OBC Reservation Creamy Layer: ओबीसी आरक्षण देते समय क्रीमी लेयर का निर्धारण करने के मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक अहम फैसला सुनाया है. मामले को लेकर दायर याचिका पर फैसला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि ओबीसी वर्ग में 'क्रीमी लेयर' का निर्धारण मुख्य रूप से उम्मीदवार के माता-पिता की सामाजिक स्थिति के आधार पर होता है, न कि उसकी वित्तीय स्थिति के आधार पर.
दरअसल, सुनीता यादव ना की एक महिला ने सहायक प्रोफेसर (लॉ) के पद पर एक अन्य ओबीसी महिला की नियुक्ति को चुनौती दी थी. याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में आपत्ति जताई थीं कि ओबीसी के लिए आरक्षित पद पर नियुक्त की गई महिला संपन्न वर्ग (क्रीमी लेयर) में आती है, इसलिए उसे ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए.
महिला ने याचिका में क्या दावा किया?
याचिकाकर्ता के दावे के अनुसार, प्रतिवादी के पति 2008 बैच के 'सिविल जज क्लास-1' हैं, उनका मासिक वेतन लगभग एक लाख रुपये है. इसके अलावा, प्रतिवादी खुद भी अतिथि विद्वान (गेस्ट फैकल्टी) के तौर पर 30 हजार रुपये प्रति माह कमाती है. याचिकाकर्ता का तर्क था कि इन दोनों की आय मिलाकर परिवार की कुल सालाना इनकम, ओबीसी नॉन क्रीमी लेयर में निर्धारित आय सीमा को पार कर जाती है. इस आधार पर प्रतिवादी की नियुक्ति रद्द करके 2021 से याचिकाकर्ता को वरिष्ठता के साथ इस पद पर नियुक्ति दी जाए.
'सिविल जज क्लास-1 का पद, द्वितीय श्रेणी की जॉब
याचिका पर सुनवाई बाद हाईकोर्ट ने आरक्षण और क्रीमी लेयर के महत्वपूर्ण पहलू स्पष्ट किया. कोर्ट ने कहा- 'सिविल जज क्लास-1 का पद, नाम के बावजूद वास्तविक रूप से क्लास-II (द्वितीय श्रेणी) की श्रेणी में आता है. इस तथ्य का सीधा असर क्रीमी लेयर निर्धारण पर पड़ता है. नियमों के अनुसार, क्रीमी लेयर तय करते समय पति की आय तभी प्रासंगिक मानी जाती है, जब वह क्लास-1 अधिकारी हो.
कोर्ट ने खारिज की याचिका
कोर्ट ने कहा कि 'सिविल जज क्लास-1 पद तकनीकी रूप से क्लास-II है, इसलिए पति की आय को इस आधार पर शामिल नहीं किया जा सकता. इसी वजह से अदालत ने स्पष्ट किया कि संबंधित महिला के मामले में क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल उसके माता-पिता की आय और सामाजिक स्थिति के आधार पर होगा, न कि पति की आय से. इसके बाद कोर्ट ने उक्त महिला की नियुक्त को वैध मानते हुए याचिका खारिज कर दी.














