खुले में नमाज की इजाजत नहीं दी जा सकती... इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर क्या बोले मुस्लिम धर्मगुरु?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी को भी खुले में नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं दी जा सकती. मुस्लिम धर्मगुरुओं ने इस फैसले की तारीफ की है.

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खुले में नमाज पर हाई कोर्ट के फैसले पर मुस्लिम नेताओं ने क्या कहा?
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  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सार्वजनिक जगहों पर नमाज पढ़ने की अनुमति देने से इंकार कर दिया है
  • कोर्ट ने कहा कि धार्मिक आजादी सीमित होती है और दूसरों के अधिकारों तथा सार्वजनिक व्यवस्था का सम्मान जरूरी है
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक जगह सभी के लिए होती है और कोई भी धार्मिक आयोजन वहां नहीं कर सकता
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सड़क या सार्वजनिक जगहों पर नमाज पढ़ने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है. हाई कोर्ट ने सार्वजनिक जगहों पर नमाज की इजाजत देने से मना कर दिया है. अपने फैसले में कोर्ट ने एक बड़ी टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि धार्मिक मान्यताओं को मानने के लिए किसी इजाजत की जरूरत नहीं, लेकिन जहां ये लोगों को प्रभावित करने लगे, वहां नियम-कायदे लागू हो जाते हैं.

हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी संभल में एक निजी जमीन पर नमाज अदा करने की इजाजत देने की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए की. कोर्ट ने साफ किया कि सार्वजनिक जगह सबकी होती है और कानून से चलती है. कोई भी व्यक्ति नियमित धार्मिक आयोजनों के लिए इसका इस्तेमाल करने का दावा नहीं कर सकता.

कोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि 'एक संवैधानिक समाज में आजाद के साथ हमेशा दूसरों के प्रति जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है. संविधान धर्म मानने के अधिकार की रक्षा करता है लेकिन यह भी साफ करता है कि यह अधिकार सार्वजनिक आदेश और नैतिकता के अधीन है. यह असीमित अधिकार नहीं है. इसका इस्तेमाल इस तरह से नहीं किया जा सकता है, जिससे दूसरों पर असर पड़े या सार्वजनिक जिंदगी के सामान्य कामकाज में रुकावट आए.'

कोर्ट ने आगे कहा कि 'जैसा कि अक्सर कहा जाता है कि एक इंसान की आजादी वहीं खत्म हो जाती है, जहां वह किसी और पर असर डालना शुरू कर करती है. कोर्ट ने कहा कि अगर कोई परंपरा से हटकर सार्वजनिक स्थान का उपयोग किसी धार्मिक गतिविधि के लिए करना चाहता है तो कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य सरकार हस्तक्षेप कर सकती है.'

अदालत ने अपने फैसले में यह भी साफ किया कि किसी एक समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता दूसरे समुदाय के अधिकारों पर निर्भर करती है.

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फैसले पर किसने क्या कहा?

अदालत के इस फैसले पर बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि केस के मुद्दई इकबाल अंसारी ने कहा कि मस्जिदें खास तौर पर नमाज के लिए ही बनाई जाती हैं, इसलिए नमाज पढ़ने के लिए सार्वजनिक जमीन का इस्तेमाल करने की कोई जरूरत नहीं है. लोगों को कानून का पालन करना चाहिए. अगर कोर्ट ने कोई फैसला दिया है, तो उस फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए.

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अलीगढ़ के शाही चीफ मुफ्ती मौलाना चौधरी इफराहीम हुसैन ने कहा कि 'यह फैसला तारीफ के काबिल है. इस्लाम में यह सिखाया जाता है कि नमाज पढ़ने के लिए जमीन का साफ-सुथरा और पाक होना जरूरी है और निर्विवाद होना जरूरी है. किसी ऐसे देश में जहां अलग-अलग धर्मों के लोग रहते हैं, वहां किसी को भी प्रार्थना के लिए उस जगह पर अपना एकाधिकार जमाने का हक नहीं है. अगर किसी खास धर्म के लोग किसी सार्वजनिक जगहों पर इबादत करने की कोशिश करते हैं तो यह न तो कानून की नजर में सही है और ही इस्लाम की नजर में सही है.'

वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के प्रमुख मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी बरेलवी ने कहा कि यह फैसला पूरी तरह से सही है, क्योंकि शरीयत में यह बात बिल्कुल साफ है कि किसी भी ऐसी जगह पर नमाज नहीं पढ़ी जानी चाहिए, जहां कोई विवाद या टकराव पैदा होने की आशंका हो या जहां किसी को कोई आपत्ति या एतराज हो. ऐसी जगहों पर नमाज पढ़ने से परहेज करना चाहिए.

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इस फैसले पर कांग्रेस नेता और राज्यसभा के पूर्व सांसद हुसैन दलवाई ने कहा, 'अगर लोग सार्वजनिक जगहों पर लगातार, हर समय नमाज पढ़ते रहें, तो यह यकीनन गलत होगा. मेरी राय में, नमाज तो मस्जिदों के अंदर ही 2-3 बार पढ़ी जा सकती है, है ना? इसलिए, अगर कोई सार्वजनिक जगह के इस तरह के इस्तेमाल को लेकर शिकायत करता है, तो इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को अन्यायपूर्ण या अनुचित नहीं माना जा सकता.'

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उन्होंने आगे कहा कि ईद के दौरान लोगों की भारी भीड़ जमा होती है. अगर वे ऐसे समय में किसी सार्वजनिक मैदान या खुली जगह का इस्तेमाल करते हैं, तो इसे जरूरी नहीं कि कोई गलत काम माना जाए, क्योंकि सभी धर्मों के लोग सार्वजनिक जगहों का इस्तेमाल इसी तरह करते हैं.

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