AK‑47 से आत्मसमर्पण तक: 25 साल बाद नक्सल संगठन से कैसे बाहर आई निर्मला? पढ़िए थुलथुली मुठभेड़ की पूरी कहानी

Naxal Surrender Chhattisgarh: 25 साल तक नक्सल संगठन में सक्रिय रही 10 लाख की इनामी लक्ष्मी उर्फ निर्मला का सरेंडर. थुलथुली मुठभेड़ की अंदरूनी कहानी सामने आई. पढ़िए ये रिपोर्ट.

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25 साल बाद नक्सल संगठन से बाहर आई लक्ष्मी उर्फ निर्मला

Naxal Surrender Chhattisgarh: दंतेवाड़ा जिले में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई के बीच एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है. पूर्वी बस्तर डिवीजन में करीब 25 साल तक सक्रिय रही 10 लाख रुपये की इनामी महिला नक्सली लक्ष्मी उर्फ निर्मला ने आत्मसमर्पण के बाद संगठन से जुड़ी कई अहम जानकारियां साझा की हैं. AK‑47 थामकर जंगलों में सक्रिय रहने वाली निर्मला अब मुख्यधारा में लौटने की कोशिश कर रही है. सरेंडर के बाद उसने कुख्यात थुलथुली मुठभेड़ की अंदरूनी कहानी भी बताई है, जिसे नक्सल नेटवर्क के लिए बड़ा झटका माना जाता है.

बचपन से नक्सल संगठन से जुड़ी, बनी मजबूत कैडर

अबूझमाड़ क्षेत्र के डूंगा गांव के गोटपारा की रहने वाली लक्ष्मी उर्फ निर्मला बचपन से ही नक्सल संगठन से जुड़ गई थी. धीरे‑धीरे वह संगठन की मजबूत कैडर बन गई और डीवीसीएम सचिव जैसे अहम पद तक पहुंची. निर्मला ने बताया कि जंगलों में रहते हुए वह एके‑47 लेकर नक्सली गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल रही.

Naxalite Nirmala Surrenders: नक्सली निर्मला ने सुनाई एनकाउंटर की कहानी

नक्सली लीडर की गार्ड से कमांडर तक का सफर

निर्मला ने खुलासा किया कि शुरुआत में वह नक्सली लीडर कोशा की गार्ड के तौर पर तैनात रही. इसके बाद वर्ष 2013 में उसे पूर्वी बस्तर डिवीजन में सक्रिय जिम्मेदारी दी गई. लंबे समय तक संगठन में रहने के दौरान उसने माओवादी विचारधारा को अपनाया और कई बड़ी घटनाओं में सहभागिता निभाई. गढ़चिरौली, उत्तर बस्तर और माड़ क्षेत्र में हुई कुल पांच बड़ी मुठभेड़ों में वह नक्सलियों की ओर से जवानों के खिलाफ मोर्चा संभाल चुकी है.

थुलथुली मुठभेड़: 94 नक्सली थे मौके पर मौजूद

सबसे ज्यादा चर्चा में रही थुलथुली मुठभेड़ को लेकर निर्मला ने अहम खुलासे किए. उसने बताया कि उस मुठभेड़ में वह बतौर कमांडर मौजूद थी और कुल 94 नक्सली मौके पर थे. सुबह करीब चार बजे सुरक्षा बलों ने चारों ओर से घेराबंदी कर हमला किया. दोनों तरफ से घंटों तक भीषण गोलीबारी चली, जिसमें 35 नक्सली मारे गए.

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एम्बुश तोड़कर जान बचाकर निकले

निर्मला के मुताबिक, जब नक्सली कमजोर पड़ने लगे तो वह करीब 35 साथियों के साथ एम्बुश तोड़कर किसी तरह वहां से निकलने में सफल रही. यह मुठभेड़ दंतेवाड़ा और नारायणपुर के जवानों की संयुक्त कार्रवाई थी, जिसे सुरक्षा बलों की बड़ी सफलता माना गया. इस घटना के बाद अबूझमाड़ इलाके में नक्सलवाद की पकड़ लगातार कमजोर होती चली गई.

तीन महीने घर में छुपी रही, फिर किया आत्मसमर्पण

निर्मला ने बताया कि संगठन छोड़ने के बाद वह करीब तीन महीने तक अपने घर में रही. इसके बाद उसने आत्मसमर्पण कर दिया. सरेंडर के बाद सरकार की ओर से उसे 10 हजार रुपये की सहायता राशि मिली है, जबकि शेष इनामी राशि मिलने की प्रक्रिया अभी जारी है.

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पुनर्वास की उम्मीद, नई जिंदगी की चाह

निर्मला का कहना है कि उसका आधार कार्ड अभी तक नहीं बन पाया है, जिससे वह कई सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पा रही है. अब वह पुनर्वास नीति के तहत सरकार से आवास और जमीन की मांग कर रही है. उसने कहा कि वह अब हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में रहकर एक शांतिपूर्ण और नई जिंदगी शुरू करना चाहती है.

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