Pulse Farming: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि किसान सिर्फ गेहूं और धान जैसी पारंपरिक फसलों तक सीमित न रहें. अदालत ने सुझाव दिया कि कृषि नीति में बदलाव कर दालों जैसी वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा दिया जाए, ताकि खेती ज्यादा टिकाऊ और फायदेमंद बन सके. दरअसल भारत में दशकों से गेहूं-धान का मॉडल इतना मजबूत हो गया है कि ज्यादातर किसान इन्हीं फसलों पर निर्भर हो गए हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि इन फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सरकारी खरीद का सिस्टम मजबूत है, इसलिए किसानों को बिक्री की चिंता कम रहती है. इस मॉडल की एक बड़ी समस्या पानी की खपत है.
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दाल क्यों किसानों के लिए फायदेमंद?
धान की खेती के लिए काफी ज्यादा पानी की जरूरत होती है. कृषि अध्ययनों के मुताबिक एक किलो चावल उगाने में औसतन करीब 2500 लीटर पानी लग सकता है. इसमें सिंचाई और बारिश दोनों से मिलने वाला पानी शामिल होता है. यही कारण है कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे इलाकों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है. यहीं पर दालों की खेती एक बेहतर विकल्प बनकर सामने आती है. दालों की फसल को धान की तुलना में काफी कम सिंचाई की जरूरत होती है. कई मामलों में यह फसल बारिश के पानी से ही तैयार हो जाती है, इसलिए ट्यूबवेल और सिंचाई के पानी पर निर्भरता भी कम रहती है. साथ ही ये फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाने में भी मदद करती हैं, जिससे जमीन की उर्वरता बेहतर होती है और अगली फसल के लिए भी फायदा मिलता है.
किसानों के लिए नई संभावनाभारत के लिए दालों की अहमियत इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि देश में दालों की खपत बहुत अधिक है. कई बार घरेलू उत्पादन कम पड़ने पर सरकार को बड़ी मात्रा में दालों का आयात करना पड़ता है. अगर देश में दालों की खेती बढ़े तो आयात पर निर्भरता भी घट सकती है और किसानों को नया बाजार मिल सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने इसी संदर्भ में केंद्र सरकार से कहा है कि वह ऐसी नीति बनाए जिससे किसान गेहूं-धान के अलावा दालों की खेती करने के लिए भी प्रोत्साहित हों. अदालत ने यह भी कहा कि दाल उगाने वाले किसानों को बेहतर MSP और खरीद की गारंटी दी जानी चाहिए. अगर, खेती में यह बदलाव धीरे-धीरे लागू किया जाए तो इससे दो बड़े फायदे हो सकते हैं.
- किसानों की आय के नए रास्ते खुलेंगे
- पानी की भारी बचत होगी, मिट्टी और भी अधिक ऊपजाऊ होगी.
अगर, आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट की इस सलाह को नीति का रूप मिल जाता है, तो यह सिर्फ खेती का तरीका ही नहीं बदलेगा, बल्कि देश के लाखों किसानों की किस्मत भी बदल सकता है.
गेहूं के बजाय दालों की खेती करना कम लागत में उच्च मुनाफा, बेहतर मिट्टी स्वास्थ्य और जल संरक्षण के लिए एक स्मार्ट विकल्प है. दालें मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाती हैं, 2-3 सिंचाई में तैयार हो जाती हैं और प्रति हेक्टेयर लगभग 13,240 तक का अतिरिक्त लाभ दे सकती हैं. यह फसल चक्र में सुधार और रसायनों की निर्भरता कम करती है.
मिट्टी की उर्वरता में सुधारदलहन फसलें जैसे मूंग, मसूर, अरहर, उड़द अपनी जड़ों में मौजूद राइजोबियम बैक्टीरिया के माध्यम से वातावरण से नाइट्रोजन सोखकर मिट्टी में स्थिर करती हैं, जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है और अगली फसल को कम खाद की जरूरत पड़ती है.
गेहूं की तुलना में दालों में सिंचाई की बहुत कम आवश्यकता होती है. 2-3 बार और रसायनों व कीटनाशकों का उपयोग भी कम होता है, जिससे खेती की लागत कम हो जाती है.














