- BMC में S-वार्ड में मतदान प्रतिशत शहर के औसत से अधिक दर्ज हुआ, लगभग 54 से 61 प्रतिशत
- दक्षिण मुंबई के पॉश इलाकों में मतदान कम हुआ, जहां मतदान दर 45 से 48 प्रतिशत के बीच सीमित रही
- भांडुप, कांजुरमार्ग और विक्रोली के मराठी भाषी मध्यवर्ग तथा श्रमिक वर्ग ने इस बार अधिक सक्रिय मतदान किया है
बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव की मतगणना शुक्रवार सुबह 10 बजे से शुरू हो चुकी है. इन चुनावों में 29 महानगरपालिकाओं में वोटों की गिनती हो रही है. मुंबई के S‑वार्ड (वार्ड 109–112) में बंपर वोटिंग दर्ज हुई है. मतदान 54% से 61% के बीच रहा, जो शहर के औसत 52.94% से अधिक है. यह इलाका भांडुप, कांजुरमार्ग और विक्रोली के मराठी भाषी मध्यवर्ग और श्रमिक वर्ग का पारंपरिक गढ़ माना जाता है, जहां कन्नमवार नगर, हनुमान नगर और तानाजी वाड़ी जैसी पॉकेट्स में चॉल और स्लम का बड़ा वोट बैंक सक्रिय रूप से बाहर निकलता है.
पॉश इलाकों में सुस्त वोटिंग
इसके उलट दक्षिण मुंबई के कई पॉश इलाकों, जैसे कोलाबा और मालाबार हिल के कुछ हिस्सों में मतदान 45–48% के आसपास सिमट गया, जो बताता है कि हाई‑राइज और अपमार्केट इलाकों की तुलना में चॉल‑स्लम बेल्ट का वोटर इस बार ज्यादा प्रतिबद्ध दिखा. विश्लेषक मानते हैं कि उच्च मतदान अक्सर किसी बड़े बदलाव, आक्रोश या भावनात्मक लामबंदी का संकेत देता है. शिवसेना (उद्धव गुट) के लिए भांडुप–विक्रोली बेल्ट ‘अस्तित्व की लड़ाई' रहा है. विभाजन के बाद उनके कैडर की निष्ठा और ‘सहानुभूति लहर' के तर्क के साथ यह माना जा रहा है कि मराठी अस्मिता और पारंपरिक शिवसैनिक मतदाता ने आक्रामक रूप से मतदान किया.
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2017 की यादें ताज़ा, इस बार बदले हालात
आपको बता दें कि साल 2017 में जहां बीजेपी ने भांडुप (वार्ड 116) में अप्रत्याशित जीत दिलाकर समीकरण पलटे थे, इस बार तस्वीर अलग हो सकती है. यदि भावनात्मक मुद्दे हावी रहे, तो उद्धव गुट को बढ़त मिलना स्वाभाविक माना जा रहा है. कुल मिलाकर, S‑वार्ड की 60% के करीब वोटिंग यह संकेत देती है कि यहां नतीजे बेहद कम अंतर से तय होंगे और यह बेल्ट मुंबई के सत्ता‑संघर्ष में निर्णायक साबित हो सकता है.
लाड़की बहिन' बनाम ‘पुराना शिवसैनिक कैडर'
S‑वार्ड में इस बार औसत से ज्यादा मतदान ने चुनावी गणित को रोमांचक बना दिया है. मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने खुद को ‘असली शिवसैनिक' बताते हुए इस बेल्ट पर खास जोर लगाया और सरकारी योजनाओं खासकर ‘लाड़की बहिन'—के बूते नई सामाजिक‑आर्थिक पकड़ बनाने की कोशिश की है. यदि उच्च मतदान योजनाओं और सत्ता के लाभ तक पहुंचे वर्ग की प्रतिक्रिया है, तो शिंदे गुट को लाभ मिल सकता है. इधर, राज ठाकरे की MNS का भी भांडुप‑कांजुरमार्ग‑विक्रोली में पुराना आधार रहा है, जो उद्धव और शिंदे दोनों के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है.
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त्रिकोणीय मुकाबले में S‑वार्ड की निर्णायक भूमिका
ऐसे परिदृश्य में बीजेपी का 2017 वाला ‘सरप्राइज़ फैक्टर' फिर सक्रिय हो सकता है. यदि उनका कोर वोटर और शिंदे के समर्थक एक साथ लाइन में आए, तो उद्धव की ‘मशाल' को कड़ी चुनौती मिलेगी. दिलचस्प यह भी है कि जहां S‑वार्ड में 54–61% मतदान दर्ज हुआ, वहीं दक्षिण मुंबई के पॉश वार्ड 45–48% के आसपास रहे. इसे ग्राउंड‑मोबिलाइजेशन और बूथ‑मैनेजमेंट की सफलता माना जा रहा है. इस पूरे समीकरण का सार यही है कि S‑वार्ड का नतीजा किसी एक धड़े की ‘वेव' से नहीं, बल्कि माइक्रो‑सोशल गठबंधनों, लोकल कैंडिडेट की पकड़, स्लम‑चॉल के टर्नआउट और योजनाओं की पहुंच के संयुक्त प्रभाव से तय होगा. इसलिए यह इलाका न केवल सीटों के आंकड़े, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से ‘मुंबई का असली किंग' कौन—इस प्रश्न का भी संकेतक बनता दिख रहा है.














