250 की भीड़ में 28 की पहचान कैसे की; बरेली हिंसा मामले में आरोपियों के वकील का सवाल, HC में चलीं ये दलीलें

पिछले साल 26 सितंबर को बरेली में हुई हिंसा मामले में आरोपियों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से निराशा हाथ लगी है. चारों आरोपियों की क्रिमिनल रिट याचिका को खारिज कर दिया है. आरोपियों की तरफ से दाखिल चारों याचिकाओं को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है.

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  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली हिंसा मामले में छह आरोपियों की एफआईआर रद्द करने की याचिका को खारिज कर दिया है
  • बरेली की घटना में पुलिस पर हमला और गैरकानूनी सभा के तहत बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी, जो एफआईआर में दर्ज है
  • आरोपियों ने एफआईआर को देरी से दर्ज और बिना साक्ष्य के बताया था, लेकिन कोर्ट ने इसे गंभीर अपराध माना है
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बरेली:

बरेली हिंसा मामले में आरोपियों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से झटका लगा है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छह आरोपियों की एफआईआर रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया.बता दें कि बरेली हिंसा को लेकर आरोपियों ने 26 सितंबर 2025 को दर्ज हुई एफआईआर को रद्द करने की मांग करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी. अब आरोपियों को इलाहाबाद हाई कोर्ट से भी झटका लगा है. 

पिछले साल 26 सितंबर को बरेली में हुई हिंसा मामले में आरोपियों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से निराशा हाथ लगी है. मोहम्मद साजिद उर्फ साजिद सकलैनी, आशु, अजमल रफ़ी, मोहम्मद नईम कुरैशी, मोहम्मद मोवीन और मोहम्मद फैजान की क्रिमिनल रिट याचिका को खारिज कर दिया है. आरोपियों की तरफ से दाखिल चारों याचिकाओं को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है. 

क्या था पूरा मामला?

यूपी के बरेली के बारादरी थाने में केस क्राइम नंबर 1146/2025 में बीएनएस की धारा 191(2), 191(3), 190, 124(2), 121, 125, 352, 351(3), 109, 299, 223 और क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट, 1932 की धारा 7 के तहत सभी के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी. एफआईआर बारादरी थाने के एसएचओ धनंजय पांडे की तरफ से दर्ज कराई गई थी. बरेली हिंसा में शामिल 28 लोगों को एफआईआर में नामजद किया गया था और साथ ही 200-250 अज्ञात उपद्रवियों को आरोपी बनाया गया था. एफआईआर में आरोप लगाया गया कि 26 सितंबर 2025 को जुमे की नमाज के बाद मौलाना तौकीर रजा ने मुस्लिम समुदाय के लोगों को इस्लामिया इंटर कॉलेज में धरना प्रदर्शन करने के मकसद से इकट्ठा होने के लिए बुलाया था.

कुछ बदमाशों ने शांति भंग करने की कोशिश में पुलिस टीम पर धरना स्थल से कुछ दूरी पर हमला भी किया था. एफआईआर में कहा गया था कि धरना स्थल जा रहे 250 लोगों की भीड़ ने अपने हाथों में तख्तियां ली हुई थी और सभी ‘सर तन से जुदा' का बहुत ही आपत्तिजनक नारा लगा रहे थे. उस समय बीएनएसएस की धारा 163 लागू होने के बावजूद बिना आज्ञा धरना करने की तैयारी थी. इस दौरान भीड़ हिंसक हो गई और पुलिस पर हमला बोला गया और जिसमें पुलिसवाले भी घायल हुए थे.

कोर्ट में चली दलीलें

याचिकार्ताओं की तरफ से कोर्ट में अधिवक्ता मोहम्मद वसीम और ओसामा कमर सिद्दीकी ने पक्ष रखा. वहीं सरकार की तरफ से कोर्ट में एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट शशि शेखर तिवारी ने दलीलें पेश की. याचिकाकर्ताओं की तरफ से कोर्ट में पेश वकीलों ने तर्क दिया कि घटना के बाद एफआईआर बिना किसी वजह के देरी से दर्ज की गई थी,जिससे पता चलता है कि यह पहले से सोची-समझी और मनगढ़ंत कहानी का नतीजा है और कुछ नहीं. इसके बाद यह भी कहा गया है कि FIR में बताई गई तरह की कोई घटना कभी नहीं हुई.

याचिकाकर्ता के वकीलों का दावा था कि आरोपी मौके पर मौजूद नहीं थे और न ही उन्होंने पुलिस फोर्स के सदस्यों सहित किसी पर हमला किया था. खास तौर पर यह तर्क दिया गया कि FIR का साफ तौर पर गलत इरादा इस बात से साफ है कि 200-250 या उससे ज्यादा लोगों की भीड़ में पुलिस वाले 28 लोगों की पहचान नाम से कर सकते थे. वकील ने कोर्ट में कहा कि 200-250 लोगों की भीड़ में से 28 आदमियों की पहचान करना लगभग नामुमकिन है क्योंकि शायद पुलिस और अपराधियों के बीच कोई जान-पहचान नहीं हो सकती. सरकार की तरफ से कोर्ट में दाखिल याचिकाओं का विरोध किया गया.

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सरकारी वकील ने क्या कहा?

सरकारी वकील ने तर्क दिया कि जिस एफआईआर पर सवाल उठाया गया है उससे एक गंभीर अपराध का पता चलता है जिसमें कानून और व्यवस्था का बड़े पैमाने पर उल्लंघन हुआ है. सरकार की तरफ से पेश वकील ने दलील दी कि यह एक ऐसा मामला है जिसमें उस बड़ी साजिश का पता लगाने के लिए कस्टडी में पूछताछ की जरूरत है जिसके कारण एक गैरकानूनी सभा की ओर से यह हिंसा हुई जिसका याचिकाकर्ता हिस्सा थे.कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद माना कि एफआइआर में लगे आरोप पहली नजर में बहुत गंभीर हैं जिनकी पूरी जांच और कस्टडी में पूछताछ की जरूरत है.

हाईकोर्ट ने कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जहां अलग-अलग याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई दलीलों को मानकर FIR को रद्द किया जा सके. कोर्ट ने याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि यह मामला गैर-कानूनी भीड़ के सदस्यों द्वारा बड़े पैमाने पर हिंसा का है.कोर्ट ने कहा कि यह सही केस नहीं लगता जहां एफआईआर को रद्द किया जा सके.कोर्ट ने सभी आरोपियों की याचिका को खारिज करते हुए याची मोहम्मद साजिद उर्फ साजिद सकलैनी को 24 नवंबर 2025 को दिए अंतरिम स्टे ऑर्डर को भी रद्द कर दिया जिसमें उसे अंतरिम राहत मिली थी. कोर्ट ने इस ऑर्डर को रजिस्ट्रार (कम्प्लायंस) की ओर से प्रिंसिपल सेक्रेटरी (होम) और सीनियर सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस, बरेली को भेजने का भी आदेश दिया है.

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बरेली हिंसा का मास्टरमाइंड है तौकीर रजा!

बता दें कि बरेली हिंसा में मौलाना तौकीर रजा खान को मास्टरमाइंड बताया गया है.जेल में बंद मौलाना तौकीर रजा खान ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की हुई है. गौरतलब है कि बरेली में 26 सितंबर 2025 को हुई हिंसा के मास्टरमाइंड मौलाना तौकीर रज़ा खान ने जेल से बाहर आने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. फतेहगढ़ जेल में बंद बरेली हिंसा के मास्टरमाइंड इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के प्रमुख मौलाना तौकीर रजा खान ने बरेली कोर्ट से जमानत याचिका खारिज होने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में जमानत अर्जी दायर की है.

26 सितंबर 2025 को बरेली हिंसा मामले में पुलिस ने बरेली के बारादरी, कोतवाली, कैंट, किला और प्रेम नगर थाने में एफआईआर दर्ज की थी.एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि तौकीर रजा के साथियों ने भीड़ को उकसाकर हिंसा के लिए भड़काया था. बरेली हिंसा को लेकर कुल दस मुकदमे दर्ज किए गए थे.जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की डिवीजन बेंच ने सुनाया फैसला.

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