इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मऊ से जुड़े एक पादरी की याचिका पर आईपीसी की धारा 295A से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में याचिका को खारिज करते हुए तल्ख टिप्पणी की है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पादरी को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का यह दावा करना गलत है कि उसका ही धर्म सच्चा है क्योंकि ऐसा करना अन्य धर्मों का अपमान करने जैसा है.कोर्ट ने कहा कि ऐसे कृत्य IPC की धारा 295-A के तहत आते है जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जानबूझकर और गलत इरादे से किए गए कामों पर रोक लगाता है.कोर्ट ने आवेदक पादरी की बीएनएसएस की धारा 528 के तहत दाखिल अर्जी को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह आदेश आवेदक को कानून के हिसाब से मौजूद उपाय का फायदा उठाने से नहीं रोकेगा. यह आदेश जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की सिंगल बेंच ने रेवरेंड फादर विनीत विंसेंट परेरा उर्फ़ फ़ादर विनीत विंसेंट परेश की याचिका को खारिज करते हुए दिया है.
मामले के अनुसार आवेदक पादरी ने अपने खिलाफ चार सितंबर 2023 को मऊ के मुहम्मदाबाद थाने में दर्ज आईपीसी की धारा 295A के तहत एफआईआर के बाद मऊ कोर्ट द्वारा 19 फरवरी 2024 की चार्जशीट और 18 मई 2024 के संज्ञान आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. आवेदक पादरी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से याचिका के माध्यम से अपने खिलाफ दाखिल चार्जशीट, संज्ञान आदेश और मऊ कोर्ट में चल रही संपूर्ण कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी.
आवेदक के वकील ने आगे दलील दी कि आवेदक को कथित अपराध से जोड़ने के लिए उसके विरुद्ध शायद ही कोई साक्ष्य मौजूद है. आवेदक के वकील ने कहा कि निष्पक्ष जांच किए बिना संबंधित जांच अधिकारी ने आवेदक के विरुद्ध आरोप पत्र (chargesheet) प्रस्तुत कर दिया जिस पर संबंधित कोर्ट ने बिना अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग किए आरोप पत्र के आधार पर अपराध का संज्ञान ले लिया जो कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है. और इसलिए इसे रद्द किया जाना चाहिए. वहीं राज्य सरकार ने आवेदक पादरी की याचिका का विरोध करते हुए यह तर्क दिया कि आवेदक की ओर से जो दलीलें उठाई जा रही है वे तथ्यों के विवादित प्रश्नों से संबंधित है और उनमें साक्ष्यों के मूल्यांकन की आवश्यकता होगी. यह पेश किया गया है कि संज्ञान लेते समय केवल प्रथम दृष्ट्या मामला ही देखा जाना होता है और संबंधित न्यायालय से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह कोई 'मिनी ट्रायल' करे.
कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि इस मामले में केवल एक ही प्रश्न उठता है वह यह कि क्या FIR के विवरण के माध्यम से आवेदक पर लगाया गया कृत्य, IPC की धारा 295-A में वर्णित अपराध के दायरे में आता है अथवा नहीं. कोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 295A जो जान-बूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों से संबंधित है जिनका उद्देश्य किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करना होता है. धारा 295A में अगर कोई ऐसा करने का प्रयास करता है तो उसे किसी भी प्रकार के कारावास से दंडित किया जाएगा जिसकी अवधि तीन वर्ष तक हो सकती है या फिर जुर्माना लगाया जा सकता है या दोनों हो सकते है.
कोर्ट में अपने फैसले में कहा कि FIR में दिए गए बयानों को सिर्फ़ पढ़ने से ही यह पता चलता है कि जैसा कि उसमें बताया गया है कि आवेदक अपनी प्रार्थना सभाओं में अक्सर यह कहता है कि केवल एक ही धर्म है जो कि ईसाई धर्म है और ऐसा करके वह एक विशेष धर्म यानी हिंदू धर्म की भावनाओं को ठेस पहुँचाता है. कोर्ट ने कहा कि जबकि भारत एक ऐसा देश है जहाँ भारत के संविधान द्वारा परिभाषित एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में सभी आस्थाओं और विश्वासों को मानने वाले लोग मिल-जुलकर रहते हैं. इसलिए किसी भी धर्म का यह दावा करना गलत है कि केवल वही एकमात्र सच्चा धर्म है क्योंकि इसका अर्थ अन्य धर्मों का अपमान करना होता है. इस प्रावधान की पहली पंक्ति ही नागरिकों के किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के जान-बूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे के बारे में बताती है जो उनके धर्म या धार्मिक आस्था का अपमान करके किया जाता है.
हाईकोर्ट ने माना कि इसका अर्थ यह है कि आवेदक का यह कृत्य IPC की धारा 295-A के दायरे में आता है और इसलिए इस चरण पर यह नहीं कहा जा सकता कि प्रथम दृष्ट्या (Prima Facie) कोई मामला नहीं बनता है. अदालत में की गई सभी दलीलें तथ्यों के विवादित प्रश्नों से संबंधित है जिन पर इस न्यायालय द्वारा BNSS की धारा 528 के तहत प्राप्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए कोई निर्णय नहीं दिया जा सकता है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संज्ञान लेने या समन जारी करने के चरण पर मजिस्ट्रेट से केवल यह अपेक्षित होता है कि वह रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर एक प्रथम दृष्ट्या (Prima Facie) राय दर्ज करे और उससे यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह कोई 'मिनी ट्रायल' करे या आरोपी के बचाव की जांच करे.
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2002 के SW Palanitkar और अन्य बनाम बिहार राज्य और अन्य के फैसले के हवाला दिया जिसमें यह माना गया था कि जिस कसौटी को लागू किया जाना था वह यह थी कि क्या "आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार" है न कि यह कि क्या "दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त आधार" है. कोर्ट ने 2012 के चर्चित नूपुर तलवार बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो और अन्य केस का भी हवाला दिया जिसमें यह दोहराया गया था कि प्रक्रिया जारी करने के चरण पर सामग्री पर विचार करने का सीमित उद्देश्य केवल 'अस्थायी' (tentative) होता है जो कि विचारण (trial) के दौरान प्रस्तुत वास्तविक साक्ष्य से अलग है. अतः इस चरण पर लागू की जाने वाली कसौटी यह थी कि क्या मजिस्ट्रेट के समक्ष रखी गई सामग्री आरोपी के विरुद्ध आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त थी न कि दोष को सिद्ध करने और स्थापित करने के लिए पर्याप्त.
कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि संज्ञान लेने के चरण पर न्यायालय का प्राथमिक ध्यान यह निर्धारित करने पर होता है कि क्या कोई प्रथम दृष्ट्या मामला मौजूद है अर्थात् क्या यह सुझाव देने के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं कि कोई अपराध किया गया है न कि मामले के गुण-दोष या साक्ष्य की गहराई में जाने पर.कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ कार्रवाई रद्द करने से मना कर दिया और कहा कि भारत एक सेक्युलर देश है, जहां कोई खास धर्म "एकमात्र सच्चा धर्म" होने का दावा नहीं कर सकता. कोर्ट ने कहा कि आवेदक द्वारा प्रस्तुत सभी दलीलें विवादित तथ्यों से संबंधित हैं जिनका निर्णय धारा 528 बीएनएसएस के तहत नहीं किया जा सकता.
यह भी पढ़ें: कर्मचारी के प्रमोशन में एडहॉक सेवा को दरकिनार नहीं कर सकते, इलाहाबाद हाईकोर्ट का प्रोन्नति पर बड़ा फैसला
यह भी पढ़ें: 1100 साल पुरानी जैन मूर्ति संग्रहालय में रहेगी, श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों में विवाद के बाद HC का आदेश














