मेरा नाम अभय है और मैं 25 साल का हूं. मेरी सबसे बड़ी समस्या कोई बीमारी या हेल्थ इश्यू नहीं था, बल्कि एक आदत थी. ये बुरी आदत थी हर काम को टालना. मैं अक्सर कोई भी काम तभी करता था जब उसकी डेडलाइन एकदम सिर पर आ जाती थी. फिर चाहे वो मेरी प्रोफेशनल लाइफ से संबंधित काम हो या फिर कोई पर्सनल काम ही क्यों न हो. इसकी शुरुआत तो गैर जरूरी समझे जाने वाले कामों को टालने से हुई, फिर ये आदत धीरे-धीरे मेरे स्वभाव और व्यक्तित्व का ही हिस्सा बन गई. नतीजा ये कि पेंडिंग कामों का बोझ बढ़ता जाता और उसी के साथ तनाव और प्रेशर भी बढ़ने लगा. बाद में मुझे मेरे एक दोस्त ने बताया कि यह सिर्फ आलस नहीं था, बल्कि टालमटोल था.
यानि एक ऐसी आदत जिसमें इंसान जानता है कि काम टालने से नुकसान होगा, फिर भी उसे टालता है. उसे ये भी पता होता है कि ऐसा करने से लंबे समय में तनाव और परफॉर्मेंस दोनों पर असर पड़ता है. यहीं से मैंने तय किया कि मैं इसे बदल कर रहूंगा. मैंने संकल्प लिया कि अगले 100 दिनों तक मैं काम टालना बंद करूंगा, चाहे काम छोटा ही क्यों न हो.
मैंने 100 दिनों तक क्या बदला?

100 दिनों में क्या बदलाव आए? | What Changes Occurred in 100 Days?
1. दिमाग हल्का रहने लगा
पहले हर वक्त अधूरे काम दिमाग में घूमते रहते थे. साइकोलॉजी में इसे मेंटल लोड कहा जाता है, इस स्थिति में अधूरे काम दिमाग में जगह घेरे रहते हैं. लेकिन जब मैंने काम टालना कम किया, तो दिमाग पर दबाव भी कम हो गया.
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2. छोटे काम करने से मोटिवेशन बढ़ने लगा
जैसे ही मैं छोटे-छोटे काम पूरा करता था, आगे काम करने का मन खुद होने लगता था. सबसे surprising चीज यही थी. दरअसल, हर छोटा काम पूरा करने पर दिमाग में डोपामिन रिलीज होता है, जो मोटिवेशन और खुशी से जुड़ा होता है.
3. कल करूंगा वाली आदत टूटने लगी
पहले मैं हर काम के लिए सही मूड का इंतजार करता था. लेकिन मैंने सीखा कि एक्शन पहले आता है, मोटिवेशन बाद में.
4. आत्मविश्वास बढ़ा

5. स्ट्रेस कम हुआ
पहले काम टालने से शुरुआत में थोड़ी राहत मिलती थी. लेकिन, बाद में वही चीज स्ट्रेस बन जाती थी. टालमटोल लंबे समय में ज्यादा स्ट्रेस और खराब परफॉर्मेंस से जुड़ा होता है.
6. फोकस और एनर्जी बेहतर हुई
जब दिमाग में अधूरे काम कम हुए, तो फोकस अपने आप बेहतर हो गया. क्योंकि प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (जो प्लानिंग और फोकस के लिए जिम्मेदार है) तभी सही काम करता है जब डिस्ट्रैक्शन कम हों.
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सबसे बड़ा सरप्राइज क्या था?
मुझे लगा था कि बदलाव बहुत देर से दिखेगा. लेकिन सच ये है पहले 2-3 हफ्तों में ही फर्क महसूस होने लगा था. मैंने यह भी समझा कि सिर्फ आलस छोड़ना ही काफी नहीं है. अगर नींद ठीक न हो, फोन का इस्तेमाल कंट्रोल में न हो और लक्ष्य साफ न हों, तो यह बदलाव ज्यादा समय तक टिक नहीं पाता. इन चीजों को संतुलित रखना जरूरी है, तभी धीरे-धीरे बनी अच्छी आदतें लंबे समय तक कायम रह पाती हैं.
आज 100 दिन पूरे होने के बाद मैं यह कह सकता हूं कि आलस कोई पर्सनालिटी टाइप नहीं, बल्कि एक पैटर्न है, और अच्छी बात यह है कि इसे बदला जा सकता है. अगर आप भी हर काम को थोड़ी देर बाद पर टालते रहते हैं, तो एक बार खुद को 100 दिन का समय देकर देखें. हो सकता है आपको भी एहसास हो कि बदलाव किसी बड़े फैसले से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे काम समय पर करने से ही शुरू होता है.
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