'मैं कभी दुर्व्यवहार नहीं करूंगा', वाला प्लेकार्ड लेकर खड़े होने की सजा पर छात्र को इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा की यूनिवर्सिटी के छात्र को 30 दिन तक तख्ती लेकर खड़े रहने का आदेश रद्द किया. इसे अपमानजनक और स्थायी दाग मानते हुए निष्पक्ष फैसला सुनाया गया.

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  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा की यूनिवर्सिटी द्वारा छात्र को तख्ती लेकर गेट पर खड़ा करने का आदेश रद्द किया है
  • कोर्ट ने सिंगल जज के निर्देश को अपमानजनक और छात्र के चरित्र पर स्थायी दाग लगाने वाला बताया है
  • छात्र को 95% उपस्थिति का नोटरीकृत हलफनामा दाखिल करना और यूनिवर्सिटी परिसर में क्लास के दौरान उपस्थित रहना होगा
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इलाहाबाद:

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा की एक यूनिवर्सिटी के छात्र को राहत देते अपने महत्वपूर्ण फैसले में हाई कोर्ट की सिंगल बेंच द्वारा पूर्व में दिए आदेश के उस निर्देश को रद्द कर दिया, जिसमें यूनिवर्सिटी से निकाले गए छात्र को 30 दिनों तक यूनिवर्सिटी गेट पर 30 मिनट तक एक तख्ती (Placard) लेकर खड़े रहने के लिए कहा गया था. इस तख्‍ती पर लिखा होना चाहिए था- 'वह कभी किसी लड़की के साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा.' सिंगल बेंच ने अपने आदेश में कहा था कि प्रतिवादी यूनिवर्सिटी छात्र के इस कार्य की तस्वीर लेगी होगी. ऐसा न होने की स्थिति में प्रतिवादी यूनिवर्सिटी छात्र को निकलने के लिए स्वतंत्र है. 

एक और मौका दिया जाएगा

छात्र द्वारा सिंगल बेंच के इस आदेश के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में स्पेशल अपील दायर की गई जिसपर चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की डबल बेंच ने मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि सिंगल बेंच के आदेश में निर्देश नंबर दो का नेचर जो सिंगल जज ने पास किया है, वो किसी भी हालत में सही नहीं है. इस तरह का निर्देश जिसमें अपीलकर्ता एक तख्ती लेकर जिस पर यह मैसेज लिखा हो कि वह किसी भी लड़की के साथ कभी भी दुर्व्यवहार नहीं करेगा और यूनिवर्सिटी के गेट पर 30 दिनों तक 30 मिनट के लिए खड़ा रहेगा. कोर्ट ने माना कि यह न केवल अनुचित और अपमानजनक है. बल्कि अपीलकर्ता छात्र के चरित्र पर स्थायी दाग भी छोड़ देगा, जिसकी मामले की परिस्थितियों में कोई ज़रूरत नहीं है. चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली कोर्ट ने सिंगल जज द्वारा 29 अक्टूबर 2025 को दिए गए निर्देश संख्या (II) को रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा कि याची छात्र द्वारा अगर पूर्व में दिए गए सिंगल बेंच के आदेश के निर्देश संख्या दो में डिफ़ॉल्ट क्लॉज़ के कारण अपीलकर्ता को फिर से निष्कासित किया गया है, तो उसे निर्देश संख्या (III) के अनुसार ज़रूरी कार्रवाई करने का एक और मौका दिया जाएगा यदि उसने पहले से ऐसा नहीं किया है. 

अदालत ने छात्र पर लगाई ये पाबंदियां

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि यदि पहले ही पालन किया जा चुका है, तो उसका निष्कासन रद्द हो जाएगा और छात्र ईमानदारी से निर्देश संख्या (I) का पालन करेगा, जिसमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता प्रतिवादी यूनिवर्सिटी के सामने एक नोटरी से सत्यापित हलफनामा दाखिल करेगा कि वह बाकी बची 95% क्लास में शामिल होगा और अनुपस्थित रहने पर उसे छुट्टी के लिए आवेदन देना होगा. वह क्लास के समय यूनिवर्सिटी परिसर से बाहर नहीं जाएगा. किसी भी और नई शिकायत की स्थिति में प्रतिवादी यूनिवर्सिटी बिना नोटिस जारी किए भी याचिकाकर्ता छात्र को यूनिवर्सिटी से निकाल सकती है. कोर्ट ने इन निर्देशों के साथ छात्र की स्पेशल अपील को निस्तारित कर दिया. दरअसल याची छात्र ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्पेशल अपील डिफेक्टिव दायर करते हुए 29 अक्टूबर 25 को सिंगल जज द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती दी थी. सिंगल बेंच ने हालांकि अपीलकर्ता छात्र का निष्कासन रद्द कर दिया था लेकिन कुछ निर्देश दिए गए थे जिनका पालन न करने पर फिर से निष्कासन का आधार बनाया गया था. स्पेशल अपील की सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता छात्र के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि सिंगल जज द्वारा दिया गया निर्देश नंबर (II) न केवल छात्र के लिए अपमानजनक है बल्कि यह उसके करियर पर हमेशा के लिए असर डालेगा और इसलिए इस निर्देश को रद्द कर दिया जाना चाहिए.  

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अपील 57 दिनों की देरी से दायर

प्रतिवादी यूनिवर्सिटी के वकील ने सिंगल जज के आदेश का समर्थन किया. यह दलील दी गई कि छात्र द्वारा दाखिल की गई याचिका सुनवाई योग्य नहीं है. हालांकि, मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए सिंगल जज ने निर्देश पारित किए है, जिनमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है. कहा गया कि अपील 57 दिनों की देरी से दायर की गई है. छात्र की तरफ से अपील दायर करने में देरी माफ करने के लिए एक आवेदन दायर किया गया. शपथ पत्र द्वारा समर्थित आवेदन में बताए गए कारणों से कोर्ट ने इसे स्वीकार किया कर लिया. कोर्ट ने अपील दायर करने में हुई देरी को माफ कर दिया. कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद विचार किया. 

छात्र एक गरीब किसान का बेटा

कोर्ट ने छात्र के निष्कासन आदेश को यह देखते हुए रद्द कर दिया था कि अपीलकर्ता के पिता एक गरीब किसान है और बड़ी मुश्किल से अपीलकर्ता को यूनिवर्सिटी में पढ़ने की अनुमति मिली है और संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए कई निर्देश दिए गए थे जिसमें छात्र को 95 प्रतिशत उपस्थिति का वचन देते हुए नोटरीकृत हलफनामा दाखिल करने को कहा गया था. क्लास के समय परिसर न छोड़ना और 72 घंटे के अंदर लिखित माफीनामा दाखिल करना शामिल था. सिंगल बेंच ने पुलिस अधिकारियों को विश्वविद्यालय के गेट पर 'एंटी-रोमियो मोबाइल स्क्वाड' तैनात करने का भी निर्देश दिया था. हालांकि छात्र ने तख्ती वाली शर्त को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्पेशल अपील दाखिल की. 

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छात्र के चरित्र पर लग जाएगा स्थायी दाग

कोर्ट ने छात्र की स्पेशल अपील पर आदेश देते हुए कहा कि सिंगल जज द्वारा दिए आदेश के निर्देश संख्या (I), (III), (IV) और उसके बाद का निर्देश संख्या (V) अपीलकर्ता के पिछले एकेडमिक सालों में 50% अटेंडेंस को देखते हुए सही है. कोर्ट ने माना कि सिंगल जज द्वारा पारित निर्देश संख्या (II) किसी भी हालत में सही नहीं है. इस तरह का निर्देश जिसमें अपीलकर्ता एक तख्ती लेकर जाएगा जिस पर यह संदेश लिखा होगा कि वह किसी भी लड़की के साथ कभी भी दुर्व्यवहार नहीं करेगा और 30 दिनों तक 30 मिनट के लिए यूनिवर्सिटी के गेट पर तख्ती लेकर खड़ा रहेगा. यह न केवल अपमानजनक है, बल्कि अपीलकर्ता के चरित्र पर एक स्थायी दाग लगा देगा जो मामले की परिस्थितियों में ज़रूरी नहीं है. हाईकोर्ट ने छात्र की स्पेशल अपील को निस्तारित करते हुए सिंगल जज द्वारा दिए गए निर्देश नंबर (II) को रद्द कर दिया और कहा कि अगर निर्देश नंबर (II) में डिफ़ॉल्ट क्लॉज़ की वजह से अपीलकर्ता को फिर से निष्कासित किया गया है तो उसे निर्देश नंबर (III) के अनुसार ज़रूरी काम करने का एक और मौका दिया जाएगा.

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