उत्तराखंड HC का कड़ा रुख: मोहम्मद दीपक पर 'गैग ऑर्डर' लागू, सोशल मीडिया पोस्ट और बयान देने पर रोक

Mohammad Deepak Petition: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कोटद्वार के मोहम्मद दीपक मामले में याचिका निस्तारित करते हुए पुलिस जांच में सहयोग के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सोशल मीडिया से दूर रहने की सलाह दी है.

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Kotdwar Dispute Case: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कोटद्वार के चर्चित 'नाम विवाद' मामले में सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता मोहम्मद दीपक को तगड़ा झटका दिया है. जस्टिस राकेश थपलियाल की सिंगल बेंच ने याचिकाकर्ता के खिलाफ एक तरह का 'गैग ऑर्डर' (Gag Order) जारी कर दिया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि याचिकाकर्ता अब इस मामले से जुड़ी किसी भी जानकारी या बयानबाजी को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा नहीं कर सकेगा. अदालत का मानना है कि इस संवेदनशील मामले में बाहरी हस्तक्षेप या सोशल मीडिया की चर्चाएं पुलिस की चल रही जांच को प्रभावित कर सकती हैं.

पुलिस के साथ सहयोग और सोशल मीडिया से दूरी

हाईकोर्ट ने याचिका को निस्तारित करते हुए याचिकाकर्ता को सख्त हिदायत दी है कि वह पुलिस की जांच प्रक्रिया में पूरा सहयोग करें. कोर्ट ने साफ किया है कि याचिकाकर्ता को अनावश्यक रूप से सार्वजनिक मंचों पर इस केस को लेकर सक्रिय नहीं होना चाहिए. दरअसल, सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि घटना के समय याचिकाकर्ता मौके पर मौजूद थे और भीड़ के साथ धक्का-मुक्की में शामिल थे. पुलिस अब तक इस मामले में 22 लोगों को चिन्हित कर चुकी है, जिनमें से 5 के खिलाफ जांच तेजी से आगे बढ़ रही है. दूसरी तरफ सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता मोहम्मद दीपक के वकील ने कोर्ट के सामने कहा कि उन्होंने तो घटना में शामिल लोगों के नाम बताए थे, लेकिन पुलिस ने उनके बताए नामों पर कोई एक्शन नहीं लिया.वकील का दावा है कि पुलिस ने उल्टा दीपक के खिलाफ ही मुकदमा दर्ज कर लिया, जबकि वह उस दिन मौके पर केवल भीड़ को शांत करने गए थे. 

क्या होता है 'गैग ऑर्डर' (Gag Order)? 

कानूनी भाषा में 'गैग ऑर्डर' एक बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द है. इसका सीधा सा मतलब होता है—'बोलने या जानकारी साझा करने पर पाबंदी'.
चुप रहने का कानूनी आदेश: जब कोर्ट को लगता है कि किसी मामले की संवेदनशीलता बहुत ज्यादा है या किसी व्यक्ति की बयानबाजी से समाज में तनाव फैल सकता है, तो वह 'गैग ऑर्डर' जारी करता है.
जांच पर असर: कई बार आरोपी या पीड़ित सोशल मीडिया पर अपनी बात रखकर जनता की सहानुभूति बटोरने या जांच को मोड़ने की कोशिश करते हैं. ऐसे में कोर्ट उन्हें आदेश देता है कि वे मामले के लंबित रहने तक सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं बोलेंगे.
उल्लंघन का नतीजा: अगर कोई व्यक्ति गैग ऑर्डर के बावजूद सोशल मीडिया पर पोस्ट करता है या बयान देता है, तो इसे 'कोर्ट की अवमानना' (Contempt of Court) माना जाता है और उसे जेल भी हो सकती है.

क्या था विवाद और क्यों पहुंची बात कोर्ट तक

यह पूरा मामला कोटद्वार में एक 30 साल पुरानी दुकान का नाम बदलने के दबाव से शुरू हुआ था. दीपक कुमार (मोहम्मद दीपक) का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने भीड़ के सामने अपनी पहचान उजागर की थी. इसके बाद 28 जनवरी को उनके खिलाफ मोबाइल छीनने और धमकी देने जैसी धाराओं में केस दर्ज हुआ. इसी मुकदमे को रद्द कराने और सुरक्षा की मांग लेकर दीपक हाईकोर्ट पहुंचे थे, लेकिन कोर्ट ने फिलहाल उन्हें कोई राहत देने के बजाय जांच में सहयोग करने और खामोश रहने का आदेश दे दिया है.
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