- इलाहाबाद HC ने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन या इंटर-कास्ट शादी से किसी व्यक्ति की जन्मजात जाति खत्म नहीं होती.
- अपीलकर्ता दिनेश और अन्य 8 लोगों की याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने SC/ST एक्ट की क्रिमिनल अपील को नहीं माना.
- कोर्ट ने कहा कि विवाह के बावजूद महिला अपनी मूल जाति नहीं खोती और SC/ST पहचान बनी रहती है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए साफ कहा है कि किसी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन या इंटर‑कास्ट विवाह उसकी जन्मजात जाति को खत्म नहीं करता. यानी न धर्म बदलने से और न ही दूसरी जाति में शादी करने से किसी व्यक्ति की जाति बदल सकती है. यह टिप्पणी कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट से जुड़ी एक क्रिमिनल अपील को खारिज करते हुए की. यह फैसला जस्टिस अनिल कुमार दशम ने अपीलकर्ता दिनेश व अन्य आठ लोगों की याचिका खारिज करते हुए सुनाया.
क्या था मामला?
अपीलकर्ताओं ने अलीगढ़ के स्पेशल जज SC/ST एक्ट द्वारा 27 जुलाई 2022 को दिए गए आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. मामला 2022 में अलीगढ़ के खैर थाने में दर्ज एक FIR से जुड़ा था, जिसमें आरोप था कि अपीलकर्ताओं ने शिकायतकर्ता महिला के साथ मारपीट, गाली‑गलौज और जातिसूचक अपमान किया. FIR में IPC की धारा 323, 506, 452, 354 और SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(R) के तहत केस दर्ज हुआ था.
अपीलकर्ताओं का दावा था कि शिकायतकर्ता मूल रूप से बंगाल की रहने वाली है और SC/ST समुदाय से है, लेकिन दूसरी जाति (जाट) के पुरुष से शादी करने के बाद वह अपनी SC/ST पहचान नहीं रख सकती.
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अपीलकर्ताओं की दलील क्या थी?
शिकायतकर्ता ने जाट समुदाय में शादी की है, इसलिए वह अब SC/ST श्रेणी में नहीं आती. इस आधार पर SC/ST एक्ट के तहत आरोप कायम नहीं किए जा सकते. अपीलकर्ताओं के खिलाफ पहले से दर्ज FIR होने के कारण आरोप निराधार और 'जवाबी कार्रवाई' बताए गए.
सरकार और शिकायतकर्ता का पक्ष
सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया है कि FIR और शिकायत दोनों में एक ही दिन की घटना दर्ज है-आरोपियों ने हमला करने के साथ जातिसूचक गालियां दीं. घायलों की मेडिकल रिपोर्ट केस को मजबूत करती है. शादी के कारण जाति बदलने की दलील कानूनन गलत है.
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
शादी से जाति नहीं बदलतीकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि एक महिला दूसरी जाति में शादी कर ले, तब भी वह अपनी मूल जाति खोती नहीं है.
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धर्म बदलने से भी जाति नहीं बदलतीयदि कोई व्यक्ति धर्म बदल ले, तब भी वह अपनी मूल जाति ही रखता है, जब तक राज्य द्वारा औपचारिक रूप से जाति परिवर्तन मान्य न किया जाए.
ट्रायल कोर्ट ने शिकायतकर्ता, गवाहों, चोट के सबूत और बयान को आधार बनाकर जो प्रक्रिया शुरू की, उसमें कोई गलती नहीं.
क्रॉस‑FIR आधार नहींदोनों पक्षों की क्रॉस FIR होने से किसी की शिकायत को रद्द नहीं किया जा सकता. अंततः कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं का तर्क कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं और उनकी क्रिमिनल अपील खारिज कर दी.
फैसले का महत्व
यह आदेश सामाजिक न्याय प्रणाली के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह सिद्धांत पुन: स्थापित होता है कि जाति जन्म आधारित पहचान है, जिसे विवाह या धर्म परिवर्तन प्रभावित नहीं करता. SC/ST एक्ट के दायरे में शिकायतकर्ता की पहचान वैध है, चाहे उसने किससे विवाह किया हो.













