देश में महिला आरक्षण को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है. संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा के बीच भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही खुद को महिलाओं के अधिकारों का असली समर्थक बताने में जुटी हैं. बीजेपी का दावा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में महिलाओं का अभूतपूर्व सशक्तिकरण हुआ है, वहीं कांग्रेस का कहना है कि महिला आरक्षण का विचार और संघर्ष उसी का रहा है. इस सियासी संग्राम के बीच सवाल यह भी है कि ज़मीन पर हकीकत क्या है? खासतौर पर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहां विधानसभा और लोकसभा चुनावों में महिलाओं को कितनी हिस्सेदारी मिली? महिला आरक्षण लागू होने पर तस्वीर कैसी होगी? आंकड़े और राजनीतिक बयान इस बहस को और धार दे रहे हैं.
Women Reservation: महिला आरक्षण के बाद कैसी होगी सदन की तस्वीर
संसद से सियासत तक, महिला आरक्षण पर आमने‑सामने बीजेपी‑कांग्रेस
महिला आरक्षण बिल पर चर्चा के दौरान बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियां खुद को महिला हितैषी बताने में लगी हैं. बीजेपी का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में महिलाओं के लिए योजनाएं, सुरक्षा और राजनीतिक भागीदारी को नया आयाम मिला है. दूसरी ओर कांग्रेस का दावा है कि महिला आरक्षण कोई नया विचार नहीं है, बल्कि इसे सबसे पहले उसी ने आगे बढ़ाया था.
बीजेपी का पक्ष: “मोदी सरकार में हुआ महिला सशक्तिकरण”
छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने कहा कि बीजेपी की सरकारों ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में लगातार काम किया है. उनका कहना है कि केंद्र और राज्यों में योजनाओं से लेकर राजनीतिक मंच तक महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है और महिला आरक्षण विधेयक इसी सोच का विस्तार है.
कांग्रेस का जवाब: “हम पहले से समर्थक रहे हैं”
छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि कांग्रेस हमेशा से महिला आरक्षण के पक्ष में रही है. उन्होंने याद दिलाया कि कांग्रेस ने ही पहले राज्यसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा विधेयक पेश किया था. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि असली सवाल परिसीमन और जनगणना को लेकर है. कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी परिसीमन को अपने फायदे के हिसाब से करना चाह रही है, जिससे राजनीतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है.
Women Reservation: महिला आरक्षण के बाद सीटों का गणित
महिला आरक्षण लागू हुआ तो बदल जाएगी तस्वीर
छत्तीसगढ़ में फिलहाल लोकसभा की 11 और विधानसभा की 90 सीटें हैं. यदि 33 फीसदी महिला आरक्षण लागू होता है, तो विधानसभा में करीब 30 महिला विधायकों के चुने जाने की संभावना बनेगी. इसके लिए यह ज़रूरी होगा कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियां कम से कम 33 फीसदी टिकट महिलाओं को दें. सवाल यही है कि क्या दल वास्तव में इसके लिए तैयार हैं?
2023 विधानसभा चुनाव: आंकड़े क्या कहते हैं?
2023 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 15 महिलाओं को टिकट दिया, जो कुल टिकटों का 16.5 फीसदी था. इनमें से 8 महिलाएं चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचीं. वहीं कांग्रेस ने 18 महिलाओं को उम्मीदवार बनाया, यानी करीब 20 फीसदी टिकट. इनमें से 11 महिलाएं विधायक बनीं. इस तरह मौजूदा विधानसभा में दोनों दलों की मिलाकर सिर्फ 19 महिला विधायक, यानी करीब 21 फीसदी प्रतिनिधित्व ही है.
Women Reservation: महिला आरक्षण छत्तीसगढ़ का हाल
2018: टिकट ज्यादा, जीत सीमित
2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने कुल 28 महिला उम्मीदवार उतारे थे. बीजेपी ने 15 और कांग्रेस ने 13 महिलाओं को टिकट दिया. चुनाव परिणाम में दोनों दलों से कुल 12 महिला उम्मीदवार ही जीत सकीं. इनमें कांग्रेस की 10 और बीजेपी की सिर्फ 2 महिला विधायक चुनी गईं.
2013 और 2008: धीरे‑धीरे बढ़ी भागीदारी
2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 18 जबकि कांग्रेस ने 15 महिला उम्मीदवार उतारे. कुल 11 महिलाएं विधायक बनीं जिनमें बीजेपी की 7 और कांग्रेस की 4 शामिल थीं. 2008 के चुनाव में बीजेपी ने 11 और कांग्रेस ने 13 महिला उम्मीदवार मैदान में उतारे. उस चुनाव में कुल 9 महिलाएं (5 बीजेपी और 4 कांग्रेस से) विधायक बनीं.
Women Reservation: महिला आरक्षण छत्तीसगढ़ की स्थिति कैसी है?
लोकसभा और राज्यसभा में स्थिति
लोकसभा चुनाव 2024 की बात करें, तो छत्तीसगढ़ से बीजेपी की 2 महिला सांसद कमलेश जांगड़े और रूपकुमारी चौहान चुनी गईं. कांग्रेस से ज्योत्सना महंत कोरबा से सांसद हैं. राज्यसभा की पांच सीटों में फिलहाल 3 महिला सांसद हैं. बीजेपी से लक्ष्मी वर्मा, जबकि कांग्रेस से रंजीता रंजन और फूलो देवी नेताम राज्यसभा में प्रतिनिधित्व कर रही हैं. राज्यसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 50 फीसदी से भी अधिक है, जो एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है.
राजनीति जारी
महिला आरक्षण को लेकर सियासत भले ही तेज हो, लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि आने वाले वक्त में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और बढ़ेगी. सवाल सिर्फ यह है कि क्या पार्टियां वोट और नारों से आगे बढ़कर टिकट वितरण में भी बराबरी दिखाएंगी? महिला आरक्षण लागू होने की स्थिति में छत्तीसगढ़ समेत पूरे देश में राजनीति की तस्वीर बदलनी तय है. अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि दावों के साथ‑साथ ज़मीन पर अमल कब और कैसे होता है.
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