित कर रहे हैं, तो उनकी आवाज़ क्यों नहीं सुनी जा रही.

एनडीटीवी इंडिया के लिए, मुर्शिदाबाद से मनोरंजन भारती की रिपोर्ट.
 

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