Mamta Kulkarni Exclusive Interview: पूर्व बॉलीवुड एक्ट्रेस और महामंडलेश्वर ममता कुलकर्णी ने NDTV के साथ खास बातचीत की. इस दौरान उन्होंने महामंडलेश्वर पद छोड़ने के फैसले और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर उठे विवाद पर खुलकर बात की. ममता का कहना है कि वे “सत्य बोलने” से नहीं हटेंगी, चाहे उनकी बात कितनी भी कड़वी क्यों न लगे. उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह महामंडलेश्वर पद छोड़ रही हैं, क्योंकि दिखावे और “नकली उपाधियों” के बीच रहना उन्हें मंजूर नहीं.
ममता कुलकर्णी ने कहा कि वे अक्सर सुर्खियों में इसलिए रहती हैं, क्योंकि वे बिना लाग‑लपेट सच बोलती हैं. उनके अनुसार, आज के समय में सच बोलना ही “ब्रेकिंग न्यूज़” बन गया है, क्योंकि असत्य के शोर में लोगों की सत्य सुनने की आदत कम होती जा रही है. उन्होंने अपने आध्यात्मिक सफर को 25 साल की तपस्या बताया और कहा कि यह किसी से सुन‑समझकर नहीं, बल्कि साधना से सीखा अनुभव है.
“जो सच बोलता है, उसकी वाणी कड़वी लगती है”
ममता ने कहा कि संत या आत्मज्ञानी व्यक्ति जब सच बोलता है तो उसकी वाणी कई बार कड़वी लगती है, लेकिन वह भाव से निकली सच्चाई होती है. उन्होंने बताया कि वे हर कार्य से पहले भगवान गणेश, गुरु और भगवती का स्मरण करती हैं. गुप्त नवरात्र और मौनी अमावस्या का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता “तैयार किए हुए विषय” नहीं, बल्कि जीवन का अनुशासन और साधना है.
“एक ही शंकराचार्य में आत्मज्ञान दिखा”
चार शंकराचार्यों का उल्लेख करते हुए ममता कुलकर्णी ने कहा कि उन्हें पूरी पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती में ही “थोड़ा बहुत आत्मज्ञान” दिखाई देता है. बाकी शंकराचार्यों से उन्होंने असहमति जताई और कहा कि वे चाहते हैं कि सभी धर्म के पक्ष में खड़े हों, न कि किसी अधर्म के साथ.
अविमुक्तेश्वरानंद विवाद पर ममता का पक्ष
ममता कुलकर्णी ने कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर हाल की चर्चाएं इसलिए बढ़ीं, क्योंकि कुछ मौकों पर उनके व्यवहार में उन्हें अहंकार नजर आया. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बड़े धार्मिक पद पर बैठे लोगों को उदाहरण पेश करना चाहिए विनम्रता, सादगी और सहजता का. उन्होंने उल्लेख किया कि परंपरा में आदि शंकराचार्य का आदर्श इसी विनम्रता का रहा है, जहां उन्होंने एक बार “चांडाल” के समक्ष भी सिर झुका कर अद्वैत का सत्य स्वीकार किया था अंदर का तत्व एक है.
माघ मेले में न जाने का कारण
ममता ने कहा कि कई बार वे इसलिए शामिल नहीं हो पातीं क्योंकि उनकी साधना और तप का अनुशासन प्राथमिकता है. उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके लिए आध्यात्मिक साधना दिखावे से अधिक महत्वपूर्ण है, इसलिए वे बिना तैयारी वाले मंचों और औपचारिक उपस्थिति से बचना पसंद करती हैं.
“महामंडलेश्वर पद छोड़ रही हूं”— ममता
ममता ने साफ कहा कि वे महामंडलेश्वर पद से इस्तीफा दे रही हैं. कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि आज “हर दूसरा” महामंडलेश्वर बना हुआ है, जबकि “ज्ञान शून्य” है. सिर्फ मंत्र कंठस्थ होने से कोई गुरु नहीं हो जाता. असली आध्यात्मिक यात्रा कठिन है गुरुसेवा, भक्ति, ध्यान, तप और कुंडलिनी जागरण के माध्यम से प्राप्त ब्रह्मविद्या ही किसी को जगतगुरु कहलाने योग्य बनाती है. वे “नकली आभा और दिखावे” का हिस्सा नहीं बनना चाहतीं.
“उपाधि को सिर पर चढ़ाने से अहंकार आता है”
उन्होंने कहा कि उपाधियां तभी तक ठीक हैं, जब तक वे सेवा और धर्म के काम आएं. जैसे ही उपाधि अहंकार बनती है, पतन शुरू हो जाता है. इसलिए वे नहीं चाहतीं कि कोई उपाधि उनके लिए बोझ या अहंकार बने. यदि “नकली” माहौल में ही धर्म चल सकता है, तो उन्हें ऐसे वातावरण में नहीं रहना.














