Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुजफ्फरनगर में एक निर्माणाधीन मस्जिद को प्रशासन द्वारा सील किए जाने के बाद, याचिकाकर्ता द्वारा सील हटाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से पूछा है कि विधि के किस अधिकार के अधीन राज्य किसी पूजा-स्थल को सील कर सकता है. साथ ही कोर्ट ने यह भी जानना चाहा है कि कानून के किस प्रावधान के तहत, यदि कोई हो, तो क्या किसी पूजा-स्थल से संबंधित मामलों में राज्य से पूर्व अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है.
कोर्ट ने यह भी पूछा है कि क्या कानून के तहत किसी निर्माणाधीन पूजा-स्थल (Place of Worship) को बिना कोई पूर्व सूचना जारी किए अथवा याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर दिए बिना सील करने का कोई अधिकार मौजूद है. कोर्ट ने 18 मार्च को सरकारी वकील को निर्देश दिया कि राज्य सरकार द्वारा एक एफिडेविट के साथ स्पष्ट निर्देश लेकर अगली सुनवाई यानी 24 मार्च तक कोर्ट के सामने पेश किया जाए. हालांकि 24 मार्च को इस मामले में सुनवाई टल गई. यह आदेश जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिवीजन बेंच ने अहसान अली की Writ C याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया.
मामला क्या है?
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता अहसान अली ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में Writ C याचिका दायर करते हुए कोर्ट से कहा कि वह मुजफ्फरनगर के ग्राम भोपा, परगना भोकरहेड़ी, तहसील जानसठ स्थित प्लॉट संख्या 780 का वैध स्वामी है. यह जमीन उसने 20 सितंबर 2019 को विधिवत पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से प्रवीण कुमार जैन से खरीदी थी.
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता के वकील जगदीश प्रसाद मिश्रा ने कोर्ट में दलील दी कि याची अपनी खरीदी गई संपत्ति पर मस्जिद का निर्माण करवा रहा है. लेकिन राज्य के अधिकारियों ने इस आधार पर संपत्ति को सील कर दिया कि यह निर्माण अवैध है और इसके लिए सक्षम प्राधिकारी से कोई पूर्व अनुमति प्राप्त नहीं की गई थी. वकील ने यह भी कहा कि परिसर को सील किए जाने से पहले न तो याचिकाकर्ता को कोई नोटिस दिया गया और न ही सुनवाई का अवसर प्रदान किया गया.
इलाहाबाद कोर्ट से मांग
इन परिस्थितियों को देखते हुए याचिकाकर्ता ने कोर्ट से गुहार लगाई है कि प्रतिवादी अधिकारियों को संपत्ति की सील हटाने, निर्माण कार्य करने की अनुमति देने और परिसर का उपयोग पूजा-स्थल के रूप में करने की इजाजत देने का निर्देश दिया जाए.














