अंधेरा, AK-47 और डर, जंगल में चिट्ठी छोड़ पापाराव तक पहुंचा NDTV रिपोर्टर, गृहमंत्री से बात कर कराया सरेंडर

NDTV Reporter Vikas Tiwari Ground Report: पढ़िए बस्तर के खूंखार नक्सली पापाराव के सरेंडर की इनसाइड स्टोरी जिसे NDTV रिपोर्टर विकास तिवारी ने खुद अपनी आंखों से देखा. जानिए कैसे घने जंगलों में हथियारबंद नक्सलियों के बीच बिताई गई रात और गृहमंत्री से बातचीत करा करके 18 माओवादियों का ऐतिहासिक आत्मसमर्पण संभव हुआ. कैसे 8 AK-47 और भारी मात्रा में नकदी की बरामदगी के साथ बस्तर में हिंसा के एक बड़े अध्याय का अंत हुआ है.

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  • बस्तर के बड़े नक्सली कमांडर पापाराव ने दशकों बाद आत्मसमर्पण कर माओवादी आंदोलन में बड़े बदलाव का संकेत दिया
  • पापाराव ने अपने साथ 18 नक्सलियों के साथ हथियार और नकदी भी surrendered कर बस्तर के हिंसक ढांचे को कमजोर किया
  • आत्मसमर्पण से पहले सुरक्षा को लेकर गृह मंत्री से संपर्क कर सुरक्षा बल हटवाने की व्यवस्था की गई थी
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Naxal Leader Paparao Surrender: उस रात बस्तर का जंगल सिर्फ अंधेरा नहीं था, वह अपने भीतर कई बरसों का डर, बारूद और रहस्य दबाए बैठा था. मैं, विकास तिवारी, उस अंधेरे के बीच एक ऐसे आदमी से मिलने जा रहा था जिसका नाम बस्तर में फुसफुसाहट में लिया जाता रहा है पापाराव. वही पापाराव, जो जल, जंगल, जमीन की नस-नस पहचानता था, जो कई बार पुलिस की गोलियों को चकमा देकर निकल गया, और जो बस्तर के आखिरी बड़े लड़ाकू नक्सली चेहरों में गिना जाता था. बस्तर को नक्सल मुक्त घोषित करने की डेडलाइन से ठीक करीब एक हफ्ता पहले, उसका सरेंडर सिर्फ एक खबर नहीं था, इतिहास के करवट बदलने जैसा क्षण था. और मैं उस क्षण का गवाह बनने निकल पड़ा था.

जनवरी में शुरू हुई कहानी 

यह कहानी अचानक शुरू नहीं हुई थी. जनवरी में मैं एक बार नेशनल पार्क के भीतर तक गया था. मैं पापाराव के लिए दस-बारह जगह चिट्ठियां छोड़कर आया था. मुझे पता था, जंगल में खबर हवा से नहीं, भरोसे से चलती है. चिट्ठी उसे मिली थी, यह बाद में पता चला, लेकिन उस समय उसने आने का फैसला नहीं किया था. फैसला उसने अब किया. रविवार को अचानक मेरे पास फोन आया. उधर से दो लोगों की आवाज थी. उन्होंने नाम नहीं बताया. बस इतना कहा हम लोग मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं. एक एरिया कमेटी मेंबर है, एक पार्टी मेंबर. आवाज में हिचक थी, लेकिन इरादा साफ था. मैं समझ गया, मामला बड़ा है.

Paparao Surrender: रिपोर्टर विकास तिवारी के साथ नक्सल कमांडर पापा राव के साथी गए और उस जगह से AK-47 हथियार बार निकाले गए जहां उसे गुप्त रुप से दबा करके रखा गया था.

डर और भय के साथ सफर पर निकला 

मैं फौरन निकल पड़ा. मुझे बीजापुर जिले के कुटरू तक बुलाया गया था. वहां पहुंचा तो लगा जैसे जंगल अपनी सांस रोककर खड़ा हो. कुटरू कोई साधारण जगह नहीं, यह वह किनारा है जहां सड़क धीरे-धीरे खत्म होती है और जंगल का कानून शुरू हो जाता है. वहां से मुझे बाइक पर बैठाकर आगे ले जाया गया. मेरे साथ दो साथी थे, लेकिन नक्सलियों ने साफ कहा था सर, अकेले आइए, तभी अच्छा रहेगा. उसके बाद मैंने एक मोटरसाइकिल अरेंज की और अकेला अंबेली गांव की तरफ निकल पड़ा. रात, जंगल, सुनसान रास्ता और मन में लगातार उठता हुआ एक ही सवाल क्या मैं सही जगह जा रहा हूं, या किसी अनजानी सुरंग में उतर रहा हूं.

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गृह मंत्री को फोन कर फोर्स हटवाने की जद्दोजहद 

अंबेली पहुंचते-पहुंचते रात गहरा चुकी थी. मुझे जिस लोकेशन पर बुलाया गया था, वहां पहुंचकर एक और झटका लग. पूरी डीआरजी टीम पहले से वहां मौजूद थी. मैं समझ गया कि इस हालत में कोई सरेंडर नहीं होगा. मैंने तुरंत गृह मंत्री विजय शर्मा को फोन किया और कहा कि अगर फोर्स रहेगी तो वे सामने नहीं आएंगे. उन्होंने आश्वासन दिया कि फोर्स हटवाई जाएगी. कुछ देर बाद वहां से बल हट गया, लेकिन कहानी इतनी आसान कहां थी. मैं अंबेली गांव से जंगल की तरफ अंदर बढ़ा तो आगे फिर जवान दिखाई दिए. एक बार फिर फोन करना पड़ा. तब जाकर रास्ता साफ हुआ.
 

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Bastar Naxal Surrender: नक्सलियों के छुपाए हथियार बरामद होने के बाद सभी को एक जगह इकट्ठा किया गया फिर आगे का सफर शुरु हुआ.

यहां खुद के दिल की धड़कन सुनाई देने लगी

फोर्स हटने के बाद गांव वालों ने मुझे भीतर की तरफ ले जाना शुरू किया. जंगल यहां सिर्फ पेड़ों का झुंड नहीं है, यह एक जिंदा भूलभुलैया है. कहीं सूखी पत्तियों की चरमराहट, कहीं काली चट्टानों के बीच दबे रास्ते, कहीं ऐसी खामोशी कि अपने दिल की धड़कन भी तेज सुनाई देने लगे. मैं सोच रहा था कि शायद दो लोग मिलेंगे. लेकिन जब दोपहर करीब एक बजे मैं असली स्पॉट पर पहुंचा, तो सामने का दृश्य देखकर मैं ठिठक गया. वहां दस-बारह नक्सली खड़े थे. हथियारबंद. सतर्क. चुप. और फिर मेरी नजर उस चेहरे पर जाकर थम गई. पापाराव. मैं उसे पहचान गया. चेहरा बहुत नहीं बदला था. बस दो साल पहले डायबिटीज होने के बाद वह थोड़ा पतला जरूर हो गया था. लेकिन आंखें वही थीं जंगल में पके हुए आदमी की आंखें, जो हर आहट का मतलब समझती हों. उस क्षण मुझे यह अहसास हुआ कि मैं सिर्फ एक सरेंडर नहीं देख रहा हूं, मैं बस्तर के खून से लिखे एक लंबे अध्याय के आखिरी पन्नों के सामने खड़ा हूं.

Paparao Surrender: रिपोर्टर विकास तिवारी के लिए ये वक्त डर और खुशी का भी था. जंगल में पापा राव और उसके साथियों के साथ बिताई रात. जिसमें जमीन ही बिस्तर था और खुला आसमान छत. डर इसलिए क्योंकि कुछ अनहोनी न हो जाए और खुशी इसलिए क्योंकि सबसे बड़े कमांडर का सरेंडर होने जा रहा था.

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'ये ऐसी रात जिसे कभी नहीं भूल पाऊंगा'

मैंने तुरंत गृह मंत्री विजय शर्मा से पापाराव की बात करवाई. पापाराव ने कहा कि अभी कुछ और कैडर आने बाकी हैं, उन्हें लेने के लिए लोग भेजे गए हैं, वे भी सरेंडर करना चाहते हैं. यह सुनते ही स्थिति की गंभीरता और बढ़ गई. मैंने साफ कहा कि यह छोटा नाम नहीं है, बड़ा चेहरा है, खतरा भी बड़ा हो सकता है, सुरक्षा का भरोसा चाहिए.उधर से आश्वासन मिला, लेकिन जंगल में भरोसा भी रात की तरह अधूरा होता है. धीरे-धीरे अंधेरा उतर आया और हम वहीं रुक गए. उस रात हम सब जंगल में ही रहे. वहीं जो व्यवस्था थी, उसी में खाना बना. जमीन पर बिस्तर जैसी कोई चीज नहीं थी, धरती ही बिछावन थी, आसमान ही छत. लेकिन सच्चाई यह है कि मैं सो नहीं पाया... बिल्कुल नहीं. पूरी रात करवट बदलता रहा. बेचैनी सिर्फ इस बात की नहीं थी कि मैं जंगल में हूं. बेचैनी इस बात की थी कि मेरे सामने पापाराव जैसा नाम मौजूद है. अगर कहीं से कोई संदेश आ गया, अगर किसी और दस्ते को भनक लग गई, अगर आखिरी पल में इरादा बदल गया, अगर हमला हो गया इन सब अगरों ने रात भर मेरी आंखों से नींद छीन ली. आसपास माओवादियों के संतरी रात भर पहरा देते रहे. उनकी परछाइयां अंधेरे में हिलती थीं और मैं हर हलचल को सुनता था. वह रात मेरे लिए एक रिपोर्टर की नहीं, एक जिंदा गवाह की रात थी.

Paparao Surrender: हथियारों के साये में नक्सली महिलाओं ने हमारे रिपोर्टर और अपने साथियों के लिए खाना बनाया. सबने मिलकर जंगल में इसे खाया.

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बस्तर की छाती का बोझ उतरते देखा

अलसुबह हम एक टीम के साथ एक एग्जिट पॉइंट की तरफ निकले.उनका एक कैडर हमारे साथ था. वहां से हमें एक डंप तक ले जाया गया. जंगल के भीतर छिपाकर रखी गई तीन AK-47 और कारतूस निकलवाए गए. जब मैं वहां से वापस लौटा, तब तक दूसरे डंप से 3 बंदूकें, कारतूस और 10 लाख रुपये नकद भी लाए जा चुके थे. हथियार, कारतूस, नकदी यह सिर्फ बरामदगी नहीं थी, यह उस समानांतर हिंसक ढांचे के टूटने का सबूत था जो बरसों से बस्तर की छाती पर बोझ बनकर बैठा था. इसी बीच और कैडर पहुंचते गए. एक और बड़ा नाम आया शंकर, जो डीवीसीएम था.तब जाकर पूरी तस्वीर साफ हुई. यह दो लोगों का नहीं, बड़े पैमाने पर टूटते मनोबल का दृश्य था।

...और जंगल पीछे छूट गया

करीब तीन बजे हम 18 लोगों को लेकर वहां से निकले.पहले पैदल अंबेली गांव पहुंचे. जंगल पीछे छूट रहा था, लेकिन उसके भीतर बिताए वे घंटे मेरे भीतर ठहरते जा रहे थे. अंबेली में पुलिस की बस खड़ी थी. वही बस, जिसमें बैठकर पापाराव और उसके साथी कुटरू थाने पहुंचे. उनके साथ AK-47 समेत कई हथियार थे.बाद में डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने कवर्धा में बताया कि कुल 18 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, जिनमें 10 पुरुष और 8 महिलाएं हैं. 8 AK-47, 1 SLR, 1 INSAS और दूसरे हथियार बरामद हुए हैं. लेकिन मेरे लिए आंकड़ों से ज्यादा अहम वह क्षण था, जब जंगल का एक खौफनाक नाम बस की सीट पर बैठा था, और पहली बार बंदूक के साथ नहीं, आत्मसमर्पण के साथ दिखाई दे रहा था.
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आखिरी लड़ाकू ढांचे का ढहना है ये

पापाराव उर्फ मंगू, उम्र 56 साल, सुकमा का रहने वाला, DKSZCM का मेंबर, पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी का इंचार्ज, दक्षिण सब जोनल ब्यूरो का सदस्य यह कोई साधारण कैडर नहीं था.वह बस्तर के भूगोल की तरह कठिन, उलझा हुआ और खतरनाक नाम था. वह आदमी जिसने इस इलाके के हर नाले, हर पगडंडी, हर ढलान और हर छिपे रास्ते को अपने बच निकलने के नक्शे की तरह इस्तेमाल किया. उसका सरेंडर एक व्यक्ति का झुकना नहीं, एक ढांचे का ढहना है. पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी अब लगभग खत्म मानी जा रही है. देवा के हथियार छोड़ने के बाद पापाराव ही ऐसा बड़ा लड़ाकू चेहरा बचा था, जो अब भी सक्रिय माना जाता था. बाकी बचे कई टॉप कैडर उम्रदराज हो चुके हैं. पिछले साल ही माड़वी हिड़मा, बसवाराजू, गणेश उइके समेत 17 बड़े कैडर मारे गए. भूपति, रूपेश, रामधेर जैसे नाम सैकड़ों साथियों के साथ हथियार डाल चुके हैं. बस्तर में बटालियन नंबर 1 का कमांडर देवा भी हिंसा छोड़ चुका है. ऐसे में पापाराव का सरेंडर सिर्फ एक संगठनात्मक झटका नहीं, माओवाद के आखिरी लड़ाकू ढांचे पर पड़ा निर्णायक प्रहार माना जा रहा है.

Naxal Leader Paparao Surrender: गृहमंत्री से बात होने के बाद पूरी तैयारी हुई और सभी नक्सली पापा राव की अगुवाई में हमारे रिपोर्टर के साथ एक जगह पर जुटे और पुलिस की बस का इंतजार करने लगे. तब माहौल में बिल्कुल भी भय नहीं था.

अब खत्म होगा बस्तर का लंबा अंधेरा

मैंने उस दिन सिर्फ एक खबर कवर नहीं की. मैंने बस्तर के बदलते इतिहास को अपने सामने चलते देखा. वह जंगल, जो कभी बारूदी सुरंगों, एंबुश और बंदूक की भाषा में बोलता था, उसी जंगल ने उस दिन एक और भाषा सुनी वापसी की भाषा.लेकिन सच यह भी है कि बस्तर की धरती इतनी आसानी से अपने जख्म नहीं भूलती.यहां हर मोड़ पर अतीत खड़ा मिलता है.इसलिए जब मैं बस को कुटरू से जगदलपुर की तरफ जाते देख रहा था, तो मेरे भीतर राहत भी थी और एक अजीब सन्नाटा भी. लगा जैसे जंगल ने पहली बार गहरी सांस ली हो लंबी, थकी हुई, लेकिन उम्मीद से भरी. उस रात की मिट्टी अब भी मेरे जूतों पर नहीं, मेरी स्मृति पर चिपकी हुई है. और पापाराव का वह चेहरा थका हुआ, दुबला, लेकिन हथियार छोड़ता हुआ शायद लंबे समय तक बस्तर की कहानी में एक मोड़ की तरह याद रखा जाएगा. मैंने उसे जंगल के भीतर देखा था, उस सीमा रेखा पर जहां बंदूक और भरोसे के बीच अंतिम फैसला लिखा जा रहा था. और मैं कह सकता हूं, वह सिर्फ सरेंडर नहीं था, वह बस्तर के लंबे अंधेरे में पहली साफ दरार थी.
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