- मध्य प्रदेश में सरकारी शर्तों के कारण छह लाख से अधिक किसान कर्ज चुकाने में असमर्थ होकर डिफॉल्टर बन चुके हैं
- गेहूं की सरकारी खरीद में इस वर्ष बीते साल की तुलना में 20 से 25 दिन की देरी से शुरुआत हुई है
- किसानों को समर्थन मूल्य से कम दाम मिल रहे हैं जिससे वे बैंक कर्ज के किश्त भुगतान में फंसे हुए हैं
MP Farmer Debt Crisis: मध्य प्रदेश में किसानों को बड़ी राहत देने के सरकारी दावे अब हवा-हवाई साबित हो रहे हैं. एक तरफ सरकार जीरो प्रतिशत ब्याज पर लोन देने की बात करती है, तो दूसरी तरफ कहती है कि समर्थन मूल्य पर एक-एक दाना खरीदा जाएगा. लेकिन ज़मीनी हकीकत ये है कि प्रदेश के करीब 6 लाख 20 हजार किसान 'डिफॉल्टर' हो चुके हैं और अब वो पूरी तरह सरकारी सिस्टम से बाहर हो गए हैं. असल में नियम ये है कि अगर ज़ीरो परसेंट ब्याज का फायदा चाहिए तो मार्च तक पुराना कर्ज चुकाना जरूरी है, लेकिन इस बार गेहूं की सरकारी तुलाई में हुई देरी ने सारा खेल बिगाड़ दिया. किसान इस उलझन में फंस गए हैं कि जब तक फसल बिकेगी नहीं, तब तक वो कर्ज का पैसा कहां से भरेंगे? सरकारी दावों और जमीनी सच्चाई के बीच की इसी खाई को उजागर करती ये ग्राउंड रिपोर्ट… पढ़िए.
मंडी में किसानों को लग रहा है चूना
भोपाल की करौंद मंडी हो या प्रदेश की दूसरी मंडियां,हर जगह किसान परेशान हैं.सरकार ने गेहूं का सरकारी रेट (MSP)₹2,625 तय किया है, जिसमें पिछले साल के मुकाबले ₹160 की बढ़त और ₹40 का बोनस शामिल है. लेकिन जब किसान मंडी पहुंच रहे हैं, तो उन्हें उनकी मेहनत का सिर्फ 2000 से 2200 रुपये का भाव ही मिल रहा है. सीहोर के किसान जगदीश गुर्जर बताते हैं कि उनका तो पूरा गांव ही डिफॉल्टर हो गया है. उनका कहना है कि जब गल्ला बिकेगा तभी तो हाथ में पैसा आएगा और तभी बैंक की किस्त भर पाएंगे. अब देरी की वजह से उन पर भारी ब्याज चढ़ेगा और घर की जरूरतों के लिए उन्हें मजबूर होकर साहूकारों के पास जाना पड़ेगा.
तुलाई में देरी और साहूकारों की चांदी
इस साल गेहूं की सरकारी खरीदी पिछले साल के मुकाबले करीब 20-25 दिन की देरी से शुरू हुई है. इंदौर, उज्जैन और भोपाल जैसे इलाकों में तो 9 अप्रैल से काम शुरू हुआ, लेकिन बाकी जगहों पर ये 15 अप्रैल से होगा. वक्त पर फसल न बिकने और मंडी में कम दाम मिलने की वजह से किसान एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस गया है जहां से निकलना मुश्किल है. आगर मालवा मंडी आए कमल गुर्जर और शोभान सिंह जैसे किसानों का कहना है कि सरकार ने चुनाव के समय ₹2,700 में गेहूं खरीदने का वादा किया था, लेकिन अब दाम बहुत कम मिल रहे हैं. अब हाथ में कैश नहीं है, तो वो डिफॉल्टर हो गए हैं. अब उन्हें बैंकों से लोन नहीं मिलेगा, जिससे साहूकारों की चांदी होगी.
ब्याज माफी की योजना सिर्फ कागजों पर
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि एमपी के 55 जिलों के करीब 6 लाख 20 हजार किसान अपना कर्ज नहीं चुका पाए हैं. जिन्होंने किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) पर लोन लिया था, वो 31 मार्च की आखिरी तारीख निकलने के बाद अब डिफॉल्टर की लिस्ट में आ गए हैं. इन किसानों पर करीब 450 करोड़ रुपये बकाया हैं और इसमें 80 परसेंट छोटे किसान हैं. बैंकों और सोसायटियों का कहना है कि अगर मार्च तक पैसा जमा नहीं हुआ, तो अप्रैल से 12 परसेंट तक ब्याज लगना शुरू हो जाता है. अगर सरकार मार्च के बीच में ही खरीदी शुरू कर देती, तो किसान का गेहूं बिक जाता और उसका पैसा सीधे लोन में कट जाता, जिससे उसे ब्याज माफी का फायदा मिल जाता.
सियासी खींचतान और सरकारी दलीलें
किसानों की इस हालत पर अब राजनीति भी जोरों पर है. कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सीधा आरोप लगाया है कि सरकार ने खरीदी में जानबूझकर देरी की ताकि बड़े व्यापारियों और बिचौलियों को फायदा हो सके. उनका कहना है कि करीब 15 लाख क्विंटल गेहूं खुले बाजार में कम दामों पर बिक गया,जिससे किसानों को सीधा घाटा हुआ है. दूसरी तरफ बीजेपी किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष जयपाल सिंह चावड़ा का कहना है कि बारदाना की कमी के मद्देनजर खरीदी में विलंब हुआ, इस विषय में भी सरकार काम करेगी.इस मामले में मुख्यमंत्री शीघ्र ही बड़ा फैसला लेंगे. चावड़ा ने कहा- मुख्यमंत्री खुद किसान हैं और किसानों की समस्या से वाकिफ है , इसलिए उन्होंने किसान कल्याण वर्ष भी घोषित किया है
सिस्टम से हारा अन्नदाता
मध्य प्रदेश में करीब 19 लाख किसानों ने गेहूं बेचने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है, जो पिछले साल से कहीं ज्यादा है. सरकार का लक्ष्य 78 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदने का है, लेकिन सच्चाई ये है कि जब तक सरकारी कांटे पूरी रफ्तार से चलेंगे, तब तक लाखों किसान कर्ज के दलदल में धंस चुके होंगे. राहत के नाम पर जो सख्त शर्तें रखी गई हैं और खरीदी में जो सुस्ती दिखाई गई है, उसने किसानों को मौसम से ज्यादा सिस्टम के आगे बेबस कर दिया है. अब किसान अपनी फसल को औने-पौन दाम पर बेचने और भारी ब्याज भरने को मजबूर है.सवाल साफ है आखिर इस व्यवस्था में किसान बचेगा कैसे?
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