अल्बैर कामू के कहे से इस आलेख का शीर्षक इसलिए लिया गया है कि इससे खूबसूरत बात कोई हो नहीं सकती. तो, मैं आपको एक कहानी सुनाता हूं...
एक था केशव पंडित!
उसकी धर्मपत्नी का नाम था सोनू पंडित. सोनू पंडित ने एक मार्मिक खत लिखा अपने पहले नॉवेल 'शगूफा' की शुरुआत में.
सोनू ने पाठकों को लिखा-
'आप मुझसे अपरिचित नहीं हैं. वेदप्रकाश शर्मा और शगुन शर्मा के केशव पंडित सीरीज उपन्यासों में आप अब तक मेरा नाम, मेरा जिक्र पढ़ते रहे होंगे. मैं यानी सोनू पंडित. केशव पंडित की पत्नी. जिसका पहला उपन्यास 'शगूफा' इस वक्त आपके हाथों में है.
मेरे और केशव पंडित के बीच सिर्फ जिंदगी का साझा ही नहीं रहा बल्कि मेरा केशव पंडित की जिंदगी में उन संघर्षों में भी साझा रहा है जिन्हें हम दोनों ने एक साथ भुगता और उनका सामना किया. मैं केशव पंडित की जिंदगी के हर पहलू और हर जद्दोजहद की चश्मदीद गवाह हूं. यहां मैं उस वक्त का भी इशारा कर रही हूं जब केशव पंडित 'कानून का बेटा' नहीं बना था, लेकिन मेरे कहने पर वह 'कानून का बेटा' बनने के सफर पर निकला था. उसका सफर जेल से शुरू होकर बीस साल तक चला, उसके बाद वह 'कानून का बेटा' बनकर जेल से बाहर आया. समय गुजरता गया.
उसके बाद केशव और मैं पति-पत्नी बने, फिर हमें 'कोख का मोती' मिला जिसका नाम है विजेता पंडित. वही विजेता पंडित जब लेखन क्षेत्र में कूदा तो पहले ही उपन्यास ने धूम मचा दी. मैंने सोचा कि विजेता जब इतनी शानदार लोकप्रियता हासिल कर रहा है तो क्यों न मैं भी लिखूं-क्योंकि विजता केशव पंडित के उन पहलुओं से वाकिफ नहीं है जो उनके जन्म से पहले के हैं. इसलिए ये है पहला उपन्यास - शगूफा.'
जब किरदार ने लेखक का चोला पहन लिया
प्रिय पाठकों, यह कहानी मैंने केशव पंडित का सच कहने के लिए सुनाई है. केशव पंडित कोई सचमुच का नॉवेलिस्ट नहीं था महज एक किरदार था जिसे वेदप्रकाश शर्मा ने अपने नॉवेल में पैदा किया था. मगर गौरी पॉकेट बुक्स ने ट्रेडमार्क 'केशव पंडित' रजिस्टर करवाके उस नाम को लेखक बना दिया. नॉवेल लिखता कोई और प्रेत लेखक था. जब उसके नाम के नॉवेल चलने लगे तो वेदप्रकाश शर्मा को लगा कि हमारे बनाए किरदार के नाम पर कोई दूसरा ही मौज कर रहा है तो उन्होंने अपने काल्पनिक किरदार की बीवी को लेखिका बना दिया. कहने की जरूरत नहीं कि काल्पनिक बेटा पहले ही नॉवेल की दुनिया को अमीर बना रहा था.
क्या दुनिया थी , क्या पाठक थे और क्या लेखक थे ? कमाल है.
पल्प फिक्शन: एक अनदेखी लेकिन विशाल दुनिया
जब मैंने इब्ने सफी, ओमप्रकाश शर्मा, वेदप्रकाश काम्बोज, कर्नल रंजीत, गुलशन नंदा, प्रेम वाजपेयी और मनोज का किशोर वय में पारायण किया था तबसे लगता था कि किस्सों की इस मोहक दुनिया के मतवाले लेखक आखिर होते कैसे हैं ?
इरविंग वालेस का 'आलमाइटी' मैंने राजेन्द्र यादव के कहने पर पढ़ा था. मैं 'हंस' में 'हुजूर दरबार' के तहत लंबे व्यंग्य खींचा करता था और यादवजी ने एक मुलाकात में पॉपुलर लिटरेचर के इंटरनेशनल हीरोज़ की लम्बी गिनती सुनाई. किसी इंडस्ट्री को जानना हो, ऑर्थर हैली पढ़ लो. उपन्यास के नाम ही हैं - होटल, एअरोप्लेन वगैरह-वगैरह.
तो मारिओ पूजो,जैफ्री आर्चर से लेकर रॉबर्ट लुडलुम तक खींच डाले.फिर जॉन ग्रीशम,स्टीफन किंग आदि-इत्यादि भी. मगर लगता था हिंदुस्तान में पल्प का कारोबार गजब का है पर किसी ने इस रंगीन और संगीन दुनिया की कायदे से खबर नहीं ली. आखिर कर्नल रंजीत कोई कर्नल नहीं था, मख्मूर जालंधरी के 'प्रेत लेखन' ने सोनिया और क्रोकोडायल पैदा किए थे. हिंद पॉकेट बुक्स ने पेंगुइन के मॉडल को देखकर घरेलू लाइब्रेरी योजना शुरू की थी और गुलशन नंदा के साथ पांच लाख कॉपी उठाकर 'झील के उस पार' की छलांग लगाई थी.
देवकीनंदन खत्री, गोपालराम गहमरी, किशोरी दास वाजपेयी,तीरथराम फिरोज़पुरी से लेकर जेम्स हेडली चेइज, ओमप्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक, वेदप्रकाश कांबोज,अकरम इलाहाबादी तक के मेल पर कोई ढंग का खाका नहीं मिलता था. जासूसी दुनिया, भयंकर भेडि़या, भयंकर जासूस, नीलम जासूस, प्यारेलाल आवारा या इमरान, इंस्पेक्टर फरीदी और हमीद, जीराल्ड शास्त्री, संगही या विजय-रघुनाथ या ब्लास्ट का रिपोर्टर सुनील - इन नामों के मेले में कैसे-कैसे धुआंधार टाइटल चले आते थे -
- प्रेतों का निर्माता
- कातिल मिलेगा माचिस में
- एक करोड़ का जूता
- आग की कटार
- तरंगों के प्रेत
मैं इस दुनिया की तह में जाने के लिए बेताब था जहां दिमाग की मालिश, तनाव से मुक्ति, मूल्यों की फेहरिस्त और मानवीय संबंधों की मसालदानी से लगातार नई-नई डिश तैयार होती थी. दोपहरें आबाद रहती थीं और व्हीलर की स्टॉलें इठलाती थीं. सोचता था , अब वे किन गलियों के बादशाह हैं जहाँ उनके ताज रखे हैं?
रेमंड चांडलर ने लिखा है- मरे हुए आदमी, टूटे दिलों से ज्यादा भारी होते हैं और श्रीलाल शुक्ल ने लिखा है- बातों का राज इंसानों से छिपाना जरूरी है, खुदा के सुन लेने से कोई फर्क नहीं पड़ता. एडगर एलन पो ने कहा है, जो सुना हो उस पर कभी विश्वास मत करो और जो देखा हो उस पर आधा.
मेरठ से दरियागंज तक: कहानियों का अंडरग्राउंड नेटवर्क
तो हमने तलाश शुरू की. पर अकबर इलाहाबादी का शेर है -
पहुंचना दाद को मजलूम का मुश्किल ही होता है
कभी काजी नहीं मिलता, कभी कातिल नहीं मिलता.
ऐसी ही एक रात तलाश के दौरान वेद प्रकाश काम्बोज साहब का नंबर मिला. बड़े मोहब्बत से भरे इंसान निकले. हिंदी की मुख्यधारा में अमूमन ऐसे आदमी दुर्लभ ही मिलते हैं जो नामवर भी हों और दिल से खुले भी. उन्हें कोई गुमान न था कि वे कोई क्रांतिकारी आदमी रहे हैं, जबकि उनके नाम के नकली नॉवेल्स भी एक जमाने में धुआंधार चलते थे. दूसरे उनके साथ बड़े हुए सुरेंद्र मोहन पाठक.
मेरठ से दिल्ली के बीच फिर तो लोग मिलते गए. प्रेमिका के बलात्कार के झूठे आरोप में बंद हुआ किशोर जो उपन्यासकार बनकर बाहर निकला - परशुराम शर्मा या हरि नगर में फोटोकॉपी की दुकान चला रहे 70 साल के योगेश मित्तल जिन्होंने जवानी के दिनों में सैकड़ों के लिए ‘घोस्ट राइटिंग' की.
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फारुख अर्गली जो उर्दू मीडियम में चौथा दर्ज पास थे मगर हसीना कानपुरी और नकली इब्ने शफी का जखीरा लिखते थे. असली होता था इब्ने सफ़ी, 'स' को 'श' करके धोखे का माल बेच दिया जाता था. ये इमर्जेंसी में सिर्फ इसलिए जेल भेज दिए गए थे क्योंकि उनके लिखे नकली इब्ने शफी वाले नॉवेल में किरदार एक जगह इमर्जेंसी को कोसता दिखा था. नकली लेखक, असली जेल.
उधर, अब रितुराज आजकल भाजपा के लीडर हो गए हैं. सत्यपाल वार्ष्णेय के बेटे सुबोध भारतीय फिर से नीलम जासूस कार्यालय चला रहे हैं.सबसे ऊपर सुरेंद्र मोहन पाठक धुआंधार हैं. उनका सिक्का बाजाप्ता चल रहा है.
दरियागंज में खत्म हुई तलाश...
तो, देखा कि मेरठ के बेगमपुल से दिल्ली के दरियागंज तक, इलाहाबाद से बनारस तक, लंदन से न्यूयॉर्क तक, तीरथराम फीरोजपुरी से लेकर रांगेय राघव तक - किस्सों का अंबार लगा हुआ था.
देसी पल्प की इस दुनिया में जाकर हजारों का सामान था पर दो सौ पन्नों में रोककर ही दाखिल-दफ्तर करना पड़ा. पल्प की हिस्ट्री, उसका मेकेनिज़्म,साइकोलॉजी और अफसानों के तहखाने में रूहों का रक्स उर्फ़ हथकंडों की चाबी की तलाश में अंग्रेजी से लेकर मलयालम,बांग्ला, तमिल,मराठी आदि-आदि तक की सैर हो गई . ये न होता तो कैसे पता चलता कि कोई आदमी प्रसिद्ध जासूसी कथा लेखक, जाना-माना ज्योतिषी और डॉक्टर एक साथ भी हो सकता है!
किताब मैंने दरियागंज के कबाड़ी बाजार में ख़त्म की जहाँ मैंने नॉवेल ' ग़ालिब डेंजर' उठाया था और देखा कि कबाड़ी ख़ुद मोबाइल पर 'पाताल लोक' देख रहा है.
आर्थर कानन डायल याद आए जो कहते थे - एकदम साफ़ दिखते सबूत से बड़ा कोई धोखा नहीं होता.
ये था धोखा,ये था सच,ये था किस्सा -बेगमपुल से दरियागंज.














