370 रुपये की बिरयानी वाले विवाद के बाद अब एक और वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है, लेकिन इस बार मामला सिर्फ एक मजाक का नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और सम्मान का है.
प्रणीत मोरे के पुराने शो के एक क्लिप में एक डॉक्टर द्वारा बॉडी डोनर को लेकर की गई टिप्पणी ने लोगों को नाराज कर दिया. विवाद बढ़ा तो माफी भी आई, लेकिन इसके साथ ही एक जरूरी सवाल भी उठ खड़ा हुआ.
सोशल मीडिया पर वायरल इस वीडियो में एक डॉक्टर (जो उस वक्त मेडिकल स्टूडेंट थीं) ने एनाटॉमी लैब में इस्तेमाल होने वाली बॉडी को लेकर मजाक किया.
लोगों को यह बात नागवार गुजरी क्योंकि बॉडी डोनर कोई ‘ऑब्जेक्ट' नहीं, बल्कि वो इंसान होते हैं जिन्होंने अपनी मर्जी से दूसरों की पढ़ाई और इलाज के लिए अपना शरीर दान किया होता है. विवाद बढ़ने के बाद डॉक्टर ने माफी मांगी, लेकिन इस घटना ने मेडिकल एथिक्स पर चर्चा शुरू कर दी.
सेजल पवार ने मांफी मांगी है-
ऐसे में ये सवाल उठता है कि आखिर मेडिकल कॉलेजों में उन लोगों का सम्मान कैसे सिखाया जाता है, जो मरने के बाद भी दूसरों को जीना सिखाते हैं?
वीडियो में एक मेडिकल स्टूडेंट और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर (डॉ. सेजल पवार) एनाटॉमी लैब की डेड बॉडीज (कैडेवर) को लेकर बेहद भद्दा और असंवेदनशील कमेंट करती नजर आ रही हैं. हालांकि, चौतरफा घिरने के बाद उन्होंने माफी मांग ली है, लेकिन इस वाकये ने एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है कि क्या हम उन लोगों को सही सम्मान दे पा रहे हैं, जो मौत के बाद भी दूसरों की जिंदगी संवारने के काम आते हैं?
भले ही किसी मंच पर कोई डॉक्टर या स्टूडेंट ऐसा भद्दा मजाक कर बैठे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मेडिकल कॉलेज और हमारी व्यवस्था इन 'साइलेंट टीचर्स' (मृत शरीरों) के सम्मान को बनाए रखने के लिए कितने सख्त नियम अपनाती है? आइए जानते हैं कि एक आम इंसान के लिए जो सिर्फ एक मृत शरीर है, वो मेडिकल छात्रों के लिए कितना पवित्र और अनमोल होता है.
सेजल को लोगों की आलोचना झेलनी पड़ी-
वो 'पहला मरीज' जो कभी शिकायत नहीं करता!
मेडिकल की दुनिया में एक बहुत खूबसूरत लाइन कही जाती है- "एनाटॉमी लैब में रखा हुआ मृत शरीर एक मेडिकल छात्र का 'पहला मरीज' होता है." यह वो मरीज है जो न तो दर्द से कराहता है, न ही इलाज में गलती होने पर शिकायत करता है. वो खामोशी से भावी डॉक्टरों को अपनी रग-रग सौंप देता है ताकि वे सर्जरी सीख सकें और कल को किसी की जान बचा सकें.
भारत में ज्योति बसु, नानाजी देशमुख, मशहूर न्यायविद लैला सेठ और सोमनाथ चटर्जी जैसी महान हस्तियों से लेकर न जाने कितने आम लोगों ने विज्ञान की भलाई के लिए अपनी देह का दान किया है. मेडिकल कॉलेजों के लिए ये दान किसी अनमोल तोहफे से कम नहीं होते.
...इसीलिए इतने कड़े होते हैं एनाटॉमी लैब के नियम!
कोई भी मेडिकल कॉलेज इस बात से समझौता नहीं करता कि लैब के भीतर किसी भी देह का अनादर हो. इसके लिए बकायदा बेहद कड़े नियम बनाए गए हैं. एक मेडिकल स्टूडेंट ने बताया कि उनको किन नियमों का पालन करना चाहिए:
नो फोटोग्राफी, नो रीलबाजी: लैब के भीतर किसी भी तरह की फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी पर पूरी तरह बैन होता है. अगर कोई छात्र फोटो खींचते हुए पकड़ा जाए, तो उसे सीधे कोर्स से फेल किया जा सकता है या कॉलेज से निकाला जा सकता है. यह नियम उन महान आत्माओं की निजता (Privacy) और सम्मान के लिए है.
डिजिटल दुनिया से दूरी: छात्र फोन का इस्तेमाल सिर्फ पढ़ाई या मेडिकल एटलस देखने के लिए कर सकते हैं. लैब के भीतर से न तो कोई मैसेज भेजा जा सकता है, न कॉल हो सकती है और न ही इंस्टाग्राम स्क्रॉल किया जा सकता है.
बाहरी लोगों की नो-एंट्री: यह कोई म्यूजियम या पिकनिक स्पॉट नहीं है. लैब में किसी भी बाहरी मेहमान का आना सख्त मना है- फिर चाहे वो छात्र के डॉक्टर माता-पिता ही क्यों न हों. जो नियम हॉस्पिटल के ऑपरेशन थिएटर (OT) के होते हैं, वही यहाँ भी लागू होते हैं.
खाने-पीने और कॉस्मेटिक्स पर बैन: लैब के अंदर लिप बाम लगाना, कांटेक्ट लेंस बदलना, च्युइंग गम चबाना या कॉफी पीना पूरी तरह वर्जित है.
छात्रों को क्या करना चाहिए? (नैतिकता के अनकहे नियम)
किताबों में लिखे नियमों से अलग, मेडिकल छात्रों को दिल से कुछ बातों का पालन करना सिखाया जाता है, जिसे हर छात्र को गांठ बांध लेना चाहिए:
केवल काम के हिस्से से हटाएं पर्दा: पढ़ाई के दौरान शरीर के केवल उसी हिस्से से पर्दा हटाया जाता है, जिस पर उस वक्त स्टडी की जा रही हो. बाकी पूरे शरीर को हमेशा बेहद सम्मान के साथ ढककर रखा जाता है.
काम के बाद प्राकृतिक स्वरूप: पढ़ाई या विच्छेदन (Dissection) पूरा होने के बाद, शरीर के सभी अंगों को बेहद आदर के साथ उनकी सही प्राकृतिक जगह (Anatomical Position) पर वापस रख दिया जाता है.
मजाक या चर्चा पर पूरी रोक: लैब के बाहर दोस्तों के बीच या सोशल मीडिया पर लैब के अनुभवों का मजाक उड़ाना या असंवेदनशील बातें करना एक डॉक्टर की नैतिकता के बिल्कुल खिलाफ है.
आम आदमी के लिए जानना क्यों जरूरी है?
बॉडी डोनेशन (देह दान) दो तरीकों से होता है. पहला, जब कोई इंसान जीते जी यह संकल्प लेता है कि मौत के बाद उसका शरीर मेडिकल रिसर्च को सौंप दिया जाए. दूसरा, जब पुलिस लावारिस शवों को कानूनी प्रक्रिया के बाद मेडिकल कॉलेजों को सौंपती है.
अगर आपके मन में यह डर है कि देह दान के बाद आपके या आपके अपनों के शरीर के साथ कैसा बर्ताव होगा, तो निश्चिंत रहिए. चंद भद्दे कमेंट्स करने वाले लोग पूरे मेडिकल जगत का चेहरा नहीं हो सकते. विज्ञान और मानवता के लिए किया गया यह निस्वार्थ उपहार हमेशा डॉक्टरों और छात्रों के लिए पूजनीय रहेगा. ये 'साइलेंट टीचर्स' भले ही बोल नहीं सकते, लेकिन दुनिया को वो डॉक्टर दे जाते हैं जो हर रोज लाखों जिंदगियां बचाते हैं.
आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि मेडिकल छात्रों के लिए संवेदनशीलता (Sensitization) की स्पेशल क्लास होनी चाहिए?
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