Zero FIR और Regular FIR में क्या अंतर है, कब कौन सा FIR दर्ज कराना सही रहेगा

Difference between Zero and Regular FIR : क्या आप जीरो एफआईआर और रेगुलर एफआईआर में अंतर जानते हैं. इमरजेंसी में पुलिस रिपोर्ट कहां लिखवाएं और नए कानून (BNSS) की धारा 173 क्या कहती है. इस आर्टिकल में जानिए FIR से जुड़ी वो जानकारी, जो आपके काम आ सकती है.

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रेगुलर FIR पहले CRPC के सेक्शन 154 में था, जो अब बदलकर BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के सेक्शन 173 में है.

Zero Vs Regular FIR: कानून की जानकारी सिर्फ वकीलों के लिए नहीं, बल्कि हम जैसे आम लोगों के लिए भी बहुत जरूरी है. अक्सर जब कोई अनहोनी होती है, तो लोग इस बात को लेकर परेशान हो जाते हैं कि शिकायत करने किस पुलिस स्टेशन जाएं. क्या पुलिस हमारी रिपोर्ट लिखेगी. अगर आप भी जीरो एफआईआर (Zero FIR) और रेगुलर एफआईआर (Regular FIR) के चक्कर में उलझे हैं, तो टेंशन छोड़ दीजिए. आइए बिल्कुल आसान शब्दों में समझते हैं कि इन दोनों में क्या अंतर हैं और इमरजेंसी में आपकी मदद कैसे कर सकती हैं.

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जीरो FIR क्या होता है

अगर कोई कहीं सफर कर रहा है और उसके साथ कोई गंभीर हादसा जैसे एक्सीडेंट, चोरी या हमला हो जाता है. अब आपको नहीं पता कि वह इलाका किस पुलिस स्टेशन के अंदर आता है. ऐसे में जीरो एफआईआर काम आती है. मतलब आप जहां हैं, वहीं के लोकल थाने में जाकर अपनी शिकायत कर सकते हैं.

जीरो FIR में क्या-क्या होता है

1. जीरो एफआईआर का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अपराध कहीं भी हुआ हो, आप अपने पास के किसी भी पुलिस स्टेशन में जाकर शिकायत लिखवा सकते हैं. पुलिस यह कहकर मना नहीं कर सकती कि 'यह हमारे इलाके का केस नहीं है.'

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2. इसे 'जीरो' इसलिए कहते हैं क्योंकि उस समय पुलिस इसे कोई रेगुलर सीरियल नंबर नहीं देती, बल्कि '0' (Zero) नंबर डालकर रिपोर्ट लिख लेती है.

बाद में क्या होता है और यह क्यों जरूरी है

शिकायत लिखने के बाद वह पुलिस स्टेशन उस FIR को उस इलाके के थाने में भेज देता है, जहां असल में क्राइम हुआ था. असली जांच वहीं से शुरू होती है. यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह गंभीर अपराधों जैसे रेप या मर्डर के लिए होती है, ताकि पुलिस तुरंत एक्शन ले सके और देरी की वजह से कोई सबूत न मिट जाए.

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रेगुलर FIR क्या होता है

यह वह सामान्य प्रक्रिया है, जिसके बारे में हम अक्सर फिल्मों में देखते या सुनते हैं. रेगुलर एफआईआर उसी पुलिस स्टेशन में दर्ज होती है, जिसके अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) में अपराध हुआ है. यहां पुलिस रिपोर्ट लिखते ही अपनी जांच-पड़ताल शुरू कर देती है. इसमें FIR को एक प्रॉपर नंबर दिया जाता है, जैसे- FIR No. 125/2026.

रेगुलर FIR और जीरो FIR किस सेक्शन में आते हैं

रेगुलर FIR पहले CRPC के सेक्शन 154 में था, जो अब बदलकर BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के सेक्शन 173 में है. वही कानून की किताबों में जीरो FIR जैसा कोई शब्द नहीं है. साल 2012 में हुए निर्भया केस के बाद जब जस्टिस वर्मा कमेटी बनी, तब यह कांसेप्ट सामने आया. कोर्ट ने माना कि पुलिस की इस लापरवाही को खत्म करना जरूरी है. इसी न्यायिक व्याख्या (Judicial Interpretation) के बाद जीरो एफआईआर का कांसेप्ट आई.

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